संघी सोच भाई-बहन के रिश्ते को भी तार-तार कर गई 

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कल देश की संसद में एक ऐसी घटना पर लोकसभा अध्यक्ष ने टिप्पणी और संसद की मर्यादा का पाठ पढ़ाना जरुरी समझा, जिस पर किसी भी सभ्य समाज को सपने में भी आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष ने छूटते ही इस मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए संघ से हासिल अपने ज्ञान की जमापूंजी खर्च करना अति आवश्यक समझा, गोया ऐसा नहीं किया जाता तो देश नैतिक पतन के गर्त में डूब जाता।

यह घटना है दो सांसदों के बीच की, जो रिश्ते में भाई-बहन भी हैं। सदन में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन की कार्यवाही के दौरान प्रियंका गांधी वाड्रा की सीट के पास जाकर उनकी ठुड्डी पर हाथ लगाते हुए उन्हें चलने के लिए कहा, जिस पर सभापति महोदय का ध्यान बरबस चला गया। उस समय भी सदन चल रहा था और सभापति एक सांसद से संक्षिप्त में जवाब देने की मांग कर रहे थे। 

राहुल गांधी को परोक्ष रूप से संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने माननीय सदस्यगण आप सबसे अपेक्षा की जाती है कि आप सदन में सदन की मर्यादा और शालीनता के उच्च मानदंडों को बनाये रखें। सदन में मेरे संज्ञान में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जो सदन की उच्च परंपरा के अनुरूप नहीं रही है। इस सदन में पिता-पुत्री, माँ बेटी पति-पत्नी सदस्य रहे हैं। इस परिपेक्ष्य में मेरा नेता प्रतिपक्ष से अपेक्षा है कि लोकसभा प्रकिया नियम 349 के मुताबिक आचरण व्यवहार करें, जो सदन की मर्यादा और प्रतिष्ठा के अनुरूप रहना चाहिए।  मैं पुनः विशेष रूप से विपक्ष के नेता से तो ये अपेक्षा की जाती है कि वो आचरण रखे।”

बीजेपी और बीजेपी के प्रचार की कमान संभालने वाले अमित मालवीय के लिए तो ओम बिरला ने कोई बहुत बड़ा खजाना दे दिया है, जिसे वे जमकर भुनाने में लगे हुए हैं। बता दें कि इसके फौरन बाद ही जब नेता प्रतिपक्ष ने सदन के सामने अपनी बात रखने का आग्रह किया तो सदन की कार्यवाही 2 बजे तक स्थगित कर लोकसभा अध्यक्ष ने रफूचक्कर हो जाना बेहतर समझा। 

कांग्रेस ने सभापति की मंशा को तो भलीभांति समझ लिया, लेकिन उनके मन्तव्य को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे को तूल देना उचित नहीं समझा है। इसके बजाय, राहुल गांधी ने संसद से बाहर पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए यही कहा कि सभापति नेता प्रतिपक्ष को बोलने का अवसर नहीं दे रहे। बाद में करीब 70 कांग्रेस सांसद ने ओम बिरला से मुलाक़ात कर अपना विरोध प्रकट किया। 

लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि लोकसभा अध्यक्ष अपनी नैतिकता को सदन में थोपने से पीछे नहीं हटेंगे। आज भी जब निर्दलीय सांसद, पप्पू यादव ने अपने संसदीय क्षेत्र में हवाईअड्डे की चर्चा के दौरान नागरिक उड्डयन मंत्री, राममोहन नायडू के कंधे पर हाथ रख दिया तो ओम बिड़ला ने तत्काल उन्हें संवैधानिक मर्यादा और आचरण का पाठ पढ़ा डाला। 

बहुत संभव है कि यह कार्यवाही उन्होंने अपने एक दिन पहले के एक्शन को जस्टिफाई करने के लिए की हो, लेकिन इससे उनकी मनोदशा को नहीं छिपाया जा सकता। अब चूँकि कांग्रेस खुद इस मुद्दे को तूल नहीं देना चाहती, इसलिए इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय नहीं बनाया जायेगा, लेकिन संघी नेटवर्क में इसके क्या-क्या अर्थ और अनर्थ लगाये जा सकते हैं, इसकी कल्पना भी आपकी रूह कंपा सकती है। 

इसी संसद के भीतर हम देख चुके हैं कि पूर्व भाजपा सांसद, रमेश बिधूड़ी को, जिनके बगल में बैठे भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेता ठठा के हंस रहे थे। रमेश बिधूड़ी की उस गाली-गलौज और सांप्रदायिक जहर बुझी भाषा पर पूरे देश में हंगामा हुआ, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष की ओर से कोई टिप्पणी सुनने को नहीं मिली थी। ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं, लेकिन संघी माइंडसेट से पूरे समाज में घटाटोप की स्थिति में इससे उबरने के लिए स्वतंत्र लोकतांत्रिक नजरिये को विकसित करने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को इस नजरिये को विकसित करने की एक कमजोर कोशिश कहा जा सकता है। यह यात्रा एक ऐसे समय में हुई थी जब कांग्रेस अपने सबसे संकटकाल में थी और देश के लोकतांत्रिक स्वरुप पर भी गहरा प्रश्नचिन्ह लगा हुआ था। राहुल ने ‘नफरत के बाज़ार में, मोहब्बत की दुकान’ का नारा दिया था, इसलिए इसमें सत्तापक्ष के लिए भी हमला करने की बहुत गुंजाइश नहीं बन पाई थी। इस यात्रा में हजारों की संख्याओं में महिलाएं, बच्चियां राहुल गांधी से गले मिल रही थीं। ऐसा जान पड़ता था, मानो बरसों बाद उन्हें कोई अपना खेवनहार मिल रहा है।

इन अनजान हजारों महिलाओं का अचानक से बीच सड़क पर आकर राहुल गांधी के गले लगना भी भाजपा के गले उतरा होगा, ऐसा हर्गिज संभव नहीं है। लेकिन चूँकि ये सभी वे सताए हुए लोग थे, जिन्हें सिस्टम, मनुवादी व्यवस्था, पितृसत्तात्मकता और जातीय-नस्लीय भेदभाव का शिकार होना पड़ा था, इसलिए इस पर ऊँगली उठाते ही यह सवाल खड़ा हो जाता कि देश में उत्पीड़ित आम आबादी सरकार और सरकार के मुखिया से आस रखने के बजाय विपक्ष के नेता से उम्मीद लगा रहे हैं। 

एक स्वस्थ्य लोकतांत्रिक समाज में भाई-बहन और सहपाठी या महिला-पुरुष मित्र का आचरण कैसा होना चाहिए? क्या हमारे परिवार अभी भी यही मानते हैं कि जो भाई-बहन बचपन में लड़ते-झगड़ते बड़े होते हैं, युवा होते ही एक-दूसरे को छूने से ही उनके भीतर वासना का कीड़ा बुल्बुलाने लगता है? यह आरोप तो हिंदुत्ववादी शक्तियाँ अभी तक मुस्लिम आबादी पर लगाती आई है, जिसका उनके द्वारा लगातार दुष्प्रचार किया जाता है। 

असल में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की आंतरिक संरचना में ही यह विचलन है, जो आमतौर पर एक स्वस्थ्य समाज में देखने को नहीं मिलता। जैसे ही कोई सदस्य पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन जाता है, उसके लिए कुंवारे रहने या सामजिक जीवन से परित्याग एक आवश्यक शर्त बन जाती है। लेकिन समाज और इंसान की सहज शारीरिक प्रक्रिया तो खत्म नहीं हो सकती। लेकिन हर स्त्री को बहन या माँ मानने की यह ओढ़ी हुई धारणा कई विकृतियों को जन्म देती है। ऐसे ही दकियानूसी समाजों और संगठनों में समलैंगिक संबंधों और मानसिक विकृतियों के किस्से सुनने को मिलते हैं।

चूँकि राहुल और प्रियंका भाई-बहन होने के साथ-साथ देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के चेहरे हैं, और अब प्रियंका के भी सक्रिय राजनीति में आ जाने के कारण भाजपा के लिये अपनी रणनीति को दुगुनी ताकत से इस्तेमाल में लाना है, इसलिए राहुल गांधी को कुछ चीजों को तय करना होगा। 

इसमें पहला कदम यह होना चाहिए कि या तो उन्हें खुलकर इस संघी माइंडसेट के खिलाफ जोरदार हल्लाबोल करना होगा, ताकि समाज के भीतर भी उनके बारे में जो भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं, या फैलाई जा सकती हैं, पर ब्रेक लगे और आम लोग भी इस विकृत मानसिकता पर थू-थू करें। हम सभी अपने जीवन के विभिन्न चरण के दौरान महात्मा गांधी, नेहरु, इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी तक के बारे में इसी प्रकार के चरित्र हनन के किस्सों को अपने कानों में फुसफुसाते हुए सुन चुके हैं। यह काम तब भी किया जा रहा था जब कांग्रेस आजादी के बाद लगातार निर्बाध गति से देश की सत्ता संभाल रही थी, और तब व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी का भी अविष्कार नहीं हुआ था। 

भारत जैसे अर्ध-सामंती अर्ध औपनिवेशिक देश में जहां उत्तर भारत में गाय माता है और गोवा में भोजन, और दोनों जगहों पर भाजपा लगातार एक के बाद एक चुनावी जीत हासिल करती जा रही है। जबकि पीएम मोदी एक देश, एक चुनाव अर्थात देश का एक माइंडसेट बनाने की कवायद में जीजान से जुटे हैं, यह विरोधाभास सहस्तित्व में कायम रह सकता है। यह इसीलिए संभव हो पा रहा है क्योंकि, हम उत्पादों और पहनावे से भले ही कितने भी आधुनिक क्यों न दिखें, हम समाज को स्वविवेक के आधार पर फैसला लेने के लायक नहीं बना रहे। 

यह लड़ाई ही असल में असली लड़ाई है। इस लड़ाई को लड़े और जीते बगैर न ही हम सही मायने में एक लोकतांत्रिक देश कहलाने लायक हो सकते हैं, और न ही चुनावी तौर पर भाजपा को केंद्र की सत्ता से उखाड़कर भी विपक्ष खुद को संघी माइंडसेट से मुक्त कर सकता है। इस पिछड़ी मानसिकता का भाजपा और संघ की शक्तियाँ दोहन कर रही हैं, लेकिन क्या कमोबेश इसी प्रकार की मानसिकता कांग्रेस सहित तमाम क्षेत्रीय दलों में नहीं है? आज राहुल गांधी और प्रियंका ने इससे कन्नी काटकर भले ही नेता प्रतिपक्ष के तौर पर अपनी अवहेलना को मुद्दा बना दिया हो, लेकिन कल उन्हें समाज से ही जब बेहद कुत्सित और घृणास्पद सवालों से रुबरु होना होगा, तब उन्हें अहसास होगा कि ये तीर कहाँ से और कब निकला था, जिसका समय रहते मुहंतोड़ जवाब देना उनके वश में था।

सोशल मीडिया पर महिलाएं इसका जवाब दे रही हैं। लेकिन कांग्रेस ही इसे हर बार की तरह सीधी चुनौती देने से बच रही है। बीजेपी के आधिकारिक पोस्ट पर एक यूजर ने अपनी टिप्पणी में लोकसभा अध्यक्ष की एक तस्वीर साझा की है, जिसमें वे अपनी बच्चियों के साथ बेहद अंतरंग होकर तस्वीर खिंचा रहे हैं। ऐसा करना स्वाभाविक है, लेकिन विपक्षी दल का कोई सांसद, खासकर नेहरु-गांधी खानदान से कोई ऐसी हरकत करे तो उसका राजनैतिक लाभ अपने पितृ संगठन को दिलाने की कवायद से कम से कम लोकसभा अध्यक्ष को जरुर बचना चाहिए, क्योंकि सदन के भीतर वह नेता सदन और नेता प्रतिपक्ष सबका संरक्षक होता है।

(रविंद्र पटवाल जनचौक संपादकीय टीम के सदस्य हैं)

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