दिल्ली में लाठीचार्ज देखकर अहमदाबाद और वडोदरा में अचानक उबल पड़े मेरे प्यारे जेन-ज़ी पीढ़ी के युवा मित्रों से मैं कुछ कहना चाहता हूँ। यह पोस्ट विशेष रूप से उन लोगों के लिए है।
पिछले दो महीनों से हमारी “अब्दुल” प्रजाति अपेक्षाकृत शांत है, क्योंकि अब आपके जैसे पूर्व भक्त या अर्ध-भक्त ही डंडा लेकर असली भक्तों के पीछे पड़ गए हैं। आज स्थिति यह है कि केवल फेसबुक ही नहीं, अहमदाबाद में भी यदि कोई खुलकर भाजपा का नाम ले, तो उसे टोकने वाला कोई न कोई आसपास मिल ही जाता है। जब मुल्लाओं पर कार्रवाई हो रही थी तब सब ठीक लगता था, लेकिन जंतर-मंतर पर आपकी अपनी पीढ़ी पर लाठियाँ बरसीं तो आप को दर्द महसूस होने लगा, क्या ऐसा नहीं है?
2019–20 में जब जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मुस्लिम छात्रों पर दिल्ली पुलिस बेरहमी से लाठियाँ बरसा रही थी, तब “दिल्ली पुलिस लठ बजाओ, हम तुम्हारे साथ हैं” के नारे लगाने वाले कौन थे?
सीएए और एनआरसी के विरोध में शाहीन बाग में धरने पर बैठी मुस्लिम महिलाओं को पैसे लेकर बैठी हुई, बाज़ार में धंधा करने वाली औरतें कहकर अपमानित करने वाले कौन थे?
बुलडोज़र की कार्रवाई, लाठीचार्ज, “बिफोर-आफ्टर” वीडियो, किसी के माथे पर आतंकवादी का ठप्पा लगा देना—क्या यह सब देखकर आनंद नहीं लिया गया? क्या बलात्कार के आरोपियों का सार्वजनिक सम्मान होते नहीं देखा गया? क्या फेसबुक पर उसका समर्थन नहीं किया गया?
क्या आप ही लोग बार-बार यह नहीं पूछते थे कि “70 वर्षों में कांग्रेस ने क्या किया?” क्या 500 रुपये लीटर पेट्रोल खरीदने की बातें करने वाले आप ही नहीं थे? और जब 8–10 या 12 करोड़ रुपये के किसी अटल ब्रिज को देखकर आपके पिता या दादा गर्व से कहते थे कि “यह तो सिर्फ मोदी ही कर सकते हैं”, तब क्या आपने कभी उनसे कोई सवाल पूछा था?
कल तक जो परम्-भक्त थे और आज स्वयं को जेन-ज़ी कहते हैं, उनसे सवाल है।
क्या आपने अपने कॉलेजों में हिजाब पहनकर आने वाली छात्राओं का हूटिंग नहीं किया? क्या आपको समझ नहीं आता था कि 15 अगस्त और 26 जनवरी के अवसर पर आरएसएस के कार्यकर्ता आपके कॉलेजों में किस तरह का वैचारिक संदेश देने आते थे? क्या आपके अपने कुछ शिक्षक देशभक्ति के नाम पर आपके मन में एक विशेष सोच नहीं भर रहे थे? और क्या आंतरिक अंकों के लालच में आप “मन की बात” जैसे कार्यक्रमों में शामिल नहीं होते थे?
छात्रों, आपके साथ जो कुछ हुआ, उसका मुझे दुःख है। लेकिन एक बात हमेशा याद रखिए—बबूल का पौधा बोकर आम के फल की उम्मीद नहीं की जा सकती। जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। पड़ोस में आग लगे तो खुश होने से पहले यह भी याद रखिए कि भले ही आग आपके घर तक न पहुँचे, उसका धुआँ आपकी दीवारों को भी काला कर देगा। हवा की दिशा किसी के नियंत्रण में नहीं होती। आज हवा का रुख बदला है, कल फिर बदल सकता है। तब आपकी नाव भी उसी तूफ़ान में फँस सकती है, जिस तूफान को सहने की हमें सदियों से आदत है।