नई दिल्ली। 55 वर्षीय अनुरा कुमारा दिसानायके श्रीलंका के नए राष्ट्रपति बन गए हैं। आज उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी गयी। इसके साथ ही श्रीलंका में एक नये दौर की शुरुआत हो गयी। दिसानायनके मूलत: ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। और एक दौर में धुर वामपंथी धारा का प्रतिनिधित्व करने वाली जनता विमुक्ति पेरामुना (जेवीपी) पार्टी के नेता हैं।
हालांकि पार्टी ने अब समय के हिसाब से अपनी कार्यनीति और रणनीति में बदलाव कर लिया है। और संसदीय रास्ते को कैसे साधा जाए वह उसके प्रमुख एजेंडे में शामिल है। अनुरा ने इस चुनाव में 42.31 फीसदी वोट हासिल किए हैं।
जबकि दूसरे नंबर पर साजित प्रेमदासा रहे हैं उन्हें कुल 32.71 फीसदी मत मिले हैं। और निवर्तमान राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे को बुरी हार का सामना करना पड़ा है। वह न केवल तीसरे नंबर पर रहे हैं बल्कि उन्हें केवल 17.27 फीसदी वोट मिले हैं।
दिसानायके 24 नवंबर, 1968 को गालेवेला में पैदा हुए थे। उनका शुरुआती जीवन गांव के बुनियादी संघर्षों से जुड़ा रहा है। दूसरे वंशवादी और एलीट जड़ों वाले नेताओं जो आम तौर पर सिंहली बुद्धिस्ट बहुमत वाली राजनीति से जुड़े रहे हैं, से वह बिल्कुल अलग हैं। इसके अलावा एकैडमिक और नस्लीय-जातीय पहचानों से भी उनका कोई रिश्ता नहीं रहा है।

लेकिन अनुरा का राजनीतिक उद्भव उस समय हुआ जब जेवीपी लोकतांत्रिक राजनीति की तरफ बढ़ चुकी थी और इसके साथ ही अपने मार्क्सवादी नजरिये में एक उदारवादी रुख शामिल कर चुकी थी। और इस तरह से इसके जरिये राजनीतिक सच्चाइयों को अपनाते हुए पुरानी जड़ों से भी जुड़े रहने के रास्ते पर वह आगे बढ़ी।
अनुरा कुमारा दिसानायके का उभार
अनुरा का राजनीतिक उभार 1997 में जेवीपी के सोशलिस्ट यूथ ऑर्गेनाजेशन का राष्ट्रीय संगठक बनने के साथ हुआ। सन 2000 में वह सांसद बन गए और फिर उसके बाद 2014 में उन्होंने जेवीपी की बागडोर संभाल ली।
उनकी पृष्ठभूमि में श्रीलंका का ग्रामीण कृषि क्षेत्र था इसके अलावा वह 2004 में कुछ सालों के लिए कृषि मंत्री बने थे और उनका देश के मजदूर तबके से भी गहरा रिश्ता था। ये सारी चीजें उन्हें देश के राजनीतिक इलीट से अलग कर देती थीं।
जेवीपी के 1971 और फिर 1980 के दशक में हथियारबंद संघर्षों से जुड़े होने और बाद में उसका सरकार द्वारा जघन्य तरीके से दमन किया जाना देश के माथे पर एक बड़ा दाग था। उसकी छवि पर भी अतिवादी होने और खून के छीटें थे, न कि शासन करने लायक एक पार्टी की उसकी छवि थी।
लेकिन 2014 में अनुरा का पार्टी की बागडोर संभालना पार्टी के लिए एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। हालांकि उनके पहले के नेता सोमावांसा आमारसिंघे ने 1989 के उसके हथियारबंद संघर्ष पर राख डाल कर उसे फिर से स्थापित करने का काम किया और उसे उस पुरानी पहचान से एक राजनीतिक पहचान की तरफ ले गए।
लेकिन पार्टी को आधुनिक पार्टी के तौर पर खड़ा करने का श्रेय अनुरा को जाता है। इसके साथ ही उन्होंने उसकी अपील को न केवल युवकों तक विस्तारित किया बल्कि राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाली पार्टी के तौर पर जेवीपी की फिर से ब्रांडिंग की।
हालांकि जेवीपी खुद को एक वर्गीय आधारित आंदोलन के तौर पर देखती थी और उसका फोकस सामंतवाद और साम्राज्यवाद को खत्म करने पर रहता था। लेकिन अनुरा का आर्थिक मुद्दों खासकर ग्रामीणों और मजदूरों की बदहाली पर फोकस रहता था।
यह असर उस समय बहुत दूर और गहराई तक गया जब देश 2010 के आखिरी और 2020 के शुरुआती दौर में भीषण आर्थिक संकटों से गुजर रहा था।

श्रीलंका के राजनीतिक इलीट के खिलाफ देश में गुस्से के चलते, जिसे देश में सारी समस्याओं की जड़ माना जाता था, वह आर्थिक ध्वंस हो या फिर बढ़ती महंगाई, राशन की कमी और बढ़ता कर्ज, सभी के लिए उसे जिम्मेदार माना गया। उनके प्रत्याशी बनने का खुले दिल से स्वागत किया गया।
2022 में राजपक्षे परिवार का धराशायी होना और फिर उससे पैदा हुए भीषण विरोध-प्रदर्शनों ने श्रीलंका की राजनीति में एक निर्वात पैदा कर दिया था। इस बीच अनुरा का प्लेटफार्म हर तरीके से इस आंदोलन के साथ खड़ा हुआ और बड़े स्तर पर अपनी नेटवर्किंग की।
क्या उनकी पार्टी तैयार है?
यह कई दशकों में पहली बार है जब एक मार्क्सवादी पार्टी श्रीलंका का नेतृत्व करेगी। यह बात और दिलचस्प हो जाती है कि सत्तारूढ़ पार्टी कोई और नहीं बल्कि एक दौर में उसकी नामालूम जैसी हैसियत थी। जो चीज बहुत लोगों को सोचने के लिए परेशान कर रही है, वह यह बात है कि जेवीपी सच में कितना आगे बढ़ पायी है।
इसको लेकर लोगों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग पार्टी के शासन चलाने की क्षमता को लेकर संदेह में हैं। उसके पीछे उसका अतिवादी चरित्र है।
जबकि दूसरे लोग मुतमइन हैं और इसके लिए वे उसके रेडिकल इतिहास से लगातार ज्यादा व्यवहारिक और मुख्यधारा की राजनीतिक ताकत बनने की दिशा में धीमे-धीमे आए उसके भीतर के बदलाव को चिन्हित करते हैं।
इसके साथ ही श्रीलंका का अपने पड़ोसी देशों से क्या रिश्ता होगा यह भी एक बड़ा मुद्दा है। खासकर दो बड़े देशों चीन और भारत से। जेवीपी 1960 के दशक में काम करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ श्रीलंका (सीपीएसएल) से ही अलग होकर बनी थी। और उसका रिश्ता खासकर उसके चीन पक्षधऱ वाले समूह से जुड़ता था।
एक ऐसे समय में जबकि वैश्विक कम्युनिस्ट आंदोलन दो हिस्सों में बंट गया था। एक हिस्से ने सोवियत संघ के साथ गठजोड़ किया था और वह प्रकृति में सुधारवादी होने के साथ ही संसदीय समाजवादी रास्ते का हिमायती हो चुका था। जबकि दूसरा हिस्सा चीन के साथ गया और वह क्रांतिकारी संघर्षों को आगे बढ़ाने के साथ ही माओवादी सिद्धांतों का पक्षधर बना।

अनुरा के जेवीपी की मार्क्सवादी जड़ों और उसके चीन समर्थक उद्भव के चलते उनके नेतृत्व में चीन के साथ नजदीकी रिश्तों की संभावनाओं का लगातार कयास बना रहेगा।
हालांकि अनुरा ने पहले ही इस बात के संकेत दे दिए हैं कि वह संतुलित विदेश नीति का पालन करेंगे जिसमें जेवीपी के इतिहास में भारत विरोधी रुख होने के बावजूद वह उससे सामान्य रिश्ते बरकरार रखेंगे।
भारत के साथ जेवीपी का परेशान करने वाला रिश्ता
1980 के दशक में हथियारबंद संघर्ष के दौरान जेवीपी श्रीलंका में भारत के हस्तक्षेप की धुर विरोधी थी। खासकर तमिल अलगाववादियों को दबाने के लिए भारत की ओर से भेजे गए भारतीय शांति सुरक्षा बल का उसने बहुत विरोध किया था।
वास्तव में इस दौरान जेवीपी ने श्रीलंका में भारतीय सामानों और व्यवसायों के बहिष्कार का अभियान तक चलाया। इसमें कुछ बेहद हिंसक थे। और इसी कड़ी में 1989 में एक दवा कंपनी के मालिक की हत्या भी की गयी। जो उसके श्रीलंका में भारत समर्थक व्यक्तियों और इकाइयों पर हमले की उसकी नीति का नतीजा था।
पूर्व राजनयिक और कोलंबो में पाथफाइंडर के हेड बर्नार्ड गुनेटिलेक ने कहा कि जेवीपी ऐतिहासिक तौर पर भारत विरोधी रहा है खासकर 1980 के दशक के दौरान। जब उन्होंने भारतीय आयातों और उसमें भी दवा और नशीले पदार्थों के खिलाफ अभियान चलाया।
उन्होंने कहा कि हालांकि यह उदाहरण जेवीपी की मौजूदा नीति को परिभाषित नहीं करेगा। पार्टी अब परिपक्व हो गयी है। और यह जान गयी है कि वैश्विक नेताओं के साथ रिश्ते बनाने और वैश्विक आर्डर के हिसाब से खुद को समायोजित करना कितना जरूरी है।
कुछ महीने पहले अनुरा ने खुद भारत का दौरा किया है। और उन्होंने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और सुरक्षा सलाहकार डोभाल से मुलाकात की है। जो इस बात का संकेत है कि वह एक व्यापक और ज्यादा व्यवहारिक नजरिये को अपनाने की दिशा में अग्रसर हैं।
आधुनिक दुनिया में राजनीतिक बदलाव बहुत जरूरी है। और ऐसा लगता है कि जेवीपी उसको अपना रही है।

पार्टी हालांकि तमिल राष्ट्रवाद और एलटीटीई से भी रिश्तों में अक्सर बहुत शत्रुतापूर्ण रही है। जब शुरुआती दिनों में जेवीपी खुद को एक वर्गीय आधारित पार्टी के तौर पर देखती थी तो वह श्रीलंका में तमिल स्वायत्तता की मांग को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित नहीं थी।
यह वह काल था जबकि तमिल राष्ट्रवाद अपने शैशवा काल में था। 1980 के दशक में जब तमिल विद्रोही उभार पर थे। उस समय पार्टी ने वर्गीय संघर्ष के मार्क्सवादी नजरिये से तमिल मुद्दे को देखा। और किसी भी अलगाववाद का विरोध करते हुए एक एकात्मक राज्य की वकालत की।
एलटीटीई के स्वतंत्र तमिल ईलम की मांग का मजबूती से विरोध करते हुए जेवीपी ने तमिल विद्रोहियों के खिलाफ एक मजबूत राष्ट्रवादी स्टैंड अपनाया। पार्टी ने एलटीटीई को न केवल एक जातीय अलगाववादी समूह के तौर पर देखा बल्कि एक ऐसी ताकत के तौर पर चिन्हित किया जो देश का बंटवारा कर सकती है।
जेवीपी ने 1987 के भारत-श्रीलंका के बीच हुए शांति समझौते का भी विरोध किया, जिसमें तमिल बहुल इलाके को एक न्यूनतम स्वायत्तता देने की बात कही गयी थी। और यही वह काल था जब जेवीपी ने श्रीलंका में भारतीय व्यवसायिक ठिकानों को निशाना बनाया था।
जेवीपी ने एलटीटीई के खिलाफ युद्ध का समर्थन किया था। और सैन्य तौर पर उसकी हार को श्रीलंका की भौगोलिक अखंडता के तौर पर पेश किया था।
उनकी विचारधारा
अनुरा कितने मार्क्सवादी हैं? एक व्यवहारिक मार्क्सवादी, उनके एक बेहद नजदीकी ने इस प्रश्न का उत्तर उस समय दिया था जब अनुरा 2022 में गोटाबाया राजपक्षे की सत्ता के खिलाफ हुए भीषण जन संघर्ष में परोक्ष तौर पर एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे।
गुनेटिलके ने कहा कि जेवीपी ने इसलिए प्रमुखता हासिल की क्योंकि स्थापित राजनीतिक दलों की नीतियां फेल हो गयी थीं। उन्होंने कहा कि अनुरा अभी भी कितने मार्क्सवादी बने रहेंगे यह देखने की बात होगी।
ऐतिहासिक तौर पर जेवीपी एक अति वामपंथी संगठन था लेकिन अनुरा का राजनीतिक रुख और हाल में उनके दिए गए भाषण उनके मध्यमार्ग की तरफ झुकाव को दर्शाता है। अब समय ही बातएगा कि वह कितने मार्क्सवादी रह गए हैं, जो उनकी नीतियों के जरिये पता चलेगा।
अनुरा के तहत जेवीपी ने लोकतंत्र को अपनाया और पूंजीवाद विरोधी रुख में बदलाव किया। इसके साथ ही साम्राज्यवाद विरोधी नारे को बरकरार रखते हुए और ज्यादा मध्यमार्गी रुख अपनाने का काम किया। एक नेता के तौर पर अनुरा ने वर्ग संघर्ष जैसे क्लासिकल मार्क्सवादी आदर्शों की जगह, भ्रष्टाचार विरोधी, शासन में सुधार और राष्ट्रवाद पर फोकस किया।
हालांकि अनुरा की जीत का मार्ग जिस बात ने प्रशस्त किया वह था उनका जमीन का बेटा होना। जिन लोगों ने चुनाव पर नजदीक से निगाह रखी है, उनका मानना है कि अनुरा को वोट करना परंपरागत राजनीतिक दलों के खिलाफ एक जनादेश है। जिन्होंने सात दशकों से श्रीलंका पर राज किया। यह बात जनता के बड़े स्तर पर विक्षोभ को दिखाता है।
2009 से 2024 के बीच जेवीपी ने इस लिए प्रमुखता हासिल की क्योंकि स्थापित राजनीतिक पार्टियां, नीतियों के स्तर पर पूरी तरह से फेल साबित हुईं।
इसके साथ ही उनकी जीत का एक और प्रमुख कारण रहा है। वह है यूएनपी पार्टी में विभाजन। जिसमें रानिल विक्रमसिंघे और साजित प्रेमादासा दोनों एक ही राजनीतिक प्लेफार्म से जुड़े होने के बावजूद एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़े।
इस अलगाव के बगैर अनुरा की जीत संभव नहीं थी। ऐसा कहना है गुनेटिलके का।
(ज्यादातर इनपुट इंडियन एक्सप्रेस से लिए गए हैं।)
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