महिला आरक्षण को परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए : राधा कुमार

नीति विश्लेषक राधा कुमार का कहना है कि महिला आरक्षण को जनगणना या निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का इंतेज़ार किए बिना तुरंत लागू किया जा सकता है। उनका यह भी कहना है कि इसे परिसीमन से जोड़ना व्यापक संवैधानिक चिंताएँ पैदा करता है।

लेखिका और नीति विश्लेषक राधा कुमार महिला आरक्षण विधेयक के क्रियान्वयन की लगातार पैरवी करती रही हैं। वह ‘द रिपब्लिक रिलर्न्ट: रिन्यूइंग इंडियन डेमोक्रेसी 1947–2024’ की लेखिका हैं। कुमुदिनी पति ने द फ़ेडरल के लिए उनका साक्षात्कार लिया है, जिसके अंश यहाँ प्रस्तुत हैं।

आप देशभर की अनेक महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर महिला आरक्षण अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए अभियान चला रही हैं। सरकार भी ऐसा ही करना चाहती है। फिर समस्या क्या है?

विधानमंडलों में महिलाओं के आरक्षण के लिए दशकों तक अभियान चलाने के बावजूद, ज़्यादातर महिला संगठनों ने 16–18 अप्रैल 2026 के बीच आयोजित संसद के विशेष सत्र में संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक के विपक्ष द्वारा पराजित हो जाने पर राहत की साँस ली थी। वास्तव में, 131वें संशोधन विधेयक ने महिलाओं के आरक्षण को विधानमंडलों की सीटों के विस्तार, जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया था।

ऐसा करके उसने संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के अंतर्गत विधानमंडलों में परिवर्तन और परिसीमन के लिए निर्धारित उन संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया, जिनका स्वतंत्रता के बाद से केंद्र सरकारें पालन करती आ रही हैं। अब तक सीटों के विस्तार या उनकी संख्या को स्थिर (फ्रीज़) रखने पर विचार केवल प्रत्येक दशक में होने वाली जनगणना के बाद ही किया जाता रहा है। 2021 की जनगणना में विलंब हुआ, और उसके परिणाम दिसंबर 2027 में आने तय हैं।

परिसीमन भी नवीनतम जनगणना के बाद ही किया जाता है, किंतु 131वें संशोधन के साथ प्रस्तुत परिसीमन विधेयक में सीटों के विस्तार के लिए जनगणना की आवश्यकता को समाप्त करने, तथा परिसीमन आयोग के अधिकार-क्षेत्र को केवल निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण तक सीमित रखने का प्रस्ताव किया गया था।

यदि आप कह रही हैं, “अधिनियम अभी लागू करो!”, तो क्या आप लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 किए जाने के पक्ष में हैं? इससे तो सभी बाधाएँ दूर हो जाएँगी। मौजूदा सांसद भी इसका समर्थन करेंगे!

लोकसभा और विधानसभाओं में 50% की भारी वृद्धि के निहितार्थों की अभी कल्पना तक नहीं की गई है, चर्चा होना तो दूर की बात है। सीटों की संख्या के निर्धारण को जनगणना से अलग करने के निहितार्थों पर भी कोई चर्चा नहीं हुई है। फिर भी, ये दोनों कदम उन संवैधानिक सिद्धांतों को त्याग रहे हैं, जो हमारे गणराज्य की आधारशिला हैं—अर्थात् जनता का लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व। क्या ऐसे परिवर्तन पर देशव्यापी परामर्श नहीं होना चाहिए?

आप परिसीमन से जोड़े जाने का विरोध क्यों कर रही हैं?

जम्मू-कश्मीर और असम में हाल ही में हुए परिसीमन भी इसी प्रकार विवादास्पद रहे हैं। दोनों की व्यापक रूप से सांप्रदायिक जेरिमैंडरिंग (निर्वाचन क्षेत्रों की पक्षपातपूर्ण पुनर्सीमांकन) के लिए आलोचना की गई है; वहीं असम के परिसीमन में इसके अतिरिक्त राजनीतिक जेरिमैंडरिंग भी दिखाई पड़ी है। क्या अब होने वाले किसी भी नए परिसीमन की रूपरेखा इस प्रकार नहीं बनाई जानी चाहिए कि देश को सांप्रदायिक और राजनीतिक आधार पर विभाजित होने का जोखिम न उठाना पड़े?

आप और अन्य महिला संगठन विभिन्न राज्यों के सांसदों के साथ पैरवी कर रहे हैं। महिला संगठन किन माँगों को लेकर पैरवी कर रहे हैं?

कुल सीटों के 33% की एक समान दर पर इसे किसी भी आकार के विधानमंडल में लागू किया जा सकता है। इसके लिए निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण आवश्यक नहीं है, क्योंकि इसे वर्तमान निर्वाचन क्षेत्रों पर ही लागू किया जा सकता है। इससे संघीय संतुलन में भी कोई परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि राज्यों को उनकी मौजूदा सीट-हिस्सेदारी के अनुसार आरक्षित सीटें आवंटित की जा सकती हैं।

दुर्भाग्यवश, 2023 के महिला आरक्षण कानून (संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम) ने भी महिला आरक्षण को जनगणना से जोड़ दिया था, और 33% सीटों के चयन के लिए एक परिसीमन आयोग का प्रावधान किया। इसलिए, 131वें संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए महिला संगठन यह माँग कर रहे हैं कि उसकी जगह एक नया संवैधानिक संशोधन लाया जाए, जो 106वें संशोधन अधिनियम में जनगणना और परिसीमन से संबंधित सभी संदर्भों को हटाकर इस भ्रामक संबंध को समाप्त कर दे।

किंतु 106वें संशोधन में जनगणना और परिसीमन से जुड़े संदर्भों को हटाने पर एक और प्रश्न उठता है-यदि परिसीमन आयोग नहीं होगा, तो महिलाओं के लिए आरक्षित 33% सीटों का चयन कैसे किया जाएगा?

क्या इसके लिए आपके पास कोई अचूक फ़ॉर्मूला है?

हाँ। एक विकल्प हो सकता है, पंचायतों में महिलाओं के लिए 33% सीटों के चयन की पद्धति के संशोधित रूप का उपयोग करना। इसे आम तौर पर ‘लॉटरी प्रणाली’ कहा जाता है, क्योंकि इसकी शुरुआत चिट् निकालने (ड्रॉ) से होती है। जिस सीट का नाम ड्रॉ में निकलता है, वह पहली आरक्षित सीट बन जाती है और उसके बाद वर्णक्रम (अक्षरानुक्रम) के अनुसार प्रत्येक तीसरी सीट आरक्षित कर दी जाती है।

लेकिन ड्रॉ में हेरफेर किया जा सकता है; वास्तव में, लॉटरी में ऐसा होना असामान्य नहीं है। इसलिए ड्रॉ को पूरी तरह हटाकर केवल वर्णक्रम के आधार पर चयन करना अधिक सुरक्षित विकल्प हो सकता है, किंतु इससे महिलाओं के आरक्षण के भीतर अनुसूचित जाति–अनुसूचित जनजाति (एससी–एसटी) के आरक्षण की आवश्यकता पूरी नहीं हो सकती है। इसलिए इसे अधिकतम एक प्रारंभिक आधार (पहला मसौदा) माना जा सकता है, जिसकी समीक्षा यह सुनिश्चित करने के लिए करनी होगी कि वह सभी संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो।

इसका समाधान यह हो सकता है कि इस कार्य के लिए विशेष राज्य आयोगों का गठन किया जाए, जिनमें सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के सांसदों तथा विधायकों का समान प्रतिनिधित्व हो, तथा उनमें कम-से-कम एक-तिहाई महिलाएँ हों। वर्तमान ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल में, जहाँ चुनाव आयोग को व्यापक रूप से अपनी निष्पक्षता से समझौता करने वाला माना जाता है, महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के चयन हेतु ऐसे संयुक्त आयोग कुछ हद तक विश्वास बहाल कर सकते हैं।

इन आयोगों की अध्यक्षता दो न्यायाधीश कर सकते हैं, जिनमें से एक का नामांकन विपक्ष करे। जब नया परिसीमन विधेयक प्रस्तुत किया जाए, तब ये आयोग नए परिसीमन आयोग की संरचना और अधिकार-क्षेत्र में परिवर्तन के लिए परीक्षण मॉडल (टेस्ट मॉडल) के रूप में भी काम कर सकते हैं।

कुछ जटिल मुद्दे भी हैं-जैसे देश में संघीय संतुलन बनाए रखना और अधिनियम में ‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ (कोटा के भीतर कोटा) का प्रावधान। क्या इनके बारे में भी आपके पास कोई सुझाव है?

131वें संशोधन विधेयक के स्थान पर लाए जाने वाले नए संशोधन विधेयक में केवल यही परिवर्तन आवश्यक नहीं हैं। उसमें यह भी प्रावधान किया जा सकता है कि कुल सीटों में राज्यों की हिस्सेदारी को यथावत (फ्रीज़) रखा जाए, जैसा कि दक्षिणी राज्य माँग कर रहे हैं, और जिसे स्वीकार करने की ओर मोदी सरकार भी झुकती हुई दिखाई देती है।

उसमें यह भी स्पष्ट किया जा सकता है कि भविष्य में यदि विधानमंडलों में कोई नया आरक्षण लागू किया जाता है, तो वह स्वतः ही 33% में लागू होगा-उदाहरण के लिए, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), विमुक्त (डी-नोटिफाइड) जनजातियों और ट्रांसजेंडर समुदाय जैसे हाशिए पर स्थित तथा वंचित समूहों की महिलाओं के लिए। ऐसी माँगें वर्तमान जनगणना, विशेषकर जाति जनगणना, के परिणाम प्रकाशित होने के बाद उठना लगभग निश्चित है। क्या इन्हें पहले से ध्यान में रखकर उनके लिए प्रावधान करना अधिक विवेकपूर्ण नहीं होगा?

भाजपा के विधायक यह तर्क देते हैं कि महिलाओं के आरक्षण को शीघ्र लागू करने की आवश्यकता के कारण स्थापित संवैधानिक प्रक्रियाओं से हटना आवश्यक था। किंतु वास्तव में महिलाओं के आरक्षण और परिसीमन के बीच स्थापित उनके इसी भ्रामक संबंध ने 2023 के कानून के कार्यान्वयन में तीन वर्ष की देरी कर दी, और संभव है कि आगे भी तीन वर्ष और लग जाएँ। ऐसे में उस भूल से सीख लेकर ऐसा सुविचारित कानून क्यों न बनाया जाए जो लंबे समय तक टिकाऊ हो, और जिसमें बार-बार संशोधन करने की आवश्यकता न पड़े? 

(द फ़ेडरल से साभार।कुमुदिनी पति महिला मुद्दों की स्तंभकार हैं, और प्रयागराज में रहती हैं।मूल इंटरव्यू यहाँ पढ़ सकते हैं)

Leave a Reply