Sunday, October 1, 2023

ग्राउंड रिपोर्ट: गणवा को बचाने के लिए 28 दिन से धरने पर ग्रामीण, उजाड़ने की धमकी दे रहा प्रशासन

उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के गणवा के बाशिंदे बीते 28 दिनों से लगातार आंदोलन पर बैठे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे कई पीढ़ियों से यहां रहते आ रहे हैं। यदि सही मायने में सरकार को जंगल और हमारी फ़िक्र है तो पहले समुचित पुनर्वास की व्यवस्था करे। अन्यथा यदि जबरिया बेदखल करने की कोशिश की गई तो हम लोग आमरण अनशन करेंगे। इसके बाद की जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

दरअसल साल 1978 में गणवा के सैकड़ों ग्रामीणों को वन विभाग ने 30 वर्षों का रहने का पट्टा दिया था, जो साल 2008 में समाप्त हो गया। इसके चलते हाल के वर्षों में वन विभाग और स्थानीय प्रशासन ने नियमों का हवाला देकर पहाड़ी पर स्थित गणवा से गृहस्थी, खेतीबाड़ी, घर-मकान, पशु-मवेशी, अनाज, सामान और फसलों को समेट कर गांव को खाली करने के नोटिस जारी कर दिए हैं।

नोटिस की तामील कराने के लिए जब-तब वन विभाग, पुलिस और प्रशासन के लोग गणवा आ धमकते हैं। ग्रामीणों को गांव छोड़कर चले जाने के लिए धमकाते हैं। आये दिन धमकी और नोटिस से अजीज आकर ग्रामीण बीते 17 जनवरी से गणवा पहाड़ी पर अनिश्चितकालीन धरना दे रहे हैं।

अनिश्चितकालीन धरने पर ग्रामीण

इंसानों की मूलभूत आवश्यकताओं में रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और रोजगार शामिल है। इनमें से एक या दो के अभाव में जीवन का तानाबाना टूटकर बिखरने लगता है। चंदौली जनपद के चकिया तहसील स्थित शिकारगंज- गणवा के 700 से अधिक ग्रामीणों के जीवन पर पलायन का संकट मंडरा रहा है। जैसे-तैसे मुख्यधारा में शामिल होने के लिए संघर्षरत ग्रामीणों को प्रशासन ने अचानक से बेदखली का फरमान जारी कर दिया है।

गणवा का पूरा मामला जमीन को लेकर ग्रामीणों और वन विभाग/ प्रशासन के बीच की खींचतान में उलझा हुआ है। वन विभाग के मुताबिक पट्टा ख़त्म हो गया है, अब गांव और पहाड़ लोग छोड़कर अन्यत्र चले जाएं।

वहीं अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग वन अधिनियम के तहत अपने अधिकारों के तहत यहां से पलायन को राजी नहीं हैं। गणवा को बचाने के लिए कई बार आंदोलन किया जा चुका है। चकिया उपजिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, वन अधिकारी से वार्ता विफल हुई है। इधर, उत्पीड़न से परेशान ग्रामीण आंदोलन की राह पकड़ लिए हैं।

गांववासियों पर पलायन का संकट

मूलभूत सुविधाओं से वंचित गणवा

काशी वन्य जीव प्रभाग में चकिया का अधिकांश हिस्सा हरे-भरे जंगल, नदी, झरने, वनस्पतियों और बांधों से घिरा है। इन जंगलों में खरवार, अगरिया, चेरो, गोंड, बैगा, उरांव, कोरबा, आदिवासी, वनवासी, दलित, किसान, मजदूर और जनजातियों के लोग सदियों रहते आ रहे हैं।

दस-पंद्रह दशक पहले गांवों में जमीनें कम पड़ने और परिवार बढ़ने से भरण-पोषण के लिए दलित, वनवासी, बिन्द, लोहार, नाई, कोइरी, चौहान, गड़ेरिया समेत अन्य जाति के लोग जंगलों के किनारे जाकर बस गए। गणवा भी इसी तरह के भौगोलिक बसाहट में से एक है।

पूर्व, पश्चिम और दक्षिण से विंध्य के पर्वत श्रेणियों से घिरे चार से पांच वर्ग किमी में फैले उबड़-खाबड़ पठारी-पहाड़ी भूभाग पर सैकड़ों लोग कई दशक से विषम परिस्थितियों में निवास करते आ रहे हैं। गौर करने वाली बात है कि गणवा के निवासी आसपास की ग्रामसभाओं में नागरिक और मतदाता भी हैं।

विंध्य के पर्वत श्रेणियों पर बसा गणवा

लेकिन, सरकारी आवास, शौचालय, पेयजल के लिए हैंडपंप, नलकूप, सड़क, गली, स्कूल और अस्पताल आदि की सुविधा से वंचित हैं। पक्की सड़क और चौड़ा रास्ता नहीं होने से बारिश के दिनों में ग्रामीणों को बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। साथ ही पड़ाहों से उतरता हुआ बारिश और चुआड़ के पानी से जगह-जगह जलभराव होने से रास्ते बंद हो जाते हैं।

संकट में 700 लोगों के घर-खेत

गणवा के ग्रामीणों के साथ अनिश्चितकालीन धरने की अगुवाई कर रहे खेग्रामस के चन्दौली जिला उपाध्यक्ष बिजई राम ने ‘जनचौक’ को बताया कि “वर्ष 1978 में पट्टा जारी किया गया था, जो 2008 में निरस्त हो गया।

गणवा में लोग सैकड़ों साल से निवास करते आ रहे हैं। यहां आने-जाने का रास्ता नहीं है। लोग आज भी आवास, पेयजल और तमाम विकास की योजनाओं से वंचित हैं। पचासों साल पुराने कुएं का पानी पीना पड़ता है। जब ग्रामीण पानी के लिए बोरिंग करते हैं तो वन विभाग आकर रोक लगा देता है।

गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव

जल जमाव से रास्ता और घर-मकान को बचाने के लिए मिट्टी की पटाई करने से भी वन विभाग रोकता है। गर्मी और बारिश के दिनों में पेयजल की बड़ी किल्लत होती है। दूषित जल पीने की वजह से सभी संक्रामक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। यहां कुल 127 परिवार और इनकी कुल आबादी 700 लोगों की हैं। लोगों का कहना है कि अधिकार मिलने तक संघर्ष जारी रहेगा। `

यहीं सुकून से मरना चाहती हूं

धरने में शामिल 70 वर्षीय दौला देवी कहती हैं कि “विकास के नाम पर प्रशासन ने सिर्फ हम लोगों को छला है। आंदोलन के बाद मुख्य विकास अधिकारी ने ग्रामीणों से लिखित समझौता किया कि गांव का सुनियोजित विकास किया जाएगा। लेकिन वन विभाग किस्मती देवी के नाम से मिला आवास तक नहीं बनने दिया गया”।

दौला देवी आगे कहती हैं कि “प्रशासन हम गांव वालों से 75 साल का साक्ष्य मांगता है। हम लोगों के पास राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और खाद-बीज समेत कई कागजात मौजूद हैं। पड़ोस के गांव वाले भी इसके गवाह है कि हमारी कई पीढ़ियां गणवा में रहती आई हैं”।

अपनी झोपड़ी के बाहर दौला देवी

दौला देवी कहती हैं कि ‘पट्टे की लंबी अवधि के दौरान हम लोगों को जमीन से जुड़े कागजातों की जरूरत ही नहीं पड़ी। अब हमें क्यों बेदखल किया जा रहा है? हम अपनी समूची गृहस्थी छोड़कर कहां जाएंगे? जानवर, बकरी, खपरैल, हल-बैल, खेत-खलिहान, बच्चे-बुजुर्गों को लेकर कहां रहेंगे और क्या खाएंगे? मुझे कहीं नहीं जाना है, मेरी पूरी उम्र यहीं गुजर गई, अब सुकून से यहीं मरना चाहती हूं”।

वोट के खेल में दांव पर लगा भविष्य

गणवा के नागरिक आसपास के चार ग्राम सभा में मतदान करते हैं। इनमें बलिया कला, बलिया खुर्द, शिकारगंज और जोगिया ग्राम शामिल हैं। प्रधान, जिला पंचायत, विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में वोट के लिए सभी दलों के लोग गांव के विकास और जन सुविधा के विकास का वादा करते हैं। लेकिन चुनाव बीतते ही भूल जाते हैं। ग्राम प्रधान से लेकर विधायक तक की उपेक्षा का शिकार है गांव।

इंकलाबी नौजवान सभा के रमेश चौहान ने बताया कि “लोगों ने गणवा के मुद्दे पर शारदा प्रसाद को बीजेपी के टिकट पर जीताकर विधानसभा भेजा था। चुनाव जीतने के दो साल बाद जब बीजेपी से विधायक शारदा प्रसाद गांव में लौटे तो प्रशासन की भाषा बोलने लगे। प्रशासन के साथ हमारे जनप्रतिनिधियों ने भी हमारी पीठ में छुरा खोपा है। लिहाजा, लिखित पुनर्वास की गारंटी पर ही आंदोलन थमेगा”।

गणवा गांव का एक घऱ

पुनर्वास की मांग

छप्पन वर्षीय शिव चौहान के पिता पट्टाधारक थे। वे कहते हैं कि “गणवा का पूरा इलाका 150 से 200 बीघे में फैला हुआ है। हम लोग इस पर भी सहमत हैं कि सरकार इतने ही जमीन की व्यवस्था करे। जिसमें मकान, सड़क, अस्पताल, साफ पेयजल, स्कूल, शौचालय, खेत-खलिहान और सिंचाई की व्यवस्था कायदे से हो जाए। हमारा पांच भाइयों समेत 50 लोगों का परिवार है। तीन पीढ़ी से यहीं रहते आ रहे हैं”।

शिव चौहान आगे कहते हैं कि “ये जो जमीन है, इसी से परिवार का भरण-पोषण होता है। पट्टा जब से ख़त्म हुआ है, मानो हम लोगों के ऊपर आफत का पहाड़ टूट पड़ा है। प्रशासन आता है और उजाड़ने और भगाने की धमकी देता है। अब यहां से जाने सवाल ही पैदा नहीं होता है। कभी प्रशासन कहता है कि गणवा का विकास करेंगे। फिर उजाड़ने पर आमादा हो जाता है। जाएंगे तो नहीं चाहे, चाहे जान ही क्यों नहीं देनी पड़े”।

16 सदस्यों के परिवार के मुखिया गिरिजा भी 27 दिनों से आंदोलन पर बैठे हैं। वो कहते हैं कि “जब से पट्टा निरस्त हुआ है, जीवन की गाड़ी पटरी से उतर गई है। अब तो रात-दिन यही डर बना रहता है कि वो घड़ी कब आ जाएगी, जब प्रशासन अपने बुलडोजर से हमारे घर-मकानों को तोड़ने आ धमकेगा। इसी चिंता और संघर्ष में आधा पेट खा रहे हैं, लेकिन गणवा को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हमारे पास कोई विकल्प नहीं है सिर्फ आंदोलन के।”

गणवा के ग्रामीण व भाकपा माले, खेग्रामस, किसान महासभा, इंकलाबी नौजवान सभा और ऐपवा ब्लॉक इकाई चकिया के नेतृत्व में धरना जारी हैं।

इनकी प्रमुख मांगे इस प्रकार है-

  • रानी के जीत जाने का अफवाह फैलाकर बैराठ फ़ार्म की जमीन को जोतने वालों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए।
  • बैराठ फार्म व भोका बांध की जमीन को खेती करने के लिए गरीबों में बांटा जाए।
  • वन अधिनियम के तहत दावा करने वाले सभी दावेदारों को उनकी जमीन का मालिकाना हक दिया जाए।
  • गणवा के लोगों को गणवा का निवास प्रमाण पत्र जारी कर विशेष आर्थिक पैकेज से गांव का विकास किया जाए।
  • जिला पंचायत के सेक्टर नंबर 3 को सूखा क्षेत्र घोषित कर नामी एवं बेनामी सभी कृषि भूमि का ₹30,000 प्रति एकड़ की दर से सूखा राहत मुआवजा दिया जाए।
  • भोका बांध की पूर्ण मरम्मत का कार्य अतिशीघ्र किया जाए।
  • सभी गरीबों को आवासीय भूमि, इस्तेमाल करने लायक शौचालय, किचन, बरामदा युक्त तीन कमरे का पक्का मकान दिया जाए।
  • सभी गरीबों को 15 किलो प्रति यूनिट राशन सहित अन्य 14 खाद्य पदार्थ मुफ्त में दिए जाएं।
  • सभी पेंशन धारियों को महंगाई को देखते हुए न्यूनतम पेंशन ₹6000 दिया जाए।
  • सभी गरीबों को मुफ्त शिक्षा तथा मुफ्त इलाज की गारंटी की जाए।
  • सभी मजदूरों को 1 साल में 200 दिन काम व प्रतिदिन ₹600 मजदूरी दी जाए।
  • गरीबों पर लादे गए फर्जी मुकदमों को वापस लिया जाए।
  • कृषि योग्य भूमि की सिंचाई के लिए पानी का इंतजाम किया जाए। 
आंदोलनकारियों की मांगों का पर्चा

इस सम्बन्ध में उपजिलाधिकारी ज्वाला प्रसाद ने ‘जनचौक’ को बताया कि उक्त गांव का पट्टा निरस्त हो गया है। नियमानुसार कार्रवाई की जा रही है। ग्रामीणों को हर प्रकार की वस्तुस्थिति से अवगत करा दिया गया है। नेटवर्क में दिक्कत होने की वजह से फोन कट गया और आगे बात नहीं हो सकी। 

क्यों न पट्टे की अवधि को दुबारा बढ़ा दिया जाए

चंदौली के युवा पत्रकार राजीव कुमार सिंह कहते हैं कि “स्थानीय प्रशासन, चकिया के बहेलियापुर बंधी और जंगलों में आदिवासी, जनजाति और अनुसूचित जन जाति के लोगों का अतिक्रमणकारियों की आड़ में उत्पीड़न कर रहा है। ठीक इसी फार्मूले को गणवा में अपनाया जा रहा है”।

राजीव आगे कहते हैं कि “गणवा में दलित, किसान और वनवासी समेत अन्य जातियों के लोग सत्तर से अधिक वर्षों से रहते आ रहे हैं। इनका पूरा जीवन तंत्र यहां की भौगोलिक स्थिति से जुड़ा है। इन्हें जबरिया पलायन कराये जाने पर गणवा और चकिया के दर्जनों गांवों में आक्रोश और विद्रोह भड़कने की आशंका है। लिहाजा, शासन और प्रशासन को मानवीय मूल्यों को ध्यान में रखकर अपने फैसले पर विचार करना चाहिए”।

सात दिसंबर 2020 को लखनऊ में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि “अनुसूचित जाति-जनजाति के जो लोग ग्राम समाज की भूमि पर लम्बे अरसे से रह रहे हैं। उन्हें विस्थापित नहीं किया जाएगा व उनके विनियमतीकरण की कार्रवाई की जाएगी”।

मुख्यमंत्री ने कहा था कि “अनुसूचित जाति और जनजाति को जब तक घर न मिल जाए, तब तक किसी भी प्रकार की जमीन से नहीं हटाया जा सकता।” यहां तो वन विभाग की पट्टे वाली जमीन रही है। फिर प्रशासन इतना उदासीन क्यों बना हुआ है? क्यों न पट्टे की अवधि को दुबारा बढ़ा दिया जाए। 

(चन्दौली से पवन कुमार मौर्य की ग्राउंड रिपोर्ट)  

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