राजनीतिक फॉर्मेट में सांस्कृतिक, सभ्यता संघर्ष से गुजर रहा है भारत

आम लोगों के लिए जारी राजनीतिक घमासान को ठीक से समझने की जरूरत है। इसे सिर्फ राजनीतिक संघर्ष के रूप में देखना भूल है। इस समय राजनीतिक फॉर्मेट जो संघर्ष सामने है उस के पीछे की कहानी भारतीय संस्कृति की शिराओं, ऐतिहासिक प्रतिरोध, प्रतिध्वनियों और सांस्कृतिक-सामाजिक वर्चस्व की उत्पीड़कताओं से भी बहुत गहरा है। यह सामान्य संसदीय राजनीति का ही संघर्ष नहीं है, यह भारतीय संस्कृति के आत्म-चरित का सभ्यता संघर्ष भी है।

अति-प्राचीन समय के राजघरानों के अंतःपुर और राजनीति की द्वेष-पूर्ण दुष्ट युक्तियों का प्रयोग इस समय भारत की संसदीय राजनीति में बहुत तत्परता से शासक समूह कर रहा है। अपनी गलतियों के फंदों से बाहर निकलने की कोशिश करने के बदले दूसरों के गले में काल्पनिक गलतियों की डोरी डालने की कोशिश की जा रही है। भारत के उच्च सदन में संविधान पर हुई चर्चा के दौरान अपने भाषण में यशस्वी गृहमंत्री अमित शाह ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नाम का उल्लेख जिस तरह की भाव-भंगिमा के साथ किया वह बहुत ही निम्न स्तरीय और अपमानजनक था। बेहूदगी से भरा हुआ था। स्वाभाविक ही है कि इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया होनी थी।

इंडिया गठबंधन के नेताओं और खासकर मल्लिकार्जुन खड़गे जो उच्च सदन में सक्षम नेता प्रतिपक्ष हैं ने विरोध का जोरदार तौर-तरीका अपनाया। मल्लिकार्जुन खड़गे भारत की संसदीय राजनीति के न सिर्फ अनुभवी नेता हैं, बल्कि दलित समुदाय से आते हैं। वे इस समय कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं। जाहिर है कि राहुल गांधी के भी नेता हैं। राहुल गांधी समेत विपक्ष के मुखर नेताओं ने जिस तरह का राजनीतिक रुख अपनाया हुआ है उस से भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक मुश्किलें काफी बढ़ी हुई है।

भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के जन्म-लग्न से ही महान विचारक, समाज सुधारक, और विधि-विशेषज्ञ राजनीतिज्ञ के रूप में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस खासकर जवाहरलाल नेहरू हमेशा से गहरी चुनौती रहे हैं। अपने जन्म-लग्न से ही इस चुनौती से जूझते रहे हैं। भारत की आजादी के आंदोलन के समय वे गुप-चुप तरीके से अपना काम करते थे। हालांकि इनके इरादों से भारत के अधिकतर नेतागण वाकिफ थे।

कांग्रेस में विविध और विभिन्न अंतःप्रवाही विचारधाराएं सक्रिय रही हैं। इन विचारधाराओं के बीच वास्तविक विरोध, आभासी विरोध और निरंतर चलते रहनेवाले राजनीतिक संघर्ष की स्थितियों को देखा जा सकता है। भारत की बसावट जत्थों में हुई है। सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर, कांग्रेस अंतःप्रवाही विचार लिए आजादी के आंदोलन के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा करती रही। जहां तक संभव हुआ कांग्रेस ने तो अपना असल किरदार बदला और न एक हद के बाद अपने मिट जाने की कभी परवाह की।

कांग्रेस में अंदरूनी टकराव की स्थिति लगातार बनी रही। अपना विरोध खुद रचकर अपने विरोधियों को अपने अंदर सम्मानजनक ढंग से समायोजित करना हर-बार संभव नहीं हुआ। कांग्रेस छंटती-बंटती रही। दक्षिण-पंथ पहले अलग होना शुरुआत हुआ और उस का बहुत बड़ा हिस्सा अलग हो गया। कांग्रेस ने अपने वाम-झुकाव लिये बीच की स्थिति को बनाये रखने में कामयाब रही। किसी भी विचारधारा के मानवीय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर खरे उतरने की एक प्रगतिशील कसौटी यह भी होती है कि वह असहमति के लिए अपनी संरचना में कितनी वास्तविक और व्यावहारिक गुंजाइश रखती है।

वाम-झुकाव लिये बीच की स्थिति कांग्रेस की विचारधारा की ही नहीं उस की शासकीय नीति में भी अपनाई जाती रही। जवाहरलाल नेहरू की आर्थिक पहल से लेकर इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कार्यालय की संरचना और नीतिगत फैसलों में इस की झलक देखी जा सकती है। वैचारिक लचीलापन किसी भी विचारधारा की आत्मा होता है। इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कार्यालय में संजय गांधी के बढ़ते प्रभाव से अंतर आना शुरू हो गया था।

इमरजेंसी में सत्ता से बाहर हुई इंदिरा गांधी जब सत्ता में लौटी तो विभिन्न कारणों से उन की राजनीति की रंगत में बदलाव होने लगा था। सुदृढ़ इरादों के लिए विख्यात इंदिरा गांधी के अंदर भिन्न तरह की समझौतावादी रुझान का दबाव बढ़ने लगा था। व्यक्तिगत स्तर पर दक्षिण-पंथी विचारधारा के प्रभाव में न पड़ जाने के बाद भी उन के आध्यात्मिक रुझान से इनकार नहीं किया जा सकता है। इंदिरा गांधी की शहादत के बाद राजीव गांधी के पास अपराजेय बहुमत सिमटकर आ गया।

इस अपराजेय बहुमत के स्थाई होने के मनोभाव ने उन की वैचारिक और व्यावहारिक दृष्टि के लचीलापन में दुष्टताओं को पहचानने में अक्षम उदारता के लिए काफी जगह बन गई। उस के कई नकारात्मक प्रभाव कांग्रेस और भारत की राजनीति में प्रकट हुआ। जैसे भी हुआ और उस के पीछे की जो भी कहानियां हो लेकिन वह हुआ जिस के अच्छे-बुरे नतीजे आज भी गहरे अर्थ में जिंदा हैं। तीन की ओर इशारा करना काफी होगा। शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसला में बदलाव, विवादित राम जन्म-भूमि का ताला खुलवाना, कंप्यूटर ‘क्रांति’ की तरफ लपकना।

राजीव गांधी की हत्या के बाद एक तरह से राजनीतिक-खित्ता में खालीपन बढ़ गया। बाद के दौर में उदारीकरण-निजीकरण-भूमंडलीकरण (उनिभू) के माहौल से राजनीतिक आबो-हवा लोक कल्याणकरी राज्य के विरुद्ध हो गई। दे-लेकर यह कि पूरी दुनिया की हवा बदल रही थी, हवा भारत की भी बदल रही थी। यह बदलती हुई हवा कांग्रेस की राजनीति के अनुकूल नहीं रह गई थी।

परंपराओं के गहन-वन में सिर्फ औषधीय जड़ी-बूटियां ही नहीं होती हैं, बल्कि विषैली वनस्पतियां भी होती हैं। औषधि के नाम पर विष के चयन का खतरा हमेशा बना रहता है। जब जीवन में तर्क ही लगातार स्थगन का शिकार हो रहा हो तो तरह-तरह का अंधत्व अनिवार्य हो जाता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते भारतीय जनता पार्टी के दस साल के शासन और राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के बढ़ते हुए प्रभाव ने साबित कर दिया है कि तत्सम-वाणी का तद्भव-प्रभाव और देशज-निभाव कैसा होता है।

अशालीन, अमर्यादित, अशोभनीय, उद्दंड ये शब्द नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए सरकार के मंत्री ने कहे हैं। और चाहे जो हो, इस से किसी को अपमानित करने के लिए शब्द-शक्ति पर ‘तत्सम-वाचकों’ की पकड़ बहुत जबरदस्त होती है। मुश्किल यह है कि शब्द-शक्ति पर पकड़ जितनी गहरी होती है, उस के अर्थ की समझ उतनी ही उथली होती है और दोनों का जीवन की वास्तविकताओं से बहुत थोड़े का ही देना-लेना होता है।

शब्दों के हेर-फेर से इस तरह के उद्गार सरकार के हित-साधकों के मुखारविंद से झड़ रहे हैं। आखिर संविधान पर चर्चा के दौरान सरकार का पक्ष रखते हुए उच्च-सदन में निम्न-उद्गार का अवसर कैसे आया! लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बारे में अशालीन, अमर्यादित, अशोभनीय, उद्दंड शब्दों के प्रयोग की नौबत कैसे और क्यों आई?

गृहमंत्री अमित शाह ने जिस लापरवाही और अपमानजनक तरीके से 17 दिसंबर2024 को चर्चा के दौरान डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का उल्लेख किया वह न सिर्फ बाबासाहेब को अपमानित किया बल्कि समानता और मानवाधिकार के सभी पहलुओं पर हमला किया है। जाहिर है कि यह एक ऐसा कृत्य भारत में सियासी तूफान लाने के लिए काफी था। महात्मा गांधी के खून का आरोप को पचा चुके संघ परिवार के लिए जवाहरलाल नेहरू पर रात-दिन हमला करने जितना आसान नहीं होनेवाला है, अपमानजनक तरीके से बाबासाहेब के नाम का उल्लेख करना।

यह सब तो ठीक है, लेकिन सौ टके का सवाल तो यह है कि क्या वैचारिक मतांधता के कारण अमित शाह डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जानबूझकर किसी रणनीति के तहत हमलावर हुए! यह जुबान की फिसलन है! आधुनिक ‘कौटिल्य’ की जुबान इस तरह से फिसल नहीं सकती है। क्या पता, क्या हुआ! तथ्य को अपनी जगह खामोश करने की कोशिश की तेवर में गजब की तड़तड़ाहट है।

किस्सा की शुरुआत गौतम अदाणी समूह के घूस कांड पर सरकार के भीतर हाहाकार मचा हुआ है। लोकलाज और लिहाज करते हुए सरकार को अदाणी समूह के कारनामे से थोड़ा अलग दिखते हुए अपना काम करना चाहिए था। लेकिन आम लोगों में यह आम समझ है कि अपने औद्धत्य के चलते अदाणी समूह पर चर्चा से बचने के लिए सरकार के लोग यह सब कर रहे हैं। राहुल गांधी एक तरफ डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के अपमान के जबरदस्त विरोध को तो नेतृत्व दे ही रहे हैं दूसरी तरफ संविधान पर हुई चर्चा को भी बेपटरी नहीं होने दे रहे हैं और न अदाणी से जुड़े मुद्दों को ही ओझल होने दे रहे हैं।

इस समय देश की राजनीति में ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों का जबरदस्त वर्चस्व है। बाबासाहेब ने देश के लिए ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद की चुनौतियों की चेतावनी से राष्ट्र को पहले ही अवगत करवा दिया था।

बाबासाहेब हिंदू समाज में नैतिक सुधार की जबरदस्त जरूरत को महसूस कर रहे थे। शुरू-शुरू में कांग्रेस राजनीतिक कमजोरियों को समझने, परिभाषित करने और उसे दूर करने के लिए अधिक चिंतित थी। लेकिन साथ-साथ अपने सोशल कांफ्रेंस के जरिये हिंदू समाज की नैतिक समस्याओं को समझने और दूर करने की कोशिश करती थी। राजनीतिक कमजोरियों का संबंध निश्चित रूप से पूंजीवादी गुत्थियों से था और हिंदू समाज में नैतिक सुधार का विरोध हिंदुत्व की विचारधारा से था।

बाबासाहेब की पुस्तक ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी ने बाबासाहेब को हिंदुत्व के लिए एक चुनौती बताया था। जाहिर है कि हिंदुत्व भी बाबासाहेब के लिए चुनौती थी। बाबासाहेब ने संविधान लिखे जाने का अवसर मिलते ही इस चुनौती का निर्णायक मुकाबला किया। देखा और समझा जा सकता है कि क्यों दक्षिण-पंथ शुरू से ही संविधान को दिल-दिमाग से अपनाने से हिचकता है। संविधान हिंदू विरोधी बिल्कुल नहीं है। लेकिन अनिवार्य रूप से हिंदू की राजनीतिक विचारधारा जिसे हिंदुत्व कहा जाता है उस हिंदुत्व का विरोधी है।

इस संविधान और इस सरकार के संबंध को इस परिप्रेक्ष्य के बिना समझा ही नहीं जा सकता है। सरकार के संविधान के प्रति नकारात्मक नजरिये के आगे बढ़ने के रास्ता पर बाबासाहेब खड़े हैं। इसलिए वे मुंह से चाहे जो कहें अपने विचारधारात्मक आग्रहों के चलते वे बाबासाहेब के प्रति सम्मानशील नहीं हो सकते हैं। राहुल गांधी और विपक्षी गठबंधन (इंडिया अलायंस) संविधान और बाबासाहेब दोनों को अपनी राजनीति के लिए रक्षा-कवच की तरह अपनाये हुए हैं।

जाहिर है कि इसलिए भी राहुल गांधी जो कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, इन के सीधे निशाने पर हैं। अब तो बात धक्का-मुक्की तक भी पहुंच गई है। उन पर तरह-तरह के आरोप लगे हैं, आज भी लगाये जा रहे हैं। अदालत और कानून के आयुधीकरण में संविधान और बाबासाहेब सब बाधक हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ को मालूम है कि इस बार यदि वह अपना सपना पूरा नहीं कर सकी तो फिर शायद ही कभी अवसर मिले।

इसलिए बाबासाहेब के प्रति किये गये अपमान के लिए माफी मांगने और राहुल गांधी को चाहे जैसे भी दबाने के अपने कार्यक्रम से उन के पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है। जो हो संसदीय शिथिलता की स्थिति में फैसला तो सड़क पर ही हो सकेगा। संघर्ष संसद में भी होगा और सड़क पर भी होगा। देखा जाये अभी क्या-क्या देखने को मिलता है। राजनीतिक फॉर्मेट में सांस्कृतिक, सभ्यता संघर्ष से गुजर रहा है भारत!

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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