मंच से हरियाली बचाने के वादे, और फ़ाइलों में पेड़ों की कटाई के आदेश

मंच से हरियाली बचाने के वादे, और फ़ाइलों में पेड़ों की कटाई के आदेश- ये पंक्तियाँ आज जयपुर की राजनीति और पर्यावरण से जुड़े प्रश्नों के परिदृश्य में बिल्कुल सटीक बैठती हैं।

कैसे?

चलिए इसे एक घटना से समझते हैं-

5 जून की सुबह भाजपा बीट को कवर करने वाले पत्रकारों के व्हाट्सऐप ग्रुप पर एक संदेश आता है, जिसमें लिखा था कि विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ मीडिया को संबोधित करेंगे। संदेश मिलते ही सारे पत्रकार तुरंत अपना सारा तामझाम लेकर भाजपा कार्यालय पहुँच पड़ते हैं। कुछ देर प्रतीक्षा के बाद प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ कार्यालय पहुँचते हैं। अपनी गाड़ी से उतरते ही वे कार्यालय के बाहर वृक्षारोपण करते हैं। मौजूद मीडिया अच्छी तरह उनकी बाइट लेती है, फ़ोटो खींचती है।

उन्होंने प्रदेश की जनता से भी आह्वान किया कि अभी मानसून वृक्षारोपण के लिए उपयुक्त समय है, अतः केवल एक पेड़ लगाकर इतिश्री न करें, बल्कि अधिक से अधिक संख्या में पेड़ लगाएँ और पर्यावरण को सुरक्षित करें। इसके साथ ही उन्होंने अपनी पार्टी और मुख्यमंत्री भजनलाल द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाए जा रहे क़दमों का भी उल्लेख किया, जैसे “हरियालो राजस्थान” और “एक पेड़ माँ के नाम” जिसमें हर साल 10 करोड़ पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया है।

इसी तरह विधायक एवं भाजपा प्रदेश महामंत्री जीतेंद्र गोठवाल ने भी पर्यावरण संरक्षण के लिए एक पहल शुरू की, जिसमें यदि सरकारी विद्यालयों के शिक्षक कम से कम 20 पौधे लगाएँगे और उनका संरक्षण करेंगे, तो उनकी तबादले की अर्जी शिक्षा विभाग में भेजी जाएगी। इसे “शिक्षक-प्रेरित हरियाली अभियान” नाम दिया गया, जिसका उद्देश्य न केवल पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना था, बल्कि शिक्षकों को भी इस दिशा में सक्रिय रूप से जोड़ना था, जिससे समाज में पर्यावरण के मुद्दे को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा सके।

अब आप राजनीति के इस वास्तविक और दोहरे चरित्र को किन शब्दों या मुहावरों से परिभाषित करेंगे? क्योंकि पर्यावरण संरक्षण को लेकर ये सब ‘नाटक’ उस शहर और राज्य में हो रहा है, जहाँ की राजधानी में मौजूदा सरकार 2500 पेड़ों को काटने पर आमादा है।

“ढोल का बाड़”- पिछले कुछ महीनों से यह नाम सोशल मीडिया पर फिर से ट्रेंड कर रहा है, क्योंकि सरकार यहाँ पेड़ों को काटकर प्रधानमंत्री के नाम पर “यूनिटी मॉल” और “फ़िनटेक पार्क” बनाने जा रही है, जिसका लोग विरोध कर रहे हैं। विरोध करने वाले लोगों का स्पष्ट तर्क है कि यह जयपुर का एकमात्र ऐसा हरित क्षेत्र है जो जैव विविधता से भरा हुआ है। यदि यहाँ पेड़ काटे जाते हैं, तो इससे वायु गुणवत्ता में गिरावट, तापमान में वृद्धि, ऑक्सीजन में कमी जैसे विभिन्न नकारात्मक परिणाम सामने आएँगे। पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा, जलवायु परिवर्तन तीव्र होगा और अंततः इसका खामियाज़ा जयपुरवासियों को ही भुगतना पड़ेगा।

इसे बचाने के लिए ही सिविल सोसाइटी और छात्र-युवा मिलकर “सेव ढोल का बाड़” नामक आंदोलन चला रहे हैं। आंदोलन करने वाले लोगों की माँग है कि सरकार इस क्षेत्र को “बायोडायवर्सिटी पार्क” घोषित करे।

हालाँकि, इस पर सरकार का सीधा तर्क है कि यह पूरी ज़मीन आधिकारिक रूप से रीको (RIICO) के पास है, जो कि राज्य सरकार की ही एक कंपनी है। इसलिए सरकार का अधिकार है कि वह वहाँ जो चाहे निर्माण कर सकती है। और जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, वे क़ानून का उल्लंघन और सरकार के विकास कार्यों में बाधा पहुँचा रहे हैं।

इसलिए जब भी लोग यहाँ प्रदर्शन करते हैं, तो भारी पुलिस बल तैनात कर दिया जाता है, प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया जाता है और वे सारे हथकंडे अपनाए जाते हैं जो आम तौर पर एक प्रदर्शन को दबाने के लिए किए जाते हैं।

भले ही एक पक्ष से यह बात सही हो कि यह ज़मीन रीको की है और सरकार को यहाँ निर्माण का कानूनी अधिकार है, लेकिन इस तर्क के अनुसार तो अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ हवा व प्रदूषण-मुक्त वातावरण हर नागरिक को मिलना उसका मौलिक अधिकार है।

तो کیا राज्य सरकार जयपुर के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर रही है?

दरअसल, यहाँ सवाल किसी सरकार को निर्माण का कानूनी अधिकार है या नहीं- इसका नहीं है, बल्कि इससे भी अधिक गंभीर सवाल यह है कि राज्य, देश और विश्व की तमाम सरकारें विकास और निर्माण जैसे शब्दों के नाम पर कब तक पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करती रहेंगी?

दुनिया भर में सतत विकास को लेकर बहस तेज़ हुई है।

विकास हो- लेकिन किन शर्तों पर?

उसकी क़ीमत क्या हो?

इन प्रश्नों पर मंथन तेज़ हो रहा है।

इसी का परिणाम है कि देश और दुनिया की तमाम सरकारें इस दबाव को महसूस करने लगी हैं, और शायद यही कारण है कि आपको वैश्विक मंचों पर ग्लोबल लीडर्स सतत विकास की- भले ही औपचारिकतापूर्ण सही, लेकिन वकालत करते नज़र आ जाते हैं।

इसका एक उदाहरण 2023 में भारत में हुआ G20 सम्मेलन है, जिसमें एक मुख्य बिंदु था- सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य देखकर लगता है कि ये लक्ष्य केवल “लक्ष्य” ही बनकर रह जाएँगे, क्योंकि राजनीति को पीछे से नियंत्रित करती पूँजी इसकी अनुमति फिलहाल तो नहीं ही देती दिखाई दे रही है।

जैसा कि मैंने प्रारंभ में ही लिखा, आज की राजनीति को परिभाषित करने के लिए शब्द और मुहावरे भी कम पड़ जाएँगे। इसे इस संदर्भ में भी समझा जा सकता है कि जब राज्य में गहलोत सरकार थी, तब वह भी इन्हीं पेड़ों की कटाई को लेकर आमादा थी, और उस समय वर्तमान उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी इसके विरोध में पर्यावरण संरक्षण का झंडा उठाए हुए थीं। और अब जब भजनलाल सरकार इन पेड़ों को काटने जा रही है, तो कांग्रेस इसका विरोध कर रही है।

ख़ैर, सरकारें और राजनीतिक दल इन दोहरे मानदंडों पर ही चलते रहेंगे- वे अब इसके आदि हो चुके हैं। अब सोचने की ज़रूरत तो जनता को है, और उसमें भी विशेष रूप से शहरी मध्यम वर्ग को। क्योंकि इसी शहरी वर्ग के अधिकांश हिस्से को कुछ वक्त पहले तक अपने जंगल बचाने वाले आदिवासी बड़े ‘अखरते’ थे- उन्हें विकास-विरोधी मानकर उनकी हत्या पर मौन स्वीकृति दी जाती थी। और यह मौन स्वीकृति का ही नतीजा है कि अब सत्ता की अगली नज़र आपके शहरों पर है। जयपुर, हैदराबाद जैसे उदाहरण अब सामने हैं, जहाँ सरकारें शहरों में बची-खुची हरियाली को भी नष्ट करने पर आमादा हैं- जिससे न आप स्वच्छ साँस ले सकें, न ही आपकी आने वाली पीढ़ियाँ।

इसलिए मध्यम वर्ग को आज ज़रूरत है कि वह शहरी चकाचौंध की परतें उतारे, सिस्टम द्वारा दिमाग़ में बैठा दी गई विकास की जो तस्वीर है- उसे मिटाकर नई परिभाषा गढ़े, विकास के नए पैमाने बनाए, और सबसे ज़रूरी, इसे एक राजनीतिक प्रश्न बनाए। क्योंकि शहरों में “नॉन-पॉलिटिकल” होना भी एक ट्रेंड है।

लेकिन पर्यावरण के संकट का सवाल पूरी तरह से राजनीतिक सवाल है और बिना राजनीतिक हुए इसे हल नहीं किया जा सकता।

(जयपुर से मानस भूषण की रिपोर्ट)

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