सोनम जी का मारक ‘सच’

सोनम वांगचुक सच बोल देते हैं। तत्काल नहीं बोलते, सबके सामने नहीं बोलते, लेकिन किसी न किसी के आगे बोल देते हैं। और हां, बोलने में देर करते हैं लेकिन इतनी देर नहीं करते कि देर हो जाए।

अन्ना की याद

अब यही देखिए कि पेपर लीक के मुद्दे पर वे कॉक्रोच जनता पार्टी के साथ जुड़ गए। यहां तक कि इस नई पार्टी के सर्वेसर्वा अभिजीत दिपके का साथ देते हुए वे उनसे भी आगे निकल गए। दिपके ने तो जंतरमंतर पर सिर्फ धरना दिया, सोनम भाई अनशन पर बैठ गए। और बैठे तो कुछ इस अदा में बैठे कि लोगों को डेढ़ दशक पहले के अन्ना हजारे याद आ गए। तब भी, आंदोलन शुरू करने वाले अन्ना नहीं थे। आंदोलन केजरीवाल ने शुरू किया था।

अचानक एंट्री का रहस्य

मंच सज जाने के बाद अन्ना आए और छा गए। सोनम वांगचुक भी लगभग छा ही गए थे। अन्ना के टाइम में भी पूछा जा रहा था कि आखिर केजरीवाल के इस आंदोलन में उनकी एंट्री कैसे हुई। वे तो महाराष्ट्र के कुछ खास मंत्रियों के, वह भी कुछ खास विभागों के, घोटालों को मुद्दा बनाने के लिए जाने जाते थे। ऐसा क्या हो गया कि वह अचानक केंद्र सरकार के स्तर पर हो रहे भ्रष्टाचार के दुश्मन बन गए।

एलजी साहब का अनुरोध

आप देखिए कि अन्ना ने इसका जवाब आज तक नहीं दिया कि आखिर वे किसके कहने पर केजरीवाल से जुड़े थे। पर वांगचुक ने सच बोल दिया। तुरंत नहीं बोला, जंतर मंतर के मंच से युवाओं को संबोधित करते हुए नहीं बोला, लेकिन इससे पहले कि देर हो जाए, बोल दिया कि उन्हें एलजी साहब ने कहा था दिपके से मिलने को। अब एलजी साहब का कहा भला कौन टाल सकता है। खासकर अगर आप लद्दाख के हों और आपके कई सारे प्रॉजेक्ट सरकार की मर्जी पर पर निर्भर करते हों तो एलजी साहब के सुझाव या उनके अनुरोध को आप यूं ही ठुकरा नहीं सकते।

साहबों की मर्जी

और जब एलजी साहब का कहा नहीं ठुकरा सकते, तो उनके साहबों का कहा भला कैसे टाल सकते हैं। तो, जब तक उन साहब के साहबों ने चाहा, सोनम जी जंतर मंतर पर बैठे रहे। जब साहबों की मर्जी हुई, उन्हें वहां से उठवा कर हॉस्पिटल शिफ्ट कर दिया गया। सोनम जी ने चूं नहीं किया। वे सत्यवादी तो हैं ही, समझदार भी कम नहीं। इसलिए उनके लिए ‘इशारा’ काफी होता है। नहीं, मराठी वाले इशारे (चेतावनी) की जरूरत नहीं पड़ती, हिंदी वाला इशारा (संकेत) ही काम बना देता है।

कन्फ्यूजन ही कन्फ्यूजन

दिक्कत यह रही कि खुद साहब लोग ही कन्फ्यूज थे। पहले अनशन तोड़ने का इशारा किया तो सोनम जी ने तीन-चार ऑप्शन दे दिए कि इनमें से कोई भी एक बात मान ली जाए, मैं अनशन तोड़ दूंगा। इन ऑप्शंस में स्वाभाविक ही मंत्री जी का इस्तीफा शामिल नहीं था। उसे वह बड़ी आसानी से गोल कर गए, क्योंकि साहब लोगों के इशारे से समझ चुके थे कि यह मांग उन्हें असहज करता है। इससे पहले कि इन तीनों-चारों ऑप्शन में से कोई एक स्वीकार किया जाता, अचानक हालात बदले औऱ साहबों का इशारा भी, बस सोनम जी ने भी बयान बदल दिया। बोले, ‘अब मैं अनशन नहीं तोड़ूंगा।‘

बड़े साहब का संदेश

सब कन्फ्यूज थे, सोनम जी भी इंतजार करते रहे कि बड़े वाले साहब का कन्फ्यूजन दूर हो। आखिर वह दूर हुआ। बड़े साहब ने कह दिया कि सोमवार से संसद के मौजूदा सत्र का दूसरा सप्ताह शुरू हो रहा है। इशारा साफ था कि उससे पहले यह सारा झंझट समेट लिया जाए। तुरंत नड्डा साहब हॉस्पिटल पहुंचे और उनके कहने पर उन्हीं के हाथों जूस पीते हुए सोनम वांगचुक जी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया।

सबसे बड़ा सवाल

कई लोगों ने सवाल उठाया कि प्रधान जी के इस्तीफे के बगैर अनशन क्यों तोड़ा। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह था कि आखिर एलजी साहब ने उन्हें ही क्यों चुना इस आंदोलन में भेजने के लिए। सोनम जी ने इस सवाल का भी सच-सच जवाब दे दिया। अनशन तोड़ने के बाद अपने समर्थकों को भेजे विडियो संदेश में संत सोनम जी ने पूरी सादगी से बता दिया कि ‘असल में मेरा दिमाग थोड़ा अलग ढंग से चलता है’। अलग ढंग से मतलब?

अलग तरह का दिमाग

सोनम जी ने यह भी स्पष्ट किया। आम दिमाग समझ रहा था कि सरकार के मंत्री का इस्तीफा मांगना सरकार के लिए परेशानी खड़ी करना है और इस मांग से पीछे हटना मतलब सरकार को राहत देना। लेकिन सोनम जी का दिमाग बता रहा है, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा न देने से नुकसान सरकार का ही है। यानी इस दिमाग के हिसाब से चलें तो राहुल गांधी समेत सभी विपक्षी नेताओं और जंतर मंतर पर बैठे तमाम युवाओं को इस्तीफे की मांग छोड़ देनी चाहिए क्योंकि इस्तीफा देने से सरकार का फायदा होगा और प्रधान जी अपने पद पर बने रहें तो सरकार का नुकसान होगा।

स्वास्थ्य का खयाल

ऐसे में क्या आश्चर्य कि खुद मोदी जी ने सोनम जी से अब आगे अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखने को कहा है। आखिर उनके इस दिमाग का सुरक्षित रहना जरूरी है ताकि आगे भी वक्त-जरूरत उसका इस्तेमाल किया जा सके।

(प्रणव प्रियदर्शी ‘जनसत्ता’, ‘लोकमत समाचार’ और ‘नवभारत टाइम्स’ में लंबी पत्रकारीय पारी के बाद फ़िलहाल स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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