संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन: यूपी में स्कूलों का मर्जर गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित करेगा

योगी सरकार ने एक फैसले के तहत 5000 प्राथमिक स्कूलों को एक झटके में बंद कर दिया है। बताया जा रहा है कि जिन स्कूलों में 50 से कम छात्र थे, उन्हें बंद कर दिया गया। माननीय उच्च न्यायालय ने भी इस फैसले पर मुहर लगाते हुए इसे वैध ठहराया है। कोर्ट का कहना है कि यह नीतिगत निर्णय शिक्षा की गुणवत्ता और संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए आवश्यक है। इसके खिलाफ छात्रों और नागरिकों द्वारा दाखिल याचिकाएं खारिज कर दी गईं।

इसका असर क्या होगा?

इस फैसले से लाखों छात्र शिक्षा से वंचित हो सकते हैं और हजारों शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है। उत्तर प्रदेश जैसे शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े राज्य में जहां और स्कूल खोलने की जरूरत थी, वहां 5000 स्कूल बंद करना एक त्रासद निर्णय है। दक्षिण भारत के राज्य शिक्षा, रोजगार और समृद्धि में हमसे मीलों आगे हैं, क्योंकि उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में एक स्कूल में केवल एक छात्रा पढ़ती है, फिर भी उसे बंद नहीं किया गया।

उत्तर प्रदेश में जरूरत थी कि स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होने के कारणों का पता लगाया जाता। बच्चों और अभिभावकों को प्रोत्साहन, स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और आकर्षक माहौल बनाया जाना चाहिए था। इसके बजाय, आसान रास्ता चुनते हुए स्कूलों को बंद कर दिया गया। दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों की कब्र पर निजी स्कूल फल-फूल रहे हैं। नियमों के अनुसार, सरकारी स्कूल के एक किलोमीटर के दायरे में निजी स्कूल नहीं खुल सकता। कहीं यह फैसला निजी शिक्षा माफिया और सरकारी सांठगांठ का परिणाम तो नहीं?

यह फैसला गरीब परिवारों के बच्चों को सबसे अधिक प्रभावित करेगा, जो न तो नजदीकी निजी स्कूलों में पढ़ सकते हैं और न ही दूर के सरकारी स्कूल तक जा सकते हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने अपनी पुस्तक Argumentative Indian में स्थापित किया है कि चीन ने अपनी मानव संपदा, विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य, में भारी निवेश कर महाशक्ति का दर्जा हासिल किया, जबकि भारत इस मामले में पिछड़ गया। यही तर्क राज्यों पर भी लागू होता है। उत्तर प्रदेश में साक्षरता दर मात्र 67.68% है, और महिलाओं में यह और भी कम, लगभग 57% है। यह शर्मनाक है कि आजादी के 78 साल बाद भी राज्य अपनी पूरी आबादी को साक्षर नहीं बना पाया।

शिक्षक संघ और विपक्ष का विरोध : इस फैसले के खिलाफ शिक्षक संघ सड़कों पर उतर आए हैं। उनका कहना है कि प्राथमिक शिक्षा पहले ही खस्ताहाल है, और यह फैसला इसे पूरी तरह बर्बाद कर देगा। सरकारी आदेश के मुताबिक, 150 से कम छात्रों वाले प्राथमिक स्कूलों और 100 से कम छात्रों वाले स्कूलों में हेडमास्टर के पद भी समाप्त हो जाएंगे। छोटे बच्चों को अब दूर के स्कूलों में जाना पड़ेगा, जिससे अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा। यह फैसला पूरी तरह गरीब विरोधी है।

विपक्षी दलों ने भी इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। समाजवादी पार्टी ने इसे “बंद करो पाठशाला, खोलो मधुशाला” का तंज कसते हुए गरीब बच्चों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश करार दिया और शिक्षा बजट को केरल व तमिलनाडु की तरह 10% करने की मांग की। बसपा नेता मायावती ने इसे गरीब विरोधी बताया और सत्ता में आने पर इसे पलटने का वादा किया। कांग्रेस ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर इसे बच्चों के भविष्य पर हमला करार दिया। आप कार्यकर्ताओं ने लखनऊ में प्रदर्शन कर नारा दिया: “शिक्षा है अधिकार, सरकार है जिम्मेदार!”

गोरखपुर में हजारों शिक्षकों ने बीएसए कार्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन किया और “योगी-मोदी हाय हाय” के नारे लगाए।

फैसले की कमियां : इस फैसले में न तो यह विचार किया गया कि बच्चों को कितनी दूर स्कूल जाना पड़ेगा, और न ही शिक्षकों, भवनों, सड़कों या बुनियादी ढांचे की उपलब्धता पर ध्यान दिया गया। सरकार का दावा है कि मर्ज किए गए स्कूलों को बाल वाटिका में बदला जाएगा, जहां 3 से 6 साल के बच्चों को पढ़ाया जाएगा। यह दावा स्मार्ट क्लास, ICT लैब और गुणवत्ता सुधार के नाम पर हास्यास्पद है। उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पहले ही इतनी खराब है कि सक्षम अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज रहे हैं।

संवैधानिक उल्लंघन : हालांकि उच्च न्यायालय ने इस फैसले को धारा 21A का उल्लंघन नहीं माना, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह शिक्षा के मौलिक अधिकार का हनन करता है। धारा 21A और RTE 2009 के तहत सरकार की जिम्मेदारी है कि हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित हो। स्कूलों का मर्जर लाखों बच्चों को व्यावहारिक रूप से शिक्षा से वंचित करेगा, जो संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।

यह तथाकथित “तुगलकी फरमान” न केवल शिक्षा के अधिकार को कमजोर करता है, बल्कि गरीब और वंचित वर्गों के बच्चों के भविष्य को भी खतरे में डालता है। सरकार को चाहिए कि वह स्कूलों को बंद करने के बजाय उनकी गुणवत्ता सुधारने, शिक्षकों की भर्ती करने और शिक्षा बजट बढ़ाने पर ध्यान दे। शिक्षा कोई सौगात नहीं, बल्कि हर बच्चे का हक है।

(लाल बहादुर सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं)

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