शेर की सवारी कर बैठे मोदी-शाह

1975 की मशहूर फिल्म “ दीवार “ के कई डायलॉग इतने सुपर हिट हुए कि कुछ अच्छे डायलॉग की चर्चा भी नहीं होती। ऐसा ही एक डॉयलाग था सत्येन कप्पू का। सत्येन कप्पू फिल्म में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के पिता बने हैं। निरूपा रॉय के पति। वे एक मजदूर नेता हैं। मजदूरों का उन पर अटूट विश्वास है। वे मजदूरों के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। मजदूर उन्हें मालिक से अकेले जाकर वार्ता करने और समझौता करने का अधिकार देते हैं।

वे जाते हैं, समझौता करते हैं। बाहर निकलकर मजदूरों की भीड़ के सामने घोषणा करते हैं। मैंने मालिक की हर बात मान ली है। तुम्हारी कोई बात नहीं मानी गई। “ मैं तुम्हें बेच आया हूं। “

सोमवार को दिल्ली में जो कुछ हुआ उससे उस डॉयलॉग की याद आ गई। हालांकि फिल्म की परिस्थितियां अलग थीं और यहां ऐसा कुछ नहीं था। फिल्म में सत्येन कप्पू के बीवी-बच्चों को बंधक बना लिया जाता है और उसकी तस्वीर दिखाकर उन्हें जान से मारने की धमकी देकर कप्पू से समझौता पत्र पर दस्तखत करा लिया जाता है। लेकिन वह आदमी इतना ईमानदार है कि मजदूरों से कुछ भी छिपाता नहीं है।

वह अपनी मजबूरी और ब्लैकमेलिंग की बात तो नहीं बताता लेकिन उनके सामने वहीं सब कुछ साफ-साफ कह देता है कि “ मैं तुम्हें बेच आया हूं। “ इसी के बाद फिल्म आगे बढ़ती है।

अब जरा दिल्ली में जो हुआ उसे देखें। एक जज साहब पेपर लीक के मामले में देश के युवाओं को कॉकरोच कहते हैं। जवाब में अमेरिका में रह रहा एक व्यक्ति गुस्सा जताते हुए उसका विरोध करता है और “ कॉकरोच जनता पार्टी “ नाम से पार्टी बना लेता है। देखते ही देखते कुछ ही दिनों में उसके दो करोड़ से ज्यादा समर्थक बन जाते हैं। उससे उत्साहित होकर वह दिल्ली आने और जंतर मंतर पर धरना देने की घोषणा करता है।

यह ऐलान भी करता है कि जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते वह धरना जारी रखेगा। मोदी सरकार जंतर मंतर पर धरने की इजाजत किसी को नहीं देती। बात उठती है कि उसने तो जंतर मंतर पर धरना देने की अनुमति तक नहीं मांगी है। वह घोषणा करता है कि दिल्ली पहुंचकर वह धरने की अनुमति मांगेगा। लेकिन उसे अनुमति मांगने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। वह दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचता है। दिल्ली पुलिस धरने की अनुमति के साथ उससे एयरपोर्ट पर मिलती है।

मोदी सरकार ने इतनी उदारता आजतक किसी आंदोलनकारी के साथ नहीं बरती। बहरहाल वह जंतर मंतर पहुंचता है और धरना शुरू कर देता है। लेकिन उसके करोड़ों समर्थक धरने से गायब हो जाते हैं। सिर्फ हजार, दो हजार लोग धरना स्थल पर दीखते हैं। उसमें भी दो-तीन सौ यू ट्यूबर हैं। आंदोलन में जान न आती देख लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आमरण अनशन की घोषणा करते हैं।

बाद में पता चलता है कि उन्हें ऐसा करने के लिए लद्दाख के गवर्नर विनय कुमार सक्सेना ने रास्ता दिखाया था। ये वही सक्सेना हैं जो कभी दिल्ली के भी गवर्नर थे और तब के मुख्यमंत्री केजरीवाल की नाक में दम कर रखा था। 28 जून को ये आमरण अनशन शुरू करते हैं। हालत बिगड़ती है। 20 जुलाई को संसद मार्च का एलान करते हैं लेकिन 19 जुलाई की सुबह इन्हें पुलिस जबरन उठाकर सफदरजंग हॉस्पिटल में भर्ती करा देती है।

उन्हें पुलिस के जबरन उठाने की खबर पर हजारों छात्र शाम तक जंतर मंतर पर जमा होते हैं। अगले दिन संसद मार्च में शामिल होने के लिए पचास हजार से ज्यादा युवा एकत्रित होते हैं। इतने की पूरी दिल्ली जाम हो जाती है। जंतर मंतर पर तिल रखने की जगह नहीं मिलती। आसपास के सारे मेट्रो स्टेशन बंद कर दिये जाते हैं। भीड़ से मेट्रो स्टेशनों पर भी जाम लग गया। ऐसी उम्मीद मोदी-शाह को नहीं थी। इसी बीच वांगचुक एक बयान जारी करते हैं।

वे अनशन तोड़ने के लिए सरकार के सामने तीन मांगे रखते हैं। पहली, सरकार पेपर लीक की जिम्मेदारी ले। दूसरी, मुझे और प्रदर्शनकारी छात्रों को संसद तक जाने की अनुमति दे और तीसरी, संसद पर विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता उन्हें आश्वासन दें कि वे इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे और अगर किसी वजह से उनका संसद पर पहुंचना संभव न हो पाए तो वे अस्पताल आकर उन्हें यही आश्वासन दें। यानी सरकार से अब कुछ नहीं। धीरे से सारा ठीकरा विपक्ष के सिर फोड़ दिया।

दूसरा डेवलपमेंट हुआ कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके की ओर से। दिपके ने रविवार को वांगचुक के अस्पताल ले जाए जाने के बाद अनशन जारी रखने का एलान किया। उन्होंने कल दिन भर उपवास रखा। सोमवार को उन्होंने कहा कि सरकार ने उनसे बातचीत की पेशकश की है। उनके दो प्रतिनिधि सौरव दास और आशुतोष राकां, जो कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता भी हैं, भारतीय जनता पार्टी के नेता और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से मिले।

उन्होंने नड्डा के सामने तीन मांगें रखीं। पहली, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो, दूसरी पेपर लीक के चलते जिन छात्रों ने सुसाइड किया है, उनके परिवार वालों को मुआवजा दिया जाए और तीसरा वांगचुक को धरनास्थल जंतर मंतर पर लाकर उनका अनशन तुड़वाया जाए।

आप वांगचुक की अपील और कॉकरोच पार्टी की मांग पर विचार करिये। वांगचुक ने अपनी अपील में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की अपनी मुख्य मांग ही छोड़ दी। और अनशन तोड़वाने की जिम्मेदारी भी सरकार की बजाय विपक्ष पर डाल दी। दूसरी ओर दिपके ने कहा कि सरकार ने उनसे बीतचीत की पेशकश की है। और इसे आधार बनाकर उन्होंने अपना अनशन तोड़ दिया। बताते हैं खुद वांगचुक ने उनसे अनशन तोड़ने को कहा।

अगर सरकार ने बातचीत की पेशकश की है तो क्या उसकी ओर से कोई अपील जारी की गई है ? अगर नहीं तो पेशकश किसने की? अगर पेशकश की तो उन्होंने वहां मौजूद छात्रों को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी? उनके एक प्रवक्ता की ट्वीट के अनुसार पेशकश सुबह छह बजे के करीब की गई। अगर ऐसा था तो उन्होंने उसी समय इस बात को सबके सामने क्यों नहीं रखा? क्यों नहीं युवाओं से अपील की कि वे आज संसद मार्च के लिए न आएं। सरकार उनसे बातचीत करना चाहती है और वे भी तैयार हैं।

उन्होंने युवाओं को क्यों पुलिस के हाथों पिटने दिया ? एक तरफ पार्टी के प्रवक्ता जेपी नड्डा से वार्ता कर रहे थे और दूसरी तरफ पुलिस छात्रों – युवाओं पर लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ रही थी। उन्होंने नड्डा से क्यों नहीं कहा कि ये कैसी वार्ता है जिसमें एक तरफ वार्ता हो रही है दूसरी तरफ सरकार पुलिस से लाठीचार्ज करा रही है?

क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि यह फिल्म दीवार का परिमार्जित संस्करण है… वहां तो मजदूर नेता की पत्नी-बच्चों को बंधक बनाकर उससे जबरन समझौते पर दस्तखत कराया जाता है। यहां तो सब कुछ पहले से ही सुनियोजित है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। फिल्म में भी इसके बाद अमिताभ बच्चन मालिक को बर्बाद कर देता है। मालिक सत्येन कप्पू को तो मजबूर कर देता है लेकिन अमिताभ बच्चन मालिक का सत्यानाश कर देता है।

इसमें भी वांगचुक और अभिजीत दिपके वाला नेतृत्व भले समझौता करता दिख रहा हो लेकिन वहां उपस्थित युवा उससे बहुत आगे निकल चुके हैं। खासकर के दो छात्रों का गुस्सा देखते ही बनता है। एक छात्र को पुलिस वाले जब पीट रहे हैं तो वह गुस्से में आकर कहता है और मारो। इसी तरह एक और छात्र को जब पुलिस वाले मार रहे हैं तो वह खड़ा हो जाता है।

ये घटनाएं सामान्य नहीं हैं। 1974 के छात्र आंदोलन की याद दिला रही हैं जिसने इंदिरा गांधी को इमरजेंसी लगाने और अंतत सत्ता छोड़ने को मजबूर किया था। सोमवार की घटनाओं ने दिखाया कि छात्रों को छेड़कर मोदी-शाह ने शेर की सवारी कर ली है। वांगचुंक और अभिजीत को तो वह साध सकती है लेकिन व्यवस्था से गुस्से में आये छात्रों को नहीं। छात्र शेर बन गये हैं। अब उससे उतरना आसान नहीं है।

(अमरेन्द्र कुमार राय की टिप्पणी)

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