एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर चुनाव आयोग को जवाब देते हुए कहा है कि बिहार में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में आधार और राशन कार्ड जैसे व्यापक रूप से उपलब्ध दस्तावेजों को स्वीकार न करने का चुनाव आयोग का फैसला “बेतुका” और “मनमाना” है।
प्रतिउत्तर के अनुसार, एडीआर का दावा है कि वोटिंग लिस्ट को अपडेट करने के लिए उपयोग किए जाने वाले मतदाताओं के गणना प्रपत्र, निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (इआरओ) द्वारा मतदाताओं की सहमति के बिना बड़े पैमाने पर अपलोड किए जा रहे हैं। एडीआर ने कहा कि यह प्रक्रिया लाखों वोटरों, विशेष रूप से गरीब और हाशिए पर रहने वाले समुदायों, जैसे मुसलमानों, दलितों और प्रवासी मजदूरों, के मताधिकार को छीन सकती है।
एडीआर ने अपनी याचिका में कहा कि चुनाव आयोग ने आधार और राशन कार्ड को स्वीकार न करने का कोई ठोस कारण नहीं दिया है, जबकि ये दस्तावेज बिहार में सबसे आम पहचान पत्र हैं। याचिका में तर्क दिया गया कि आधार, जिसे स्थायी निवास प्रमाणपत्र, ओबीसी/एससी/एसटी प्रमाणपत्र और पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए स्वीकार किया जाता है, को एसआईआर में शामिल न करना “निराधार” है।
एडीआर ने यह भी बताया कि चुनाव आयोग द्वारा स्वीकृत 11 दस्तावेज, जैसे पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र और मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट, भी जाली दस्तावेजों के आधार पर बनाए जा सकते हैं। फिर आधार को क्यों खारिज किया गया?
यह कहा गया कि जिन मतदाताओं ने सहायक दस्तावेजों के साथ गणना प्रपत्र जमा नहीं किए और जिनके नाम 1 अगस्त को प्रकाशित होने वाली मसौदा सूची में नहीं हैं, उन्हें सूची से हटा दिया जाएगा, जब तक कि वे शामिल करने का दावा दायर नहीं करते। शामिल करने का दावा दायर होने के बाद यदि इआरओ को किसी मतदाता की पात्रता के बारे में कोई संदेह है तो वह स्वतः संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर सकता है और नोटिस जारी कर सकता है कि मतदाता का नाम क्यों न हटा दिया जाए। इआरओ के निर्णय के विरुद्ध जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के अंतर्गत धारा 24(क) के अंतर्गत जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष या धारा 24(ख) (द्वितीय अपील) के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष अपील दायर की जा सकती है।
एडीआर का तर्क है कि एक ही इआरओ को “3 लाख से अधिक व्यक्तियों” के गणना प्रपत्रों को संभालने का काम सौंपा गया, जिससे उनके लिए उचित परिश्रम करना या प्रक्रिया का उचित संचालन करना मानवीय रूप से असंभव हो गया। इसके अलावा, उनका आरोप है कि पूरी व्यवस्था अव्यावहारिक है, क्योंकि यह प्रभावित मतदाताओं को मतदाता सूची को अंतिम रूप देने से पहले उनकी अपीलों पर निर्णय लेने के लिए पर्याप्त समय प्रदान करने में विफल रहती है।
एडीआर ने आरोप लगाया कि एसआईआर प्रक्रिया में कोई स्पष्ट प्रक्रिया या दिशानिर्देश नहीं हैं। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (इआरओ) को असीमित और अनियंत्रित अधिकार दिए गए हैं, जिसके कारण वोटरों का नाम हटाने में मनमानी हो सकती है। बिहार जैसे राज्य में, जहां गरीबी, अशिक्षा और कम दस्तावेजीकरण की समस्या है, एसआईआर की सख्त समयसीमा (25 जुलाई तक दस्तावेज जमा करना) लाखों वोटरों को मताधिकार से वंचित कर सकती है। हालांकि ये तारीख कल खत्म हो चुकी है।
एडीआर ने चेतावनी दी कि बिहार के करीब 3 करोड़ वोटर, विशेष रूप से वे जो 2003 की सूची में नहीं हैं या जिनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं हैं, मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। बिहार में केवल 2.5% लोगों के पास पासपोर्ट और 14% के पास मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट हैं। ऐसे में एसआईआर की प्रक्रिया गरीबों और कमजोर वर्गों के लिए “खतरनाक” साबित हो सकती है।
एडीआर का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित “अवास्तविक लक्ष्य” को प्राप्त करने के लिए गणना प्रपत्रों को मतदाताओं की सहमति के बिना न केवल बड़े पैमाने पर अपलोड किया जा रहा है; बल्कि कई मामलों में मतदाताओं के प्रपत्र ऑनलाइन जमा किए गए हैं और उन्हें उनके फ़ोन पर पावती रसीद प्राप्त हुई है, जबकि वे कभी किसी बीएलओ से मिले ही नहीं या किसी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर नहीं किए।
एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट से चुनाव आयोग के 24 जून के आदेश को रदद करने की मांग की है, ताकि वोटरों के अधिकार की रक्षा हो सके। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अहम होगा।
चुनाव आयोग ने 21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि आधार केवल पहचान का प्रमाण है, न कि नागरिकता का। चुनाव आयोग ने यह भी दावा किया कि राशन कार्ड में व्यापक धोखाधड़ी के कारण इसे स्वीकार नहीं किया गया।
आयोग ने केंद्र सरकार के 7 मार्च 2025 के प्रेस रिलीज का हवाला दिया, जिसमें 5 करोड़ फर्जी राशन कार्ड हटाने की बात कही गई थी। हालांकि, चुनाव आयोग ने यह माना कि आधार और राशन कार्ड को पूरक दस्तावेज के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन इन्हें स्टैंडअलोन प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई को एसआईआर प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग से आधार, राशन कार्ड और इलेक्टोरल फोटो आइडेंटिटी कार्ड (वोटर कार्ड) को स्वीकार करने पर विचार करने को कहा। जस्टिस सुधांशु धूलिया और जॉयमाल्या बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि यह मामला “लोकतंत्र की जड़ों” से जुड़ा है और वोट का अधिकार महत्वपूर्ण है।
कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा कि आखिर इतने कम समय में यह प्रक्रिया क्यों शुरू की गई, जब बिहार विधानसभा चुनाव नवंबर 2025 में होने हैं। अगली सुनवाई 28 जुलाई को होगी। चुनाव आयोग अदालत के सवालों पर स्पष्ट बात नहीं कर रहा है।
चुनाव आयोग ने दावा किया कि एसआईआर का पहला चरण पूरा हो चुका है। आयोग ने कहा कि लगभग 66 लाख मतदाता मसौदा मतदाता सूची में शामिल नहीं होंगे। 7.23 करोड़ मतदाताओं के फॉर्म प्राप्त हो चुके हैं और उनका डिजिटलीकरण हो चुका है, और उनके सभी नाम 1 अगस्त को मसौदा मतदाता सूची में प्रकाशित किए जाएँगे। गलत तरीके से नाम शामिल किए जाने या बाहर किए जाने का कोई भी दावा 1 सितंबर तक दायर किया जा सकता है।
आयोग ने कहा कि 2003 की वोटर सूची में शामिल लोगों को केवल प्री-फिल्ड फॉर्म जमा करना है, जबकि नए वोटरों को 11 दस्तावेजों में से एक के साथ नागरिकता साबित करनी होगी। 2 अगस्त से दावे और आपत्तियां स्वीकार की जाएंगी, और अंतिम सूची 30 सितंबर को प्रकाशित होगी।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)