चंदौली। सुबह के चार बजे थे। गांव गहरी नींद में डूबा था, लेकिन नहर मानो जाग चुकी थी। पानी अपनी निर्धारित धारा को छोड़ चुका था। खेतों को लांघता, रास्तों को डुबोता, वह सीधे उन घरों में घुस आया जहां कुछ ही घंटे पहले तक चूल्हों की राख ठंडी पड़ी थी और दीवारों पर नींद के सपने झूल रहे थे।
चंदौली जनपद के नियामताबाद प्रखंड की गोधना नई बस्ती की यह सुबह किसी आम दिन की शुरुआत नहीं थी, बल्कि यह एक त्रासदी का सूर्योदय था। इसकी वजह थी नरायनपुर गंगा नहर का तटबंध टूट जाना। यह केवल एक तटबंध का ढहना नहीं था; यह मिट्टी, ईंट और पत्थर की क्षति से कहीं अधिक, दर्जनों घरों, सैकड़ों खेतों और अनगिनत ज़िंदगियों की दिनचर्या के तिनका-तिनका बिखर जाने की कथा थी।
गंगा नहर के पानी ने पल भर की देरी भी नहीं की। तेज़ बहाव ने खेतों को डुबो दिया, गलियों को अपने आगोश में ले लिया, और घरों की देहरी पार करते हुए जिंदगी के सबसे निजी हिस्सों तक पहुंच गया—रसोई, शयनकक्ष, ओसारे में। गोधना नई बस्ती गांव का हर कोना जलमग्न हो गया। सैकड़ों किसानों की धान की फसल पूरी तरह तबाह हो गई। यही वह फसल थी जिसके लिए उन्होंने मानसून की उमस में हाड़तोड़ मेहनत की थी। कई किसानों ने कर्ज लेकर खेतों को सींचा था और खाद-बीज डाला था। अब बस इंतज़ार था कि हरे-भरे खेतों में लहराती फसलें दिखेंगी, लेकिन अब वह सपना गाद और कीचड़ में दब चुका था।

करीब ढाई सौ एकड़ से अधिक धान की फसल जलमग्न हो गई। पचास से अधिक घरों में पानी घुस आया। चूल्हे बुझ गए, अनाज गल गया, चारपाइयां बह गईं, जानवरों का चारा सड़ गया। जो थोड़ा बहुत सामान बचा भी, उसे संभालने की न तो जगह बची थी और न ही हिम्मत।
दरअसल, नरायनपुर गंगा नहर का तटबंध वर्षों से बीमार था। नई बस्ती के ग्रामीणों की आंखें उसकी कमजोरी को पढ़ चुकी थीं। वे जानते थे कि यह एक दिन ढहेगा ही। लेकिन सिंचाई विभाग के अफसरों पर जैसे कुछ असर ही नहीं होता था। नहर के किनारे से निकलते वक्त कई ग्रामीणों ने देखा था कि मिट्टी धीरे-धीरे खिसक रही है, पर किसी ने सुना ही नहीं।
अफसरों की यही चुप्पी अब गांववालों की चीख बन गई है। इस हादसे ने यह भी उजागर कर दिया कि व्यवस्था का तटबंध भी उतना ही कमज़ोर और जर्जर हो चला है, जितना कि नहर का मिट्टी वाला किनारा। हादसे के समय ग्रामीणों ने बार-बार प्रशासनिक अधिकारियों को फोन किया, लेकिन न तो मुगलसराय के उपजिलाधिकारी (एसडीएम) और न ही अन्य ज़िम्मेदार अफसरों की तरफ से कोई जवाब मिला। यह खामोशी व्यक्ति की नहीं, एक असंवेदनशील सिस्टम की थी जो तब तक नहीं जागता जब तक संकट सिर पर न आ जाए।

चंदौली के अधिकारियों की नींद तब टूटी जब गोधना नई बस्ती के ग्रामीणों ने मुगलसराय-गोधना मार्ग को जाम कर दिया। इस जाम में केवल यातायात नहीं रुका था, बल्कि वह आक्रोश था जो बरसों से भीतर जमा होता रहा और अब पानी के साथ बाहर फूट पड़ा। घंटों बाद सरकारी मशीनरी हरकत में आई। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। धान की फसल जलमग्न हो चुकी थी और लोगों के घरों में पानी घुस चुका था। अनाज, बिस्तर, बच्चों की किताबें, दवाइयां और चारा—सब कुछ बह चुका था। लोगों को घरों से निकलने के लिए नावों का सहारा लेना पड़ा। जैसे कोई गांव नहीं, किसी डूबते द्वीप पर जिंदगी बचाने की आखिरी कोशिश हो।
गोधना नई बस्ती के लोग बताते हैं कि नरायनपुर गंगा नहर का तटबंध टूटने की सूचना तड़के चार बजे ही जिला प्रशासन को दे दी गई थी, लेकिन पांच घंटे तक कोई अफसर मौके पर नहीं पहुंचा। जबकि मुगलसराय का एसडीएम आवास और दफ्तर पास ही स्थित है। इसके बावजूद फौरी तौर पर पहुंचने में लापरवाही बरती गई। लोग राहत कार्य के लिए घंटों इंतजार करते रहे और व्यवस्था गहरी नींद में सोती रही। इस बीच कई परिवारों को अपने घर-बार को छोड़कर पलायन करना पड़ा। जो कुछ भी बचा था, उसे कंधे पर रखकर गांव की ऊंची ज़मीन की तरफ भागते लोग नज़र आए। एक ऐसी तस्वीर जिसमें आदमी की लाचारी साफ दिखती है और सरकार की संवेदनहीनता भी।
कर्ज में डूबी फसलें, हताश किसान
गोधना नई बस्ती के रामचंद्र यादव की आंखें अपने आप छलक पड़ती हैं। पीछे टूटा-फूटा घर है और सामने काफी दूर तक पसरा पानी। उनके होंठ कांपते हैं, लेकिन शब्द साफ निकलते हैं, “25 जुलाई 2025 की रात नहर टूटी और सब बहा ले गई। बर्तन, अनाज, बिस्तर… कुछ नहीं बचा। अब तो बस बच्चों को लेकर आसमान की ओर देख रहे हैं कि कब राहत आएगी?”

ये सिर्फ एक व्यक्ति की पीड़ा नहीं, समूचे गोधना नई बस्ती गांव का साझा दुःख है। अभिषेक यादव की धान की फसल जलमग्न हो चुकी है। वह तटबंध की हालत पहले से जानते थे। वह बताते हैं, “गोधना में तटबंध एक साल से कमजोर था। दो महीने पहले एक्सईएन को इसकी जानकारी दी थी। वे आए भी, लेकिन बस मुस्कराकर चले गए। अब वही मुस्कान हमारे गांव पर भारी पड़ गई है।”
जहां तटबंध टूटा, वह जगह वर्षों से क्षतिग्रस्त थी। कई बार मरम्मत की मांग उठी। सिंचाई विभाग को लिखित सूचना दी गई थी। निरीक्षण तो हुआ, लेकिन कार्रवाई का नामोनिशान नहीं। यह वही नरायनपुर गंगा नहर है, जो अत्यधिक जल प्रवाह के लिए जानी जाती है और यही प्रवाह अब गांव की छाती चीर गया है।
वीरेंद्र यादव आठ साल से गोधना में रह रहे हैं। वह फटी आंखों से कहते हैं, “पहली बार घर में पानी घुसा। तैयारी का वक्त तक नहीं मिला। अनाज सड़ गया, बर्तन बह गए। चार घंटे तक रोड जाम करना पड़ा, तब कहीं अफसर आए।” नहर के तटबंध के टूटने का यह हादसा प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि विकास और प्रशासन की अनदेखी का परिणाम है।

चंदौली जिले के अधिकतर किसान या तो बैंक से कर्ज लेकर या सूदखोरों से उधार लेकर धान की खेती करते हैं। यही फसल उनकी आर्थिक रीढ़ होती है। लेकिन अब वह रीढ़ टूट चुकी है। रमेश यादव रुआंसे स्वर में कहते हैं, “पूरा खेत डूब गया है। धान की फसल बर्बाद हो गई। ये नहर कई बार रिसती थी, हमने कई बार शिकायत की। अब जब फूट गई, तो घर भी ले गई और खेत भी। जिन गलियों में बच्चे खेलते थे, वहां अब नावें चल रही हैं। खेतों में हरियाली नहीं, जलसमाधि है।”
लालता यादव, 65 वर्षीय बुज़ुर्ग, कांपते हुए खड़े हैं। आंखों में पानी, चेहरे पर थकान और होंठों पर बस एक करुण पुकार, “अब कहां जाएं बेटा? घर भी गया, दवा भी बह गई। खाना तो दूर, बैठने की जगह भी नहीं बची। जिनके पास पैसा था, वो छत पर चढ़ गए। लेकिन गरीब कहां जाए?”
यह दृश्य महज़ ग्रामीण भारत की तस्वीर नहीं, बल्कि एक सिस्टम की विफलता का आईना है। दीना यादव के पास दो बीघा खेत था। उसी से पेट भरता था। अब वह खाली हाथ हैं। कहते हैं, “चंदौली की सरकार से बस एक ही मांग है कि जल्द मुआवज़ा दें। नहीं तो ये घर फिर कभी नहीं बस पाएगा।”
ग्रामीणों का कहना है कि यह घटना कोई पहली बार नहीं हुई है। नहरें पहले भी फटी हैं, खेत पहले भी डूबे हैं और प्रशासन पहले भी देर से पहुंचा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह डिजिटल युग में हुआ है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत वही है—समस्याएं जस की तस।

नरायनपुर नहर को ‘गंगा नहर’ कहा जाता है। यह चंदौली की सबसे पुरानी और गहरी नहरों में है। इसमें जलप्रवाह बेहद तेज़ होता है। सरकार हर साल इसके तटबंध की मरम्मत के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है। लेकिन ज़मीन पर उसका कोई निशान नहीं दिखता।
गोधना नई बस्ती गांव के लोग चेतावनी दे चुके हैं कि यदि स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो अगली बार यह बाढ़ और अधिक विनाशकारी होगी। उनका कहना है, “हमारे बच्चों की जिंदगी अब नहर की दया पर नहीं होनी चाहिए। हमें सुरक्षा चाहिए—सिर्फ़ वादे और आश्वासन नहीं।”
आपदा नहीं, कहानी है लापरवाही की
घंटों इंतज़ार के बाद चंदौली के जिलाधिकारी चंद्र मोहन गर्ग मौके पर पहुंचे। उन्होंने एक संक्षिप्त बयान में कहा, “स्थिति अब सामान्य है। तटबंध की मरम्मत कर दी गई है। पंप कैनाल से पानी छोड़ना बंद करवा दिया गया है। जिन घरों में पानी घुसा है, वहां से लोगों को निकालने के लिए रेस्क्यू टीम लगाई गई है। जो भी दिक्कत होगी, उसका त्वरित समाधान किया जाएगा।”
प्रशासन की यह त्वरित प्रतिक्रिया घटना के कई घंटे बाद आई, जब खेत तबाह हो चुके थे, घर बिखर चुके थे और लोगों की उम्मीदें डूबने लगी थीं। अधिशासी अभियंता रविशंकर मिश्र ने इस त्रासदी की वजह कुछ यूं बताई, “जिस जगह तटबंध टूटा, वहां किसी ने पाइप डाल दी थी। उसी जगह दबाव बना और तटबंध टूट गया। मामले की जांच की जाएगी।”
सवाल यह है कि किसकी लापरवाही से वह पाइप वर्षों से वहां था? जांच की बात तो हर बार होती है, लेकिन नतीजे कभी गांव तक नहीं पहुंचते। दूसरा सवाल यह कि किसानों की बर्बाद फसलों का मुआवज़ा कौन देगा? इन सवालों पर प्रशासन और सिंचाई विभाग दोनों खामोश हैं। किसानों ने चेताया है कि यदि मुआवज़ा शीघ्र नहीं मिला, तो वे आंदोलन करेंगे और न्यायालय की शरण लेंगे।
प्रशासन की ओर से एक राहत शिविर की शुरुआत जरूर की गई है, लेकिन वह महज़ एक औपचारिकता बनकर रह गया है। न पीने का साफ पानी है, न दवाइयों का इंतज़ाम। साफ-सफाई की स्थिति भयावह है। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं जरूर मदद को आगे आई हैं, लेकिन वे भी गांव के हर कोने तक नहीं पहुंच पाई हैं।

जानवरों को ऊंचे स्थानों पर पहुंचा तो दिया गया है, लेकिन चारा पूरी तरह भीग चुका है। कई ग्रामीण अब भी अपने ही संसाधनों से घरों से पानी निकालने की कोशिश कर रहे हैं। यह नज़ारा किसी त्रासदी से कम नहीं, जहां राज्य की मशीनरी की गति जनता के आंसुओं से भी धीमी प्रतीत हो रही है।
फसलें डूबने के बाद अब सियासत की लहरें उठनी शुरू हो गई हैं। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष अरुण द्विवेदी की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने जिलाधिकारी से मुलाकात की और तटबंध की तत्काल मरम्मत तथा किसानों को समुचित मुआवज़ा देने की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में बृजेश गुप्ता, दयाराम पटेल, शाहिद, तौसीफ, संतोष तिवारी, राकेश पाठक, विजय जायसवाल आदि शामिल थे।
भारतीय किसान संघ के जिलाध्यक्ष मनोज सिंह और प्रांत उपाध्यक्ष संतोष मिश्र ने तीखा आरोप लगाया कि सिंचाई विभाग बिना निरीक्षण के ही पानी छोड़ देता है। उन्होंने चेताया कि यदि प्रशासन ने मुआवज़ा देने में ढिलाई बरती तो आंदोलन होगा।

गोधना नई बस्ती अब केवल एक गांव नहीं रहा। वह एक चेतावनी है। हर घर में चिंता है, हर आंगन में आंसू और खेतों में हरियाली की जगह दलदल है। ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष आनंद सिंह की बात आंखें खोलने वाली है, “यह महज़ तटबंध टूटने की खबर नहीं है। यह भरोसे की चट्टान के टूटने की गूंज है।
क्या गांव की आवाज़ उस वक्त नहीं सुनी जा सकती थी जब तटबंध पहली बार रिसा था? क्या अफसरों की मुस्कान में इतनी शक्ति नहीं थी कि वह एक त्रासदी को रोक सके? अब पानी तो उतर जाएगा, तटबंध भी बन जाएगा, लेकिन जो टूटा है—वह सिर्फ मिट्टी नहीं, व्यवस्था पर से उठ चुका विश्वास है। गोधना की गलियां गवाह हैं कि इस बार सिर्फ खेत नहीं बहे, लोगों की उम्मीदें, संघर्ष और आत्मसम्मान भी बहा ले गया यह पानी।”
(विजय विनीत बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)