इस आंदोलन को क्या नाम दिया जाए, इस बात पर भी बहस चल पड़ी है। सोनम वांगचुक अपने गांधीवादी तरीके और संविधानवादी सोच को बार-बार दुहराते रहे हैं। लेकिन, इस आंदोलन में गांधीजी का पोस्टर दिखाई नहीं देता। जो दिखा है वह अपवादस्परूप ही। यहां भगत सिंह और आंबेडकर के पोस्टर एक साथ या अलग-अलग दिखाई देते हैं। काक्रोच जनता पार्टी की स्थापना करने वाले अभिजीत दीपके दिल्ली में उतरते समय हाथ में आंबेडकर की पुस्तक हाथ में लिए थे। मिलेनियल, जेन-ज़ी, अल्फा जैसे कई नाम हवा में है और उन्हें उनकी भाषा और व्यवहार के माध्यम से पकड़ने की कोशिशें चल रही हैं।
जो युवा हैं उन्हें इन नामों से फर्क नहीं पड़ता, वे जंतर-मंतर पर अपने ही जैसे युवाओं के समूह के साथ एक ताकत महसूस कर रहे हैं और आंदोलन के स्वाद को पूरी तरह से अपना बना लेने में जुटे हुए हैं।
मई, 2026 में जब जस्टिस सूर्यकांत ने युवाओं के एक हिस्से को ‘परजीवी’ बताते हुए काक्रोच कहा था ( हालांकि उन्होंने बाद में स्पष्ट किया है कि उन्होने फेक डिग्री वालों के लिए यह शब्द इस्तेमाल किया था), तब इसने खासी बेचैनी पैदा की। देखते-देखते डिजिटल प्लेटफार्म पर काक्रोच जनता पार्टी की स्थापना हो गई। जंतर-मंतर पर इसी के आह्वान पर जुटान शुरू हुआ। जुलाई, 2026 के मध्य तक उसके धरना स्थल पर सन्नाटे का समय काफी था।
20 जुलाई, 2026 के संसद मार्च के आह्वान के साथ लोगों को जंतर मंतर पर आना शुरू हो गया। उस समय तक यह जनांदोलन में नहीं बदला था। उस समय तक अभिजीत दीपके और उनकी टीम कई बार बदहवास सी दिखी और ठीक उस समय आप पार्टी मंच के आसपास सक्रिय होते हुए दिख रही थी। विभिन्न राजनीतिक पार्टियां वहां आ तो रही थीं लेकिन वे इस बात से सतर्क थीं बात इन्हें औपचारिक समर्थन से कहीं अधिक न जाए। वे किस बात से डर रहे थे, इस बात को रेखांकित करना जरूरी है।
20 जुलाई, 2026 और उसके बाद इस आंदोलन पर मुख्य पकड़ युवाओं के हाथ में थी और निश्चित ही इसके केंद्र में काक्रोच जनता पार्टी का जंतर-मंतर केंद्र था। कोई भी संगठन, समूह, पार्टी अपनी स्वतंत्रता के बावजूद इस केंद्र से बाहर नहीं गया। 20 जुलाई की देर रात तक लगा कि सबकुछ बिखर रहा है, तब भी यह केंद्र बचा हुआ था और खुद अभिजीत दीपके इसी केंद्र की ओर लोटे। उनके साथ कुछ छात्र और युवा थे। इसके बाद धीरे धीरे वहां फिर से जुटान शुरू हुआ।
काक्रोच जनता पार्टी ने एक बार फिर से अपने केंद्र को सहेजते हुए घोषणा की, जब तक धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफ़ा नहीं हो जाता, यह प्रदर्शन जारी रहेगा। जिन्हें लग रहा था कि 20 जुलाई बस अंतिम दिन है, वह एक आरम्भ के दिन में बदल गया। इसके बाद पूरे देश में प्रदर्शनों और पुलिस से भिड़ंत की खबरें आने लगीं। मुंबई के प्रदर्शन में रिया अहीर एक पोस्टर-गर्ल बन कर सामने आई जो पुलिस की बैन को रोककर खड़ी हो गई। बिहार के युवा वाटर कैनन के सामने गाना बजाकर नाचने लगे और पुलिस से कहने लगे- आंसू गैस का गोला दागिये!
जो डर था, चला गया
बहुत से बुद्धिजीवी इस बात की तह में गोते लगाते रहे कि अभिजीत दीपके और सोनम वांगचुक को किसने प्लांट किया है? वे किसकी सेवा करने के लिए आये हैं? वे कितनी दूर तक जाएंगे? आदि। इन तर्कों की सीमाएं यही थीं कि वे उस संभावनाओं को नहीं देख रहे थे जो इनके इर्द-गिर्द बन रही थीं। वे इस पहलकदमी के पीछे छिपी रह गई उन आवाजों को सुनने में असफल रहे जो अब चुप रहना गवारा करने वाली नहीं थीं। वे अब गाली तक भाषा में बात करने पर उतारू हो चुकीं थीं।
ऐसे बुद्धिजीवी डर रहे थे। यह उनकी सीमाएं थीं जो उन्हें डरा रही थीं। इसीलिए वे इन युवाओं के साथ एक नई बौद्धिकी को गढ़ने में डर गये। भाजपा और मोदी के विकल्प की राजनीति तक सिमट कर रह गये। उन्हें आंदोलन की आती हुई आवाज सुनाई नहीं दी।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आंदोलनों में ‘षडयंत्र’ खोजने की परम्परा अपने देश में काफी मजबूत है। इसकी वजह से हम कई बार प्रगतिशील समूहों और संगठनों को आंदोलन के पीछे-पीछे भागते हुए और पीछे छूट जाते हुए देखते हैं।
‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’ और ‘मैन्युफैक्चरिंग डीसेंट’ दोनों पुस्तकें काफी पढ़ी गई हैं। यह पुस्तक आंदोलन की समझ बनाने के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन, इससे भी महत्वपूर्ण है मार्क्सवाद की समझ जो अपने समय के राजनीतिक-अर्थशास्त्र को समझने का आग्रह करता है और उसी के आधार पर अपने समय की बनने वाली परिघटनाओं को जानने की ओर ले जाता है।
पिछले एक दशक से भारत दुनिया का सबसे युवा देश है और युवाओं की संख्या पूरी आबादी का लगभग 65 प्रतिशत है। जबकि खुली बेरोजगारी दर 30 प्रतिशत पार कर गई है। खेती पर जनसंख्या का भार बुरी तरह से बढ़ा हुआ है। शहर में पिछले 15 सालों से नई तकनोलाॅजी आधारित विकास ठहर गया है, जिसमें एआई महत्वपूर्ण पक्ष है। नियमित आय वाली नौकरियां कम होती गई हैं। कोचिंग संस्थानों की बाढ़ इस बेचैनी को व्यक्त कर रही थी जबकि सरकार विश्वविद्यालय, काॅलेज और प्राथमिक शिक्षा को बर्बादी की ओर ठेल देने में लगी हुई थी।
ऐसे में यदि हम मान भी लें कि जंतर-मंतर पर षडयंत्र रचा जा रहा था और ‘मैन्युफैक्चारिंग’ का काम चल रहा था तब भी इसके नीचे की जो सच्चाई थी उसे आकार लेने में कोई रोक नहीं सकता था। जस्टिस सूर्यकांत का बयान युवाओं के प्रति होने वाले व्यवहार की अभिव्यक्ति थी जिसे युवाओं ने बर्दाश्त नहीं किया और वे एकजुट होने लगे।
अभिभावक, जो राजनीति से निराश हो चुके थे, वे किसी भी तरह से अपने बच्चों को उस ओर जाने से रोकने के लिए युवाओं पर लगातार दबाव बनाये हुए थे और परीक्षा की तैयारियों में खुद को अपने बच्चों के साथ झोंके हुए थे। अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को लेकर डरे हुए थे। वे राजनीति में किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने से डरे हुए थे। वे सोशल मीडिया तक पर लिखने से डरते थे कि कहीं मुकदमा न दर्ज हो जाए।
जंतर-मंतर पर 20 जुलाई, 2026 की घटना ने अभिभावकों का डर भी खत्म कर दिया। वे अपने बच्चों को सहजने और सुरक्षित करने में लगे हुए थे, उन्हीं बच्चों पर पुलिस द्वारा जिस बर्बरता से हमला किया गया, उससे वे बुरी तरह से आहत हुए। जेनजी, मिलेनियल और अल्फा जैसे नामों वाले बच्चों के साथ सीआरपीएफ के रैपिड एक्शन फोर्स ने वही सलूक किया जो वह कश्मीर और मणिपुर में करते हुए आई थी।
अब तो यह बात साफ हो चुकी है कि उन बच्चों पर पैलेटगन से हमला किया गया और आंसू गैस के जिन गोलों को दागा गया, वे भी काफी खतरनाक परिणाम देने वाले हैं। यह आंदोलन बच्चों और युवाओं से होते हुए अभिभावकों तक पहुंचा है और वहां से यह मोहल्लों और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बना है। यह तेजी से वापस बुद्धिजीवियों और स्थानीय नेताओं तक गया है। यह यहां से होते हुए वापस कैंपस में गया है।
इस आंदोलन ने तेजी से अपनी जमीन पकड़ी है और उतनी ही तेजी से विस्तार किया। यही कारण है कि इसमें राजनीतिक विचारधारा का प्रभाव भले ही कम से कमतर दिख रहा हो, लेकिन आम लोगों की भागीदारी काफी बड़े पैमाने पर है।यह आंदोलन उन लोगों के बीच भी गया जो फैक्ट्रियों और कंपनियों में काम करने वाले हैं। यह बेहद कम वेतन वाले मजदूरों से लेकर मध्यवर्ती आय वाले कथित सफेद काॅलर वेतनभोगी तक अपनी आवाज लेकर पहुंचा।
20 जुलाई को कई मार खाने और घायल लोग इसी श्रेणी के हैं। ‘रेड माइक’ के सौरभ शुक्ला की रिपोर्ट में कई मार खाये युवा बताते हैं कि वे रात की ड्यूटी कर सीधे यहां प्रदर्शन में आये थे। कुछ छुट्टियां लेकर इस प्रदर्शन में शामिल होने आये थे। सवाल यह है कि वे क्यों आये थे? इस सवाल का उत्तर बेहद जटिल है। इसे तलाश करते समय हमें उस ओर जरूर जाना होगा, जिसमें यह कहा जाता है कि मजदूरों की राजनीतिक समझ नहीं बनी है। यह सरासर झूठ है।
मजदूरों की नई पीढ़ी अब सिर्फ और सिर्फ मजदूरी की लड़ाई तक नहीं रहना चाहती। वे एक बेहतर मजदूरी, जिंदगी और राजनीति में आवाज चाहते हैं, वे अपनी उपस्थिति दर्ज करना चाहते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण है मीडिया की भूमिका। रात के बारह बजे एक बूढ़े प्रधानमंत्री ने जेनजी, मिलेनियल और अल्फा को संबोधित करने के लिए नये मीडिया फार्म की आज़माइश की और पहला संबोधन था, ‘फ्रेंड्स’; इसके बाद एक लंबा पाॅज है। इस लंबे पाॅज ने बता दिया, आप इस फील्ड के आदमी नहीं हो। इंस्टाग्राम एक सामानान्तर मीडिया की तरह प्रचार, बातचीत और निर्णय का माध्यम बन गया।
लेकिन, जिस मीडिया को अब तक दरकिनार कर रखा गया था और उसे दोयम दर्जे की तरह देखा गया उसने मुख्य मीडिया की जगह ले ली। यह है यूट्यूबर की न्यूजपोर्टल। रेड माईक, न्यू पिंच, द प्रिंट, द वायर से लेकर रवीश कुमार, सोहित मिश्रा आदि को किसी बौद्धिक मीडिया की तरह नहीं, एक मीडिया चैनल की तरह देखा गया। इस दौरान कथित गोदी मीडिया ने खुद को जंतर-मंतर से अलग रखा और जंतर-मंतर ने भी उनसे दूरी बनाये रखी। ‘गोदी मीडिया’ अब एक गाली बन चुका है।
लल्लनटाप की स्थापना करने वाले सौरभ द्विवेदी अब इंडियन एक्सपे्रस के हिंदी का चैनल चला रहे हैं और इस विभाजन पर कुछ बौद्धिक अंदाज में बात करते हुए बहस करने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से वह इस विभाजन पर सवाल खड़ा करते हुए ‘मीडिया पर हमले’ की घटना को आंदोलन के भटक जाने से जोड़ रहे हैं। यह बहस चले, अच्छी बात होगी। लेकिन, उस डर को भी देखना होगा जिसमें युवाओं को यह लग रहा है कि ‘गोदी मीडिया’ उनके मुद्दों को भटका देगा और उनके खिलाफ बात करेगा।
युवाओं के बीच यह बात उनके अपने अनुभवों से आई है। इस मीडिया ने युवाओं की समस्या और छात्रों की आवाजों को जगह नहीं दी है। कोई पत्रकार उसी मीडिया में काम करते हुए छात्रों का पक्ष ले सकता है, लेकिन ज्यादातर मामलों में मीडिया समूह यह काम नहीं करता है। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सोनम वांगचुक के बारे में इसी मीडिया समूहों ने किस तरह से दुष्प्रचार किया।
निश्चित ही, युवाओं ने ‘गोदी मीडिया’ के साथ धक्का मुक्की की और उचित सलूक नहीं किया है, इसमें से व्यक्तिगत तौर पर कुछ अच्छे पत्रकार हो सकते हैं। लेकिन, उनकी शिकायत इन युवाओं की बजाय अपने मीडिया समूह से भी जरूर होना चाहिए जो युवाओं की तकलीफ को समझने में नाकाम रहे हैं या उन्होंने जानबूझकर उन्हें नजरअंदाज किया है।
20 जुलाई संसद मार्च, यह पहली बार नहीं था
यह जरूरी नहीं है कि इतिहास की हर घटना के बारे में सभी को सामान्य जानकारी हो। इतिहास वर्तमान को देखने का नजरिया बनाता है। और, कई बार यह वर्तमान की घटनाओं का संदर्भ निर्मित करता है। जिन्हें इन दोनों की जरूरत नहीं होती वह प्रवचन से काम चला लेता है, यह ‘अंधभक्ति’ का एक नमूना होता है जिसमें तर्क और तथ्य बेकार साबित होते हैं।
एक ऐसी ही बहस को मैंने मेट्रो में चलते हुए देखा। एक व्यक्ति लगातार अपनी ऊंची उठती आवाज में कह रहा था, संसद पर इसके पहले आतंकवादियों ने हमला किया था और अब ये युवा कर रहे हैं, इन पर लाठियां नहीं चलेंगी तो क्या फूल बरसेंगे। उस व्यक्ति का सारा तथ्य और तर्कइन्हीं दो बातों के आसपास बना रहा। उसके विरोध में बोलने वाले लोगों में बहुत से लोग थे, जो बच्चों पर हमलों से दुखी थे। लेकिन, दो लोग ऐसे भी थे जो उसे बता रहे थे कि संसद मार्च 2013 तक तो चला ही है।
ऐतिहासिक तौर पर जंतर-मंतर कोई प्रदर्शन स्थली थी नहीं। जिस समय यह इमारत बनी उस समय दिल्ली आज जैसी नहीं थी। शहर का अर्थ शाहजहाँबाद था जो आज की पुरानी दिल्ली है और लाल किला के आसपास बसी हुई है। उसके पहले के दौर में यह मेहरौली, हौज खास, सीरी फोर्ट, तुगलकाबाद, पुराना किला और लोधी गार्डन में विभिन्न कालों में विकसित हुआ। जंतर मंतर का इलाका मुख्यतः जंगल था जिसमें कुछ गांव बसे हुए थे।
भारत के उत्तर मध्यकाल में विभिन्न रजवाड़ों और नवाबों में शिक्षा के प्रति नई चेतना को उभरते हुए देखते हैं। जयपुर के सवाई जयसिंह भी इसी श्रेणी में आते हैं। उन्होंने खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए 1724 में दिल्ली का जंतर-मंतर बनवाया। हालांकि इसके निर्माण की शुरूआत इसके पहले से हो चुकी थी। यहां यह याद करना जरूरी है कि भारत में खगोलशास्त्र के अध्ययन की मजबूत परम्परा थी जो धार्मिक पूर्वाग्रहों से बुरी तरह उलझ गई थी और इसका विकास काफी धीमे हो गया। इसके बावजूद उत्तर मध्यकाल में हम शिक्षा के नये उभार को देख सकते हैं जिसे आज धार्मिक पूर्वाग्रहों से उलझा दिया गया है।
1910 में अंग्रेजों ने अपनी राजधानी कोलकाता से हटाकार दिल्ली की। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं था कि अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष इसी दिल्ली में आ गया। वह समय जनांदोलनों का था और इसमें कांग्रेस के वार्षिक अधिवेषन के केंद्र एक बड़ी भूमिका निभा रहे थे। कांग्रेस भी अपने वार्षिक अधिवेशन उन जगहों पर करना चाहती थी जहां से जनांदोलनों को मजबूती मिल सके।
1947 के बाद भी भारत की राजनीति पर गहरा असर डालने वाले भाषा, राज्य और तेलगांना, नक्सलबाड़ी के कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले किसान आंदोलन, जो राजसत्ता हासिल कने के उद्देश्य से खड़े हुए, दिल्ली से दूर तमिलनाडु केरल, तेलगांना, आंध्रप्रदेश, बंगाल आदि जगहों पर हुए। दिल्ली में प्रदर्शन का अर्थ इंडिया गेट की बोट क्लब वाली जगह थी।
1966 के नवम्बर में गौरक्षा संसद मार्च का नेतृत्व साधुओं की जमात ने किया और यह माना जाता है कि इसे आरएसएस और भारतीय जन संघ ने समर्थन दिया। यह एक हिंसक प्रदर्शन था जिसमें बहुत से कांग्रेस के नेताओं पर हमले हुए। दिल्ली में बसों में सफर करने वाले यात्रियों के साथ मारपीट और गाड़ियों में आग लगाने की घटना हुई। पुलिस पर हमले हुए। इस प्रदर्शन पर पुलिस के गोली से 7 प्रदर्शनकारियों की मौत होने की बात कही जाती है।
इसके बाद सबसे बड़ा प्रदर्शन किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किया गया। इंडिया गेट के बोट क्लब पर हुए इस प्रदर्शन में 5 लाख से अधिक किसानों ने हिस्सेदारी की थी। राष्ट्रपति भवन और संसद के ठीक सामने यह प्रदर्शन एक हफ्ते तक चला। बताया जाता है कि उस समय इंडिया गेट की दीवार का थोड़ा बहुत नुकसान हुआ था। लेकिन, उस समय पूरा शहर बैलगाड़ियों, ट्रेक्टरों, भैंसों से भर गया था। लोग चारपाई लेकर आये थे, वे इसे ही बिछाकर सोते थे। दिल्ली एक राजधानी से गांव में बदल गया था।
उस समय शौचालय की उपयुक्त सुविधा न होने से यह बताया जाता है कि लोगों ने खुले में भी शौच किया। गांव से आये लोगों ने शहर की बसों और गाड़ियों का अपने सफर के लिए खूब प्रयोग किया। इसी के बाद राजनीतिक पार्टियों के बीच यह सहमति बनने लगी कि अब राजनीतिक रैलियों और प्रदर्शनों की जगह यहां से बदल दी जाए। इसके बाद रैली और विरोध प्रदर्शन की जगह लाल किला, रामलीला मैदान हो गया।
कई बार यह रैलियां चलते हुए संसद मार्ग तक आती थीं और वहां सभा के साथ खत्म हो जाती थीं। छोटे प्रदर्शनों के लिए संसद मार्ग पर जगह दी गई जिसे आमतौर पर जंतर-मंतर नाम दे दिया गया। धीरे-धीरे इस प्रदर्शन की जगह छोटी हो गई। आज जो जंतर मंतर पर बाड़ेबंदी दिखाई देती है, वह मनमोहन सिंह नेतृत्व की कांग्रेस सरकार के अंतिम दिनों में दिखने लगी थी। लेकिन, वर्तमान स्वरूप मोदी-काल के दूसर दौर में मुकम्मल हो चुका था।
इसी काल में किसानों के विशाल जत्थों को दिल्ली की बाहरी सीमाओं पर रोक दिया गया और उनके रास्तों में कीलें बिछा दी गईं और विशाल दीवार खड़ी की गई। सीएए के प्रदर्शन दिल्ली के स्थानीय जगहों पर हुए, उन्हें उन जगहों पर भी रोकने की कोशिशें हुई। वहां पुलिस से झड़पें हुईं और बहुत से लोगों को जेल में डाल दिया गया और उन पर मुकदमें दर्ज हुए। इसी दौरान दिल्ली में भयावह दंगे हुए।
इसके बावजूद दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला नहीं टूटा। दमन की सारी संभावनाओं के बावजूद लोग दिल्ली के जंतर मंतर पर इकठ्ठा होते रहे और अपनी आवाज उठाते रहे।
20 जुलाई, 2026 को काक्रोच जनता पार्टी के नेतृत्व में ‘संसद चलो’ मार्च के आह्वान ने एक कमजोर हो रही धारा को मजबूती दे दी। यह अपनी जगह को हासिल करने की भी पहलकदमी थी जिसे न सिर्फ हासिल किया गया, इस मार्च के बाद भी वहीं डटे रहने का निर्णय भी लिया गया।
आमतौर पर इस तरह ‘संसद मार्च’ और सभा होने के बाद आंदोलन एक बार से वापिस जाकर पुनःसंगठित होने की तैयारी में लगते हैं। इस बार के आंदोलन ने जंतर मंतर पर ही अपनी ताकत को बनाया, संसद मार्च किया और फिर वहीं बैठकर अपनी ताकत को बनाने में लग गया। इस मायने में यह एक नये तरह का संसद मार्च था जो अब भी वहीं डटा हुआ है।
(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार-लेखक-टिप्पणीकार हैं।)