जब सड़कों पर बेरोजगार युवा लाठियां खाते हैं, तब नेताओं, सांसदों और बड़े अफसरों के बच्चे कहां होते हैं? क्या भारत में लोकतंत्र सिर्फ आम लोगों के लिए संघर्ष और खास लोगों के लिए विशेषाधिकार बनकर रह गया है? यही सवाल आज देश के कई हिस्सों में उठ रहे हैं।
दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर पटना, प्रयागराज, जयपुर, भोपाल और चंडीगढ़ तक जब भी छात्र, बेरोजगार युवा या किसान अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तब एक सवाल बार-बार उठता है—इन आंदोलनों में नेताओं, सांसदों, मंत्रियों और बड़े नौकरशाहों के बच्चे क्यों दिखाई नहीं देते? क्या उनकी कोई समस्या नहीं है? वे सभी समस्या से ऊपर जा चुके हैं? यह सवाल केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सामाजिक संरचना पर गंभीर बहस का विषय है।
देश में लगभग 5,577 कार्यरत आईएएस अधिकारी हैं। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में करीब 400–450 आईएएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत रहते हैं। संसद में 543 लोकसभा और 245 राज्यसभा सदस्यों सहित कुल 788 सांसद हैं। 18वीं लोकसभा में लगभग 148 सांसदों ने कृषि को अपना पेशा या पृष्ठभूमि बताया है।
वहीं एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार 543 में से 504 सांसद करोड़पति हैं। यानी संसद के लगभग 93 प्रतिशत सदस्य करोड़पति हैं, जबकि केवल 39 सांसद ऐसे हैं जिनकी घोषित संपत्ति एक करोड़ रुपये से कम है। यह आंकड़े एक अलग ही तस्वीर पेश करते हैं। फिर सवाल है कि आंदोलन किसके बच्चे करते हैं?
देश में जब अग्निवीर, एसएससी, रेलवे, बीपीएससी, यूपीएससी, शिक्षक भर्ती, आरक्षण या किसान आंदोलन होते हैं तो सड़कों पर दिखाई देने वाले अधिकांश युवा साधारण परिवारों से आते हैं। पुलिस की लाठी भी वही खाते हैं, जेल भी वही जाते हैं और कई बार हिंसा में जान भी वही गंवाते हैं।
लेकिन क्या कभी किसी बड़े केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, वरिष्ठ आईएएस या आईपीएस अधिकारी के बेटे-बेटी को ऐसे आंदोलनों की पहली कतार में देखा गया? ऐसे उदाहरण बेहद दुर्लभ हो सकते हैं। यह कहना सही नहीं होगा कि “कोई भी” नेता या अधिकारी का बच्चा कभी आंदोलन में शामिल नहीं होता, क्योंकि अलग-अलग समय पर कुछ अपवाद देखने को मिले हैं। लेकिन व्यापक स्तर पर देखें तो ऐसे उदाहरण नगण्य हैं। यही असमानता बहस को जन्म देती है।
सरकारी स्कूलों से दूरी क्यों?
भारत में लाखों सरकारी स्कूल हैं। सरकारें दावा करती हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता सुधर रही है। फिर सवाल उठता है कि कितने केंद्रीय मंत्री, सांसद, बड़े नौकरशाह या शीर्ष अधिकारियों के बच्चे इन सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं? जब यही नेता, मंत्री और नौकरशाह स्कूल बनाते हैं और कई तरह की घोषणा भी करते रहते हैं तब इनके बच्चे यहाँ क्यों नहीं पढ़ते? क्या आम स्कूल और अन्य संस्थाएं केवल आम लोगों के लिए है और इनके लिए ख़ास व्यवस्था है?
अधिकांश प्रभावशाली परिवार अपने बच्चों को निजी, कॉन्वेंट, अंतरराष्ट्रीय या विदेशों के शिक्षण संस्थानों में भेजते हैं। यदि नीति बनाने वाले स्वयं सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालों पर निर्भर नहीं हैं, तो क्या वे उनकी गुणवत्ता सुधारने के लिए उतने ही संवेदनशील होंगे जितनी आम जनता अपेक्षा करती है? यह एक वैध सार्वजनिक प्रश्न है। और ये सवाल लम्बे समय से उठाये जाते रहे हैं लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं। जो जनता बोलती है उसे खरीद लिया जाता है या फिर उसकी जिंदगी ही ख़त्म हो जाती है।
पांच किलो अनाज और कुछ हजार रुपये की नकदी देकर चुनाव दर चुनाव लूट का खेल चलता रहता है और इस खेल में वही ख़ास तंत्र शामिल होता है जो सत्ता के साथ जुड़ा होता है -नेता और बड़े अधिकारी।
लोकसभा में लगभग 148 सांसदों ने कृषि को अपना पेशा बताया है। लेकिन क्या उनके परिवार खेती पर निर्भर हैं? क्या उनके बच्चे खेतों में काम करते हैं? क्या वे एमएसपी, सिंचाई, डीजल या खाद की समस्या से उसी तरह प्रभावित होते हैं जैसे छोटे किसान का बेटा?सिर्फ कृषि को पेशा घोषित कर देना और वास्तविक कृषि जीवन जीना—दोनों अलग बातें हैं। इस अंतर पर भी गंभीर शोध और सार्वजनिक विमर्श की आवश्यकता है।
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत समान अवसर है। लेकिन भारत में अवसरों का वितरण अक्सर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव से जुड़ा दिखाई देता है। सत्ता प्रतिष्ठान के बच्चों को बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर नेटवर्क, बेहतर करियर और बेहतर सुरक्षा अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध हो जाती है। दूसरी ओर सामान्य परिवार का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से जूझता रहता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर नेता या अधिकारी का परिवार विशेषाधिकार का दुरुपयोग करता है। लेकिन यह धारणा व्यापक है कि प्रभावशाली परिवारों को ऐसे अवसर उपलब्ध होते हैं जो आम नागरिकों की पहुंच से बाहर हैं।
हिंसा में कौन मरता है?
देश में जब सांप्रदायिक तनाव, जातीय हिंसा, आंदोलन या पुलिस कार्रवाई होती है, तब मरने और घायल होने वालों में अधिकतर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग होते हैं। यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि कभी भी किसी नेता या अधिकारी का बच्चा ऐसी घटनाओं का शिकार नहीं हुआ, क्योंकि इतिहास में अलग-अलग परिस्थितियों में अपवाद मौजूद हैं। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे मामले बहुत कम सामने आते हैं, जबकि सामान्य नागरिक कहीं अधिक जोखिम झेलते है।
आज भारत में लोकतंत्र दो हिस्सों में बंटता हुआ दिखाई देता है। पहला भारत वह है जहां युवा परीक्षा केंद्रों के बाहर रातें बिताते हैं, भर्ती रद्द होने पर आंदोलन करते हैं और नौकरी के लिए वर्षों तक तैयारी करते हैं। दूसरा भारत वह है जहां राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव वाले परिवारों के बच्चे अपेक्षाकृत सुरक्षित और संसाधन-संपन्न वातावरण में आगे बढ़ते हैं।यह विभाजन केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है।
अब सवाल है कि क्या संसद, विधानसभाओं और नौकरशाही में बैठे प्रभावशाली लोगों को अपने परिवारों को भी उन्हीं सरकारी स्कूलों, सरकारी अस्पतालों और सार्वजनिक व्यवस्थाओं पर निर्भर करना चाहिए जिनके लिए वे नीतियां बनाते हैं? क्या राजनीतिक दलों को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि उनके प्रतिनिधियों के बच्चे कहां पढ़ते हैं, क्या करते हैं और सार्वजनिक जीवन में उनकी क्या भूमिका है?
क्या लोकतंत्र में जवाबदेही केवल वोट देने वाले नागरिक की होनी चाहिए, या सत्ता में बैठे लोगों के परिवारों की सामाजिक भागीदारी पर भी सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए?
भारतीय लोकतंत्र को “धोखा” कहना एक राजनीतिक मत हो सकता है, न कि स्थापित तथ्य। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता तभी मजबूत होगी जब सत्ता और समाज के बीच बढ़ती दूरी कम होगी।
जब तक संघर्ष केवल गरीबों के हिस्से और विशेषाधिकार केवल प्रभावशाली वर्ग के हिस्से में दिखाई देंगे, तब तक यह सवाल बार-बार उठेगा कि क्या लोकतंत्र वास्तव में समान अवसर का माध्यम है, या फिर सत्ता और संसाधनों के सीमित वर्ग के इर्द-गिर्द सिमटता जा रहा है।
लोकतंत्र केवल मतदान का नाम नहीं है; लोकतंत्र की असली कसौटी यह भी है कि क्या सत्ता में बैठे लोगों के परिवार उसी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं, जिसे वे पूरे देश के लिए आदर्श बताते हैं। यही प्रश्न आज भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।