Thursday, February 9, 2023

democracy

‘उफ़! टू मच डेमोक्रेसी’: सादा ज़बान में विरोधाभासों से निकलता व्यंग्य

डॉ. द्रोण कुमार शर्मा का व्यंग्य-संग्रह ‘उफ़! टू मच डेमोक्रेसी’ गुलमोहर किताब से प्रकाशित हुआ है। वैसे तो ये व्यंग्य ‘न्यूज़क्लिक’ ई अख़बार के ‘तिरछी नज़र’ कॉलम में सिलसिलेवार छपे हैं और बहुत पसंद किए गए हैं, पर पुस्तकाकार रूप में कुछ...

बेहतर जनमत निर्माण के जरिये ही तैयार हो सकता है उम्दा नेतृत्व

लोकतंत्र एक गतिशील अवधारणा है। इसलिए सामाजिक, आर्थिक सांस्कृतिक और अन्य परिवर्तनों के अनुरूप लोकतंत्र का स्वरूप बनता-बिगडता रहा है। पाश्चात्य जगत में ज्ञान-विज्ञान के पालना के साथ-साथ लोकतंत्र की जन्मभूमि के रूप में विख्यात यूनान के एथेंस में...

विचारधारा पर संशय व नेतृत्व का संकट

जिन लोगों को लगता है यह व्यवस्था पूंजीपतियों के लिए है और इसमें बहुसंख्यक जनता न्यूनतम जरूरतें भी पूरी नहीं कर सकती, वे इस व्यवस्था को बदलने के लिए लंबे समय से संघर्षशील रहे हैं। पिछले आठ सालों में...

हिंदुओं, अपने भीतर झांको

व्यक्ति हो, धर्म हो या राष्ट्र, जब अपनी कमियों को जानने-समझने और सुधारने का काम छोड़ कर दूसरों की कमियों को उजागर करने लगता है तो समझना चाहिए कि उसके आगे बढ़ने का रास्ता अवरुद्ध हो चुका है। क्योंकि...

शिक्षकों को भी दरकार है सही शिक्षा की

आजादी के पचहत्तर वर्ष पूरे होने का जश्न एक तरफ बड़े उत्साह और कहीं-कहीं उन्मत्तता के साथ भी मनाया गया, वहीं हाल ही में ऐसी घटनाएँ भी हुईं, जिनसे यह भी इशारा मिला कि जिस आजादी और लोकतंत्र के...

मछुआरों को भारत-पाकिस्तान शत्रुता में बंधक नहीं बनाया जा सकता

“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान और भारत आजादी के 75 वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं, अनजाने में समुद्री सीमा पार करने के लिए गिरफ्तार किए गए सैकड़ों निर्दोष मछुआरे एक-दूसरे की जेलों में...

बापू के पास है घायल लोकतंत्र की औषधि

बड़ी संख्या में लोग मानने लगे हैं कि भारतीय लोकतंत्र एक संकट के दौर से गुज़र रहा है। लोकतान्त्रिक संस्थाओं की कार्य शैलियाँ बदल रही हैं, कार्यकारिणी और न्यायपालिका के काम-काज में अनावश्यक हस्तक्षेप हो रहा है और शैक्षणिक...

व्यवसायिक हित स्वतंत्र पत्रकारिता पर हावी, लोकतंत्र से समझौता:चीफ जस्टिस

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने मीडिया पर व्यापारिक घरानों के वर्चस्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब एक मीडिया हाउस के अन्य व्यवसायिक हित होते हैं, तो वह बाहरी दबावों के प्रति संवेदनशील हो जाता है। अक्सर, व्यवसायिक हित स्वतंत्र पत्रकारिता...

न्यायाधीश सामाजिक वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकते:चीफ जस्टिस

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा है कि वर्तमान समय की न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक निर्णय के लिए मामलों को प्राथमिकता देना है। न्यायाधीश सामाजिक वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकते। सिस्टम को टालने...

पहली नागरिक के रूप में कितना कारगर साबित होंगी मुर्मू

संविधान निर्माताओं समेत स्वाधीनता संग्राम से मंज-तपकर निकले सिद्धान्तनिष्ठ और खरे राजनेताओं की उस पुरानी पीढ़ी ने (जिसे यह पता था कि हमारा लोकतंत्र कितना बहुमूल्य है) यह कल्पना तक नहीं की होगी कि राज्यपाल और राष्ट्रपति जैसे पद...

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‘उफ़! टू मच डेमोक्रेसी’: सादा ज़बान में विरोधाभासों से निकलता व्यंग्य

डॉ. द्रोण कुमार शर्मा का व्यंग्य-संग्रह ‘उफ़! टू मच डेमोक्रेसी’ गुलमोहर किताब से प्रकाशित हुआ है। वैसे तो ये व्यंग्य ‘न्यूज़क्लिक’...