क्या धन के बल पर बदली जा सकती है वैश्विक नैतिकता?

हाल के दिनों में यह चर्चा सामने आई है कि अमेरिका में इज़राइल अपनी सार्वजनिक छवि को बेहतर बनाने और अपने पक्ष में माहौल तैयार करने के लिए करोड़ों डॉलर की राशि ऑर्थोडॉक्स चर्चों, प्रभावशाली धार्मिक समूहों तथा सोशल मीडिया अभियानों पर खर्च करने की योजना बना रहा है। यदि ऐसी पहलें वास्तव में चल रही हैं, तो यह केवल एक देश की जनसंपर्क रणनीति का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतांत्रिक समाजों में जनमत, सूचना और नैतिकता के संबंधों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

जैसाकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि संप्रति युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते। वे कैमरों, मोबाइल स्क्रीन, समाचार चैनलों, एल्गोरिदम और डिजिटल मंचों पर भी लड़े जाते हैं। किसी भी सैन्य संघर्ष के साथ-साथ एक समानांतर संघर्ष “कहानी” का होता है—कौन पीड़ित है, कौन आक्रामक है, किसकी आत्मरक्षा वैध है और किसकी प्रतिक्रिया अमानवीय। इस कथा को नियंत्रित करना आधुनिक भू-राजनीति का एक महत्वपूर्ण हथियार बन चुका है।

सोशल मीडिया ने सूचना के लोकतंत्रीकरण का वादा किया था, लेकिन धीरे-धीरे यह संगठित प्रचार, लक्षित विज्ञापन और भावनात्मक ध्रुवीकरण का भी माध्यम बन गया। यदि किसी सरकार या उससे जुड़े समूहों द्वारा बड़ी धनराशि खर्च करके प्रभावशाली खातों, डिजिटल अभियानों या वैचारिक नेटवर्कों को सक्रिय किया जाता है, तो सामान्य नागरिक के लिए निष्पक्ष सूचना और योजनाबद्ध प्रचार के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।

धार्मिक संस्थाओं की भूमिका का प्रश्न और भी संवेदनशील है। चर्च, मस्जिद, मंदिर या अन्य धार्मिक संगठन सामान्यतः नैतिक मार्गदर्शन और मानवीय मूल्यों के प्रतीक माने जाते हैं। यदि वे किसी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संघर्ष में सक्रिय पैरोकारी का माध्यम बनते हैं, तो उनकी आध्यात्मिक विश्वसनीयता पर प्रश्न उठ सकते हैं। श्रद्धा और रणनीतिक संचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।

यह भी समझना होगा कि सार्वजनिक कूटनीति और प्रचार में अंतर है। प्रत्येक देश अपनी नीतियों का समर्थन जुटाने, सांस्कृतिक छवि बनाने और विदेशों में अपने दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सामान्य हिस्सा है। किंतु जब तथ्य चयनात्मक हों, विरोधी पक्ष को अमानवीय रूप में प्रस्तुत किया जाए, या डिजिटल माध्यमों के जरिए भावनात्मक हेरफेर किया जाए, तब यह स्वस्थ संवाद की सीमा से आगे बढ़कर प्रचार की श्रेणी में आ सकता है।

इज़राइल के संदर्भ में यह विमर्श विशेष रूप से इसलिए तीखा है क्योंकि ग़ाज़ा और व्यापक पश्चिम एशिया की घटनाओं ने विश्व समुदाय को गहराई से विभाजित किया है। एक ओर इज़राइल अपनी सुरक्षा और आतंकवादी हमलों से रक्षा का तर्क देता है, दूसरी ओर बड़ी संख्या में नागरिक हताहतों और मानवीय संकट को लेकर गंभीर अंतरराष्ट्रीय आलोचना भी सामने आती रही है। ऐसे वातावरण में छवि-निर्माण पर भारी निवेश इस आशंका को जन्म देता है कि कहीं नैतिक बहस को जनसंपर्क अभियानों से प्रभावित करने का प्रयास तो नहीं हो रहा।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में विचारों की प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। केवल इसलिए कि कोई पक्ष अपने समर्थन में अभियान चलाए, उसे स्वतः अवैध या अनैतिक नहीं कहा जा सकता। वास्तविक प्रश्न पारदर्शिता का है। यदि वित्तपोषण, विज्ञापन, लॉबिंग और डिजिटल सामग्री के स्रोत स्पष्ट हों, तो नागरिक स्वयं निर्णय लेने में अधिक सक्षम होते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब प्रचार स्वतःस्फूर्त जनमत का रूप धारण कर ले और उसके पीछे के आर्थिक या संस्थागत हित छिपे रहें।

इस पूरे परिदृश्य में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उनके एल्गोरिदम अक्सर वही सामग्री आगे बढ़ाते हैं जो अधिक भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करे। इससे संतुलित विश्लेषण पीछे छूट जाता है और उग्र, विभाजनकारी या सनसनीखेज सामग्री अधिक व्यापक रूप से फैलती है। यदि बड़े वित्तीय संसाधनों से ऐसे तंत्रों का लाभ उठाया जाए, तो सूचना का असंतुलन और बढ़ सकता है।

लोकतंत्र की शक्ति स्वतंत्र मत में निहित है, न कि खरीदी गई सहमति में। नागरिकों को यह अधिकार है कि वे जान सकें कि उनके सामने प्रस्तुत विचार किन स्रोतों से प्रेरित हैं, किसके द्वारा वित्तपोषित हैं और किन उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। पारदर्शिता, मीडिया साक्षरता और स्वतंत्र पत्रकारिता इस संदर्भ में पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गई हैं।

अंततः यह प्रश्न केवल इज़राइल का नहीं है। विश्व की अनेक सरकारें, राजनीतिक समूह और प्रभावशाली संस्थाएँ अपनी वैश्विक छवि सुधारने के लिए लॉबिंग, जनसंपर्क और डिजिटल अभियानों पर भारी धन खर्च करती हैं। इसलिए मुद्दा किसी एक राष्ट्र का नहीं, बल्कि उस वैश्विक प्रवृत्ति का है जिसमें सूचना स्वयं शक्ति का साधन बन गई है।

इतिहास बताता है कि धन से विज्ञापन खरीदे जा सकते हैं, प्रभावशाली चेहरे जुटाए जा सकते हैं, डिजिटल अभियानों की बाढ़ लाई जा सकती है और कुछ समय के लिए जनमत को प्रभावित भी किया जा सकता है। किंतु नैतिक वैधता अंततः तथ्यों, न्याय और मानवीय आचरण से ही अर्जित होती है। यदि किसी राष्ट्र, संस्था या सत्ता को अपनी छवि सुधारने के लिए लगातार महंगे प्रचार अभियानों का सहारा लेना पड़े, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि समस्या छवि में है या उन नीतियों में जिनकी छवि बनाई जा रही है।

आज सूचना स्वयं एक युद्धक्षेत्र बन चुकी है। ऐसे समय में नागरिकों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसी भी दावे को उसकी वित्तीय और वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ परखने की है। लोकतंत्र का भविष्य उन समाजों पर निर्भर करेगा जो प्रचार और तथ्य, भावनात्मक उन्माद और नैतिक विवेक, तथा खरीदी गई सहमति और स्वतंत्र विचार के बीच अंतर कर सकें। अंततः धन से शोर पैदा किया जा सकता है, किंतु सत्य की विश्वसनीयता खरीदी नहीं जा सकती। इतिहास प्रचार अभियानों की चमक से अधिक उन कर्मों को याद रखता है जिन्होंने मानवता और न्याय की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध किया।

सच्ची प्रतिष्ठा विज्ञापन से नहीं, आचरण से अर्जित होती है। यदि किसी राष्ट्र की नीतियाँ न्याय, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों पर आधारित हों, तो उसकी छवि स्वाभाविक रूप से मजबूत होती है। लेकिन यदि छवि सुधारने के लिए वास्तविकताओं की जगह प्रचार को प्राथमिकता दी जाए, तो वह अल्पकालिक लाभ भले दे, दीर्घकाल में विश्वास की नींव को कमजोर कर सकता है। इतिहास अंततः अभियानों को नहीं, बल्कि कर्मों को याद रखता है।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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