योगेन्द्र यादव और मैं योजना आयोग की असेस्मेंट एण्ड मोनिट्रिंग अथॉरिटी के सदस्य थे। इस संस्था की ज़िम्मेदारी केन्द्र सरकार के सभी अल्पसंख्यक कल्याण योजनाओं की निगरानी करना था। हम इस काम को कितनी कुशलतापूर्वक कर पाए, यह एक अलग चर्चा का विषय है। एएमए का गठन सच्चर समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर किया गया था।
वैसे तो चुनावी नतीजों का विश्लेषण करते हुए टीवी पर नज़र आने वाले योगेन्द्र यादव का मैं पहले से ही प्रशंसक था, लेकिन कमरों के अन्दर होने वाली बैठकों में उन्हें सुनने का मौक़ा मुझे पहली दफ़ा मिला। चर्चाओं के दौरान वे सबसे बेहतरीन सुझाव देने में सक्षम थे।
ज़ाहिरा तौर पर, मैं चुनाव लड़ने समेत उनकी राजनीतिक गतिविधियों के लिए उनकी सराहना नहीं करता था। मेरे ख़याल में वे नारे लगाने और जातिगत और सामुदायिक भावनाओं में बहने वाले मतदाताओं से वोट की अपील करने से ज़्यादा अकादमिक और बौद्धिक जगत के लिए उपयुक्त थे। यादव उन लोगों की सूची में सबसे ऊपर थे जिन्होंने बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा के बाद सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था।
27 मई को जब सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर पर अपना आख़िरी फैसला सुनाया, तब यादव उस फैसले को प्रत्यक्ष तौर पर सुनने अदालत नहीं गये, क्योंकि उन्हें फैसले का पहले से ही अंदाज़ा था। मैंने एसआईआर पर विस्तार से लिखा है और मुझे भी मालूम था कि निर्वाचन आयोग को चुनौती देने वाली याचिकाओं का हश्र अन्ततः क्या होने वाला है।
देश के असंख्य लोगों की तरह मुझे भी आभास था कि ज्ञानेश कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और डॉ सुखबीर सिंह संधू व डॉ विवेक जोशी को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त करने के पीछे केन्द्र सरकार की कोई ख़ास मंशा है। ऐसा करने के लिए सरकार ने नियुक्ति सम्बन्धी क़ानून में ही तब्दीली कर दी थी। इसके पहले इनका चयन प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय समिति द्वारा होता था।
सरकार ने अपनी सुविधानुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश को इस समिति से बेदख़ल कर उनके स्थान पर गृह मंत्री को चुन लिया। मिगेल दे सवर्ण्टेस के क्लासिक उपन्यास में दोन किहोते के मशहूर और वफ़ादार संगी साँचो पांजा की कहानी से कौन अंजान है? वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। नये मुख्य निर्वाचन आयुक्त गृह मंत्री अमित शाह के लिए अजनबी नहीं थे, वे शाह के नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय में कार्यरत रह चुके हैं।
सरकार किस दिशा में अग्रसर हो रही थी यह इस बात से स्पष्ट था जब इस निराले क़ानून को इस नापाक गठजोड़ की सेवा के लिए बनाया जा रहा था। निर्वाचन आयोग के सदस्य के तौर पर उनके कार्रवाइयों के लिए उन्हें कभी सवालों के कटघड़े में खड़ा नहीं किया जा सकता है। यही नहीं, किसी जघन्य अपराध का आरोप लगने की सूरत में भी उन्हें गिरफ़्तारी से संरक्षण दे दिया गया। भारत में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति समेत किसी को भी ऐसा अधिकार प्राप्त नहीं है।
अतीत में यह मशहूर नियम था कि राजा कभी ग़लत नहीं हो सकता। अर्थात, सम्राट किसी भी क़ानूनी दोषारोपण से परे है और ग़लतियों या नाइंसाफ़ी के लिए व्यक्तिगत तौर पर ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। संवैधानिक व्यवस्थाओं में मंत्री और सलाहकार जवाबदेह बनाये गये। इस नये क़ानून से मुझे महाभारत के कर्ण की याद आ गयी जो जन्म से ही कवच – प्राकृतिक रक्षात्मक ढाल और अलौकिक बाली कुण्डल लेकर पैदा हुआ था। इनके कारण वह अजेय था।
युद्ध से पहले देवराज इन्द्र ने कर्ण की दानवीरता का फ़ायदा उठा कर ये कवच-कुण्डल उससे ले लिए, जिसके उपरान्त युद्ध के सत्रहवें दिन वह अर्जुन के हाथों मारा गया। कर्ण के विपरीत ये तीन आज सुरक्षित हैं। जब उन्होंने वर्ष 2003 को आधार मानकर मतदाता सूची के पुनरीक्षण की घोषणा की, बजाए उस मतदाता सूची के आधार पर जिसके चुनाव के परिणामस्वरूप नरेन्द्र मोदी सत्ता में लौटे थे, तब मैं समझ चुका था कि वे किसे निशाना बनाना चाहते हैं।
ये त्रासद ही था कि उन्होंने एसआईआर की शुरुआत के लिए बिहार को चुना। बिहार में स्थित वैशाली गणतन्त्र की संकल्पना की जननी रही है, वह भी प्राचीन यूनान के लोकतान्त्रिक नगर-राज्य के अस्तित्व में आने से सैंकड़ों वर्ष पहले से। लिच्छवि गण ने गण-संघ नामक एक अनोखी शासन व्यवस्था का विकास किया, जिसमें निर्णय किसी राजा की इच्छा पर निर्भर नहीं था बल्कि सार्वजनिक सभाओं, बहसों और सहमति के आधार पर लिया जाता था। इस प्रारम्भिक प्रयोग ने इस मूल भावना को स्थापित करने का काम किया कि शासन व्यवस्था में नागरिकों की भी भागीदारी और हस्तक्षेप हो सकती है। एसआईआर का उद्देश्य ठीक उल्टा है।
चुनाव आयोग को जानकारी थी कि बिहार में 2021 के विधानसभा चुनाव और सरकार के गठन के बाद अगले चुनाव 2026 में होंगे। वे चाहते तो एसआईआर का काम उस वक़्त ही शुरू किया जा सकता था। लेकिन उन्होंने इस प्रक्रिया को अंजाम देने में हड़बड़ी करने के लिए अन्तिम समय का इंतज़ार किया। वे हर तरह की समीक्षा, ख़ास कर न्यायायिक समीक्षा, से बचने की उम्मीद कर रहे थे।
जब एसआईआर लागू किया गया, तभी साफ़ हो गया था की इसका सबसे ज़्यादा असर ग़रीबों, प्रवासी मज़दूरों, बाढ़ के कारण बार-बार विस्थापित होने वाले लोगों और उन निरक्षरों पर पड़ेगा जिन्हें शायद यह भी याद न हो कि उन्होंने 2003 में मतदान किया था या नहीं। यहाँ तक कि आधार कार्ड भी राष्ट्रीयता के प्रमाण के रूप में स्वीकार्य नहीं था। यही वजह थी की यादव जैसे कई जनहितैषी व्यक्तियों, राजनीतिक पार्टियों, मानवाधिकार संगठनों और अल्पसंख्यक संस्थाओं ने सर्वोच्च न्यायालय में एसआईआर की प्रक्रिया को चुनौती दी थी।
एक कहावत है : न्याय में देरी अन्याय है। अर्थात अगर न्याय मिलने में देर हो जाये तो उसका महत्व ख़तम हो जाता है। न्यायालयों के विलम्बित निर्णय लोगों की पीड़ा को बढ़ाती है, राहत से वंचित करता है, और निष्पक्षता को निरर्थक बना देता है। याचना केवल इतनी थी कि एसआईआर की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया जाये ताकि लोगों को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए प्रमाण जमा करने का मौक़ा मिल सके। परिस्थितियों की माँग थी की तुरन्त हस्तक्षेप किया जाये। लेकिन मूल मुद्दे पर ध्यान देने के बजाए न्यायालय ने इसपर प्रक्रिया सम्बन्धी दिक़्क़तों को संबोधित किया।
जैसे जैसे चुनाव नज़दीक आते गये और एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के क़रीब आ गयी, यह दिन के उजाले की तरह साफ़ हो गया की कुछ भी ठोस नहीं होने वाला है। जब मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और उनके उपरान्त डीवाई चंद्रचूड़ ने सर्वोच्च न्यायालय का नेतृत्व किया, तब नागरिक स्वतन्त्रता समूहों और याचिककर्ताओं ने कई संवेदनशील और महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों की सुनवाई में देरी, उन्हें सूचीबद्ध करने में देरी अथवा आनाकानी, ख़ारिज कर देने की प्रवृत्ति की आलोचना की थी।
उदाहरणार्थ, जम्मू और कश्मीर के विशेष राज्य के दर्जे को समाप्त किये जाने को चुनौती देते हुयए याचिकाएँ मुख्य न्यायाधीश गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष 2019 में पेश किया गया था, लेकिन इनपर नियमित सुनवाई मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ के कार्यकाल 2023 तक भी शुरू नहीं हुई। इसी तरह नागरिकता संशोधन अधिनियम और इलेक्टोराल बॉण्ड स्कीम को चुनौती देने वाली याचिकाएँ भी शुरुआती वर्षों में शायद ही गम्भीर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गयीं जिसके कारण सामाजिक कार्यकर्ताओं ने न्यायालय की कथित निष्क्रियता की आलोचना की थी।
मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोगोई द्वारा लिए गये प्रशासनिक निर्णयों की जाँच की माँग की जनहित याचिकाओं को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के विरुद्ध इस प्रकार की माँगें स्वीकार्य नहीं हैं। गोगोई को राज्यसभा का सदस्य बनाया गया, केवल विशेषाधिकारों का फ़ायदा देने के लिए, क्योंकि वे शायद ही कभी संसद की कार्यवाहियों के दौरान उपस्थित रहे या बहस में भाग लिया। वहीं चन्द्रचूड़ ने अपने घर में धार्मिक पूजा के लिए प्रधान मंत्री को आमंत्रित करना ज़रूरी समझा।
एसआईआर के विरुद्ध दायर अनेक याचिकाओं और लाखों लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाये जाने की शिकायतों के बावजूद बिहार में चुनाव सम्पन्न कराये गये। यह अब केवल अनुमान का विषय है कि यदि पिछले चुनाव के मतदाता सूची को संशोधित किया गया होता, तो परिणाम क्या होते। सच तो यह है कि एसआईआर के नाम पर लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित कर दिया गया, जिनमें अधिकांश एक विशेष समुदाय से संबन्धित थे।
इसके बाद असम, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में भी चुनाव हुए। पश्चिम बंगाल में जो हुआ, वह अविश्वसनीय था। कोलकाता के सबसे प्रतिष्ठित समाचारपत्र के पूर्व सम्पादक रहे मेरे एक मित्र तक का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया। इन जगहों पर अब नई सरकारें सत्ता में हैं।
किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि सर्वोच्च न्यायालय एसआईआर को असंवैधानिक क़रार देगा और उसके आधार पर हुए चुनावों को अमान्य ठहरा देगा। कल्पना कीजिये कि केन्द्र सरकार हाल में चुनाव सम्पन्न कराने वाले 5 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दे। यही वजह थी कि न्यायालय के निर्णय के प्रति मैं बहुत आशावान नहीं था।
असल में यह फैसला कई मायनों में पहले से तय था। इसलिए न्यायालय ने ख़ुद को मुख्यतः प्रक्रिया से जुड़े सवालों तक सीमित रखा और संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग के प्रामाणिक मतदाता सूचियों को संशोधित और अनुरक्षण करने के अधिकार को पुनः रेखांकित किया। निस्संदेह, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित चुनावों के आरम्भ से ही मतदाता सूचियों का आवर्ती पुनरीक्षण भारतीय लोकतन्त्र की स्थापित परम्परा रही है। इस सिद्धान्त के मद्देनज़र चुनाव आयोग की शक्तियों को शायद ही कोई गम्भीर चुनौती का सामना करना पड़ता।
बल्कि यह दूध को दूध कहने जैसा होता, उदाहरण के लिए यह कहना कि राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च सेनापति हैं, या यह कि भारत में केन्द्र स्टार पर द्वि-सदनीय संसद प्रणाली है। फिर भी, इस निर्णय ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं जिन्हें केवल इसलिए दरकिनार नहीं किया जा सकता कि इस प्रक्रिया को न्यायायिक स्वीकृति मिल गयी है।
न्यायालय ने एसआईआर लागू करने की जल्दबाज़ी की पर्याप्त समीक्षा नहीं की। लोकतन्त्र केवल मतदाता सूची का पुनरीक्षण नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है की कोई भी योग्य मतदाता छूट न जाए। निष्पक्ष पुनरीक्षण प्रक्रिया के लिए पर्याप्त सूचना, पारदर्शिता और उन लोगों को अपनी पात्रता सिद्ध करने और नाम पुनःदर्ज कराने का पर्याप्त समय दिया जाना आवश्यक है जिनका नाम किसी ग़लती की वजह से हटा दिया गया हो। इस प्रक्रिया के कारण मानवीय परिणामों के बजाए केवल आयोग के अधिकारों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए न्यायालय ने इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया की जल्दबाज़ी में लागू हुए SIR के कारण कितने बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया।
फिर भी, इस निर्णय में एक महत्वपूर्ण संरक्षोपाय शामिल है। इसमें स्पष्ट है की किसी व्यक्ति की नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार सरकार मात्र, विशेष तौर पर केन्द्रीय गृह मंत्रालय, के पास है, न कि चुनाव आयोग के पास। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि आयोग ने लाखों नाम मतदाता सूची से इस सन्देह के आधार पर हटा दिये की संबन्धित व्यक्ति शायद नागरिक नहीं हैं।
इस प्रकार यह निर्णय प्रभावित व्यक्तियों के लिए सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष अपनी नागरिकता साबित करने का एक दरवाज़ा खुला छोड़ता है। लेकिन जो लोग लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से ही बाहर कर दिये गये हैं, यह उनके लिए सीमित सांत्वना के समान है। उनमें से ऐसे कितने ही लोग होंगे जिनके पास अदालत का दरवाज़ा खटखटाने से लेकर अनुकूल निर्णय के लिए धैर्य के साथ इंतज़ार करने के संसाधन उपलब्ध हैं? निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रिया में नज़र आने वाला विजयोल्लास इस सच्चाई को नहीं छिपा सकता की एसआईआर लागू करने में जल्दबाज़ी की गयी और नतीजतन भविष्य में कई वर्षों तक में भारत का लोकतंत्र इसका नतीजा भुगतेगा।
केन्द्रीय चुनाव आयोग का तर्क था कि इस बार मतदान प्रतिशत अधिक रहा। इसका कारण यह डर था कि यदि किसी ने इस चुनाव में मतदान नहीं किया तो अगले चुनाव में उनका मताधिकार छीन लिया जाएगा। इसलिए केरल जैसे दूर प्रदेशों तक से लोग असम, पश्चिम बंगाल और बिहार वापस आए ताकि वे मतदान कर यह साबित कर सकें की वे भारत के नागरिक हैं। अब तक भारत में कहीं भी पैदा हुआ व्यक्ति भारत का नागरिक था। अब अपनी नागरिकता के प्रमाण के तौर पर आपको कई कागज़ातों की ज़रूरत हैं, विशेषकर एक ख़ास समुदाय को।
कारगिल युद्ध में भाग लेने वाले एक सम्मानित सैन्य अधिकारी को “राज्य-विहीन” पाया गया। यही नहीं, कुछ सरकारी अधिकारी शांतिनिकेतन में स्थित प्रतिची (जिसका अर्थ है पश्चिमी छोर) तक यह स्त्यापित करने के लिए गये की नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर आमर्त्य सेन भारत में वोट करने के अधिकारी थे या नहीं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ा की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें उन्हें शिक्षा सम्बन्धी शोध के लिए नोबल पुरस्कार के बराबर की राशि दी थी, जिसका अधिकांश काम पश्चिम बंगाल में सम्पन्न होना था।
यदि एसआईआर की प्रक्रिया को देश भर में लागू किया जाएगा तो 10 करोड़ लोगों की इससे प्रभावित होने की आशंका है। यदि लाखों लोगों को वोट देने से पहले यह साबित करना पड़ जाए कि वे इसके अधिकारी हैं तो एक लोकतन्त्र के पास कोई नैतिक बल नहीं बचेगा । एक कहावत है जो झेलता है, वही समझता है। जो लाखों लोग आज मताधिकार से वंचित कर दिये गये हैं, वे ही समझते हैं कि एसआईआर ने उनकी ज़िन्दगी को किस क़दर झकझोर दिया है।
यदि एसआईआर की प्रक्रिया अन्ततः देशभर में लागू कर दी जाती है तो इसके परिणामस्वरूप भारत के लोकतन्त्र का चरित्र ही बदल जाएगा। मतदाता सूची महज़ प्रशासनिक दस्तावेज़ नहीं हैं; वे नागरिकता के व्यवहार का आधार हैं।
ऐसी कोई प्रक्रिया जो भय, अनिश्चितता और बहिष्करण पैदा करती है आम नागरिकों का लोकतान्त्रिक संस्थाओं में भरोसा तोड़ने का काम करती है। भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग के प्राधिकार को वैध ठहरा दिया हो, लेकिन न्याय, संवेदना और संवैधानिक नैतिकता की ऐवज में वैधता का नाम नहीं लिया जा सकता। भारत जैसे वैविध्यपूर्ण राष्ट्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी नागरिक को बार-बार अपनी नागरिकता सिद्ध करने के लिए बाध्य न होना पड़े। लोकतंत्र बहिष्कार से नहीं, बल्कि विश्वास और समावेशन से जीवित रहता है। गण-संघ ज़रूरी है, जन-संख्या नहीं।
(एजे फ़िलिप का लेख इंडियन करंट्स से साभार। अनुवाद : वृषाली श्रुति। मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं।)