देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पाने वाला इंदौर आज कई ऐसे मुद्दों से जूझ रहा है, जिन पर शहर को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। विकास, निवेश, प्रशासनिक फैसलों और संसाधनों के बंटवारे से जुड़े कई मामलों में समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या इंदौर को उसकी आबादी, योगदान और जरूरतों के अनुरूप महत्व मिल रहा है?
जब किसी संस्थान, परियोजना, सरकारी सुविधा या निवेश को दूसरे शहर की ओर मोड़ा जाता है, तब इंदौर के नागरिकों के मन में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि आखिर शहर के हितों की आवाज कौन उठाएगा? व्यापार, उद्योग, शिक्षा और कर राजस्व के मामले में प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहलाने वाला इंदौर यदि अपने अधिकारों और आवश्यकताओं के लिए मुखर नहीं होगा, तो उसकी अपेक्षाओं को कौन सामने रखेगा?
लोकतंत्र में चुप्पी कभी-कभी सहमति मानी जाती है। इसलिए नागरिकों, सामाजिक संगठनों, व्यापारिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों की यह जिम्मेदारी है कि वे तथ्यों और तर्कों के आधार पर शहर के हितों की रक्षा करें। यह किसी दूसरे शहर के विरोध का विषय नहीं, बल्कि इंदौर को उसका उचित हक दिलाने का प्रश्न है।
इंदौर ने हमेशा प्रदेश को नेतृत्व दिया है। अब सवाल यह है कि जब शहर के हित प्रभावित होते दिखाई दें, तब क्या इंदौर केवल दर्शक बना रहेगा या अपनी आवाज लोकतांत्रिक और सकारात्मक तरीके से बुलंद करेगा?
लगता है इंदौर का नेतृत्व बौना हो गया है इसी के चलते लगातार इंदौर के हक पर कुठाराघात हो रहा है। एक के बाद एक सुविधा छीनी जा रही है, लेकिन इंदौर का नेतृत्व जो लगातार लंबे भाषण देने और हार फूल से स्वागत करने में आगे रहता है, इंदौर के हक छिन जाने पर चुप्पी साधे हुए हैं। शायद मुख्यमंत्री के सामने सबकी बोलती बंद है जिसके चलते इंदौर से हक उज्जैन को लगातार ट्रांसफर किए जा रहे हैं।
इंदौर के हाथ से हक रेत की तरह फिसलते जा रहे हैं। लगता है कि इंदौर का नेतृत्व बोना हो गया है और यहां के हक की आवाज उठाने को कोई तैयार नहीं है
क्या पता बात चलती तो यहां के स्कूल-कॉलेज और अस्पताल तक उठाकर कहीं और रख दिए जाते और इंदौर असहाय हो देखता रह जाता।
इंदौर के वे लोग आज खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं, जिन्होंने दिन-रात मेहनत की, विदेशों से एक्सपर्ट बुलाए। उनके साथ घंटों सिर खपाया और मेट्रोपॉलिटन अर्थोरिटी का प्लान बनाया। उसे लागू कराने के लिए भोपाल-इंदौर एक कर दिया। मंत्रियों, अफसरों से समय ले-लेकर बार-बार उनके दरवाजे पर दस्तक दी। किसी का कोई स्वार्थ नहीं था, सिवाय इसके कि हमारा शहर बेहतर हो। हमारा इंदौर आगे बढ़े, यहां के लोग तरक्की करें। बच्चे बेहतर भविष्य देखें, लेकिन हुआ क्या।
पुरानी कहावत है नाचे-कूदे बांदरी और खीर खाए फकीर। इंदौर फर्स्ट क्लास का टिकट लेकर स्टेशन पर खड़ा रह गया। किसी ने पूरी ट्रेन रिवर्स में ले जाकर किसी और ही स्टेशन पर खड़ी कर दी।नाम छीना, पहचान पीछे धकेली और अब उसका मुख्यालय भी बदलने की बात चल रही है, फिर भी किसी का खून नहीं खौल रहा।
मेट्रोपॉलिटन अथॉरिटी में इंदौर का नाम पीछे करने के बाद मुख्यालय भी उज्जैन करने के आसार हैं। हालांकि अफसर स्पष्ट तौर पर कुछ भी कहने से बच रहे हैं। ग्लोबल इन्वेस्टर समिट भी लगातार दूसरी बार भोपाल में होगी, जबकि लंबे समय तक यह इंदौर में ही होती रही है। पीथमपुर सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है, लेकिन एनटीएच (नेशनल टेस्टिंग हाउस) लैब विक्रमपुरी औद्योगिक क्षेत्र उज्जैन में बनी है।
मेट्रोपॉलिटन रीजन में इंदौर का शत-प्रतिशत क्षेत्र और उज्जैन का सिर्फ 59% एरिया शामिल है। अथॉरिटी क्षेत्र में सबसे बड़ा शहर इंदौर है फिर भी इंदौर को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। रेलवे बेहतर है इंदौर को इस रीजन से बाहर कर दें।
क्या इंदौर एकतरफा समर्थन की कीमत चुका रहा है? कोई बोलने वाला नहीं बचा है, आवाज उठाने वाला नहीं बचा है। सिर्फ तमाशबीन रह गए हैं, जिनके पास भूमिपूजन, शिलान्यास करने और लच्छेदार भाषण देने के अलावा कोई काम नहीं बचा है। ऐसे जनप्रतिनिधि को क्या कहेंगे, जो इंदौर के साथ लगातार हो रही इस लूट पर भी मुंह नहीं खोल पा रहे हैं। कहां तो नौ के नौ विधायक, सांसद, महापौर, पूरी परिषद नाम करने वाले इंदौर को सौगातों से लाद दिया जाना चाहिए था, लेकिन यहां तो उसी से छीना-झपटी में ही लगे हैं।
इंदौर को मप्र की व्यावसायिक राजधानी कहते नहीं थकते थे, लेकिन अब ग्लोबल इन्वेस्टर समिट तक के लायक हमें नहीं समझा जा रहा। इंदौर जिसने पहली समिट से प्रदेश में विकास के नए द्वार खोले थे। जिसकी सड़कों को अमेरिका से बेहतर बताया गया था। जहां की इंडस्ट्री को दिखाकर मप्र की शान में कसीदे पढ़े जाते थे। जिसके स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, अस्पताल प्रदेश का गौरव बढ़ाते थे।
उसी शहर से एक-एक सुविधा, संसाधन और अवसर छीनते हुए किसी को लाज नहीं आ रही। न किसी का जमीर जाग रहा है कि आखिर ये इंदौर के साथ कैसा षड्यंत्र हो रहा है।
राजीव गांधी टेक्निकल यूनिवर्सिटी के तीन हिस्से किए जाते हैं तब भी इंदौर की किसी को याद नहीं आती है। एसजीएसआईटीएस की विरासत तक भुला दी गई। आखिर इंदौर से ये कैसी दुश्मनी निकाली जा रही है। एनएबीएल लैब तक के लायक नहीं समझा गया हमें। पीथमपुर को कभी एशिया का डेट्राइट बनाने के सपने दिखाए जाते थे, वह अब तक तरस रहा है और लैब दूसरी ही जगह आकार ले रही है। हम ट्रिब्यूनल की बेंच तक के लिए तरस रहे हैं।
सहनशीलता की भी सीमा होती है और धैर्य भी कभी न कभी जवाब दे ही जाता है। तूफान के पहले का सन्नाटा और बाद की खामोशी दोनों ही जानलेवा होती है। समय पर इसे न भांप पाएंगे तो फिर भले सब साथ हों, समय साथ नहीं होगा।
मध्य प्रदेश के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में अकेले इन्दौर जिले का योगदान लगभग 10% से 12% है। इन्दौर की जीडीपी ₹1.7 लाख करोड़ रुपए सालाना के दायरे में है।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में इन्दौर शहर/जिले का प्रत्यक्ष योगदान 0.25% से 0.30% के करीब ठहरता है, जो किसी भी नॉन-कैपिटल (गैर-राजधानी) श्रेणी के टियर-2 शहर के लिए बहुत बड़ा आंकड़ा है।
रेरा मुख्यालय व बेंच दोनों नहीं – प्रदेश के सबसे बड़े रियल एस्टेट बाजार के बावजूद रेरा का मुख्यालय भोपाल रखा गया। इंदौर में बेंच खोलने की घोषणा अब तक जमीन पर नहीं आई।
जीएसटी ट्रिब्यूनल नहीं – वाणिज्यिक कर विभाग का मुख्यालय इंदौर में होने और सबसे बड़े कारोबारी केंद्र होने के बावजूद जीएसटी अपीलीय ट्रिब्यूनल की बेंच भोपाल में स्थापित की गई।
आरजीपीवी विभाजन में इंदौर नहीं- आरजीपीवी को तीन हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव में भोपाल, उज्जैन और जबलपुर को जोड़ा। इंदौर के एसजीएसआईटीएस को नई तकनीकी यूनिवर्सिटी नहीं बनाया।
इलेक्ट्रॉनिक टेस्टिंग लैब बंद, उपकरण भोपाल भेजे – इलेक्ट्रॉनिक कॉम्प्लेक्स में केंद्र सरकार की टेस्टिंग लैब वर्षों तक संचालित रही। बंद होने के बाद उपकरण भोपाल भेज दिए गए।
ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट- चापड़ा में अंतरराष्ट्रीय स्तर के ग्रीन फील्ड एयरपोर्ट की योजना बनी, जमीन भी चिन्हित हुई। प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ा। डीएमआईसी के लाभ भी बंटे। डिजिटल प्रदर्शनी प्रवासी भारतीय सम्मेलन में लगी डिजिटल प्रदर्शनी को राजबाड़ा में स्थापित करने की बात हुई थी। इसे भी भोपाल भेज दिया गया।
दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में इंदौर को केंद्रीय भूमिका मिलनी थी, लेकिन कई प्रमुख घटक देवास, उज्जैन, रतलाम व नीमच शिफ्ट कर दिए गए।
जीआईएस भोपाल शिफ्ट -2007 से शुरू हुई निवेश समिट का प्रमुख केंद्र इंदौर रहा। 2025 में इसे भोपाल किया गया, जबकि उद्योग जगत ने इसे इंदौर की पहचान से जुड़ा आयोजन माना था।
कान्ह डायवर्शन- कान्ह नदी का दूषित पानी शिप्रा में मिलने से रोकने 919 करोड़ का प्रोजेक्ट है। जहां से समस्या शुरू हुई उस इंदौर में कोई काम नहीं।
लेकिन इंदौर के नेतृत्व ने हमेशा चुप्पी साधे रखी। क्या इंदौर में 1999 के बाद से लगातार होना नेतृत्व हो गया है जो केवल अपने कुर्सी बचाने के लिए इंदौर के हकों से खिलवाड़ करता रहा है और इसकी आवाज नहीं उठा पा रहा है यदि ऐसा है तो इंदौर की जनता को ही सोचना पड़ेगा और मैदान में आना पड़ेगा नागरिकों से हक छीन जा रहे हैं और नेता मौज कर रहे हैं तो फिर नागरिक को चाहिए कि वे इंदौर के हक के लिए किसी बड़े आंदोलन की तैयारी करें ।
(रामस्वरूप मंत्री की टिप्पणी। लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार, समाजवादी पार्टी, मध्य प्रदेश के महासचिव और नागरिक समिति इंदौर के संयोजक हैं।)