राजस्थान में एक स्कूल की बिल्डिंग गिरने से हुई 7 बच्चों की मौत और 29 बच्चों का घायल होना सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है बल्कि जानबूझकर राज्य सरकार द्वारा होने दी गई एक आपराधिक घटना है। इसके लिए राजस्थान सरकार के अधिकारी जिन्होंने जर्जर बिल्डिंग को क्लीयरेंस दिया था और उसके साथ ही शिक्षा मंत्री जिनका ध्यान प्रदेश के स्कूलों पर नहीं जाता स्पष्ट रूप से जिम्मेदार हैं।
पूरे देश में सार्वजनिक प्राथमिक विद्यालयों का यही हाल है। सरकार ने उन्हें दुर्घटनाओं के भरोसे छोड़ रखा है। पहले तो इन सार्वजनिक प्राथमिक विद्यालयों को उचित ध्यान न देकर उसकी जरूरी मरम्मत न करा कर उसकी आधारभूत संरचनाओं को दुरुस्त ना करके उसे जर्जर होने दिया जाता है और फिर जब इन सब कारणों से उसमें बच्चों की संख्या गिरने लगती है तब इन्हीं विद्यालयों को कम बच्चे होने के नाम पर अन्य विद्यालयों में विलय कर दिया जाता है। लगभग पूरे देश में इसी तरह का ट्रेंड प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को लेकर चल रहा है।
यह सिर्फ विद्यालय की इमारत ही नहीं गिरी है और उसमें सात बच्चों की मौत और 29 घायल ही नहीं हुए हैं बल्कि यह इस देश के भविष्य निर्माण की पूरी इमारत का ध्वस्त होना है। इसके अलावा यह मौतें इस देश के एक बड़े सचेत प्रबुद्ध, पढ़ा लिखा,साक्षर जनमानस तैयार करने की सोच की मौत हुई है। इस देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था घायल हुई।
बहुत मुश्किल से आजादी के बाद जो एक चीज बड़ी आबादी को आसानी से मुकम्मल हुई थी वह थी राज्य द्वारा संचालित विद्यालयों में कम कीमत पर या निशुल्क शिक्षा हासिल कर लेने का अधिकार। इसी शिक्षा के अधिकार ने भारतीय लोकतंत्र की यात्रा को पिछले 7 दशकों से तमाम उतार चढ़ाव के बावजूद यहां तक लेकर आई। लेकिन अब इसी रीढ़ को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।
किसी देश की शिक्षा व्यवस्था उसकी वह बुनियाद होती है जिस पर उसके समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था उन सब की इमारत खड़ी होती है। शिक्षा व्यवस्था से सिर्फ साक्षरता ही नहीं हासिल होती बल्कि उसका मकसद एक सचेत और प्रबुद्ध नागरिक तैयार करना होता है जिससे समाज में कानून व्यवस्था स्थापित रहे, शांति स्थापित रहे और मानव विकास के विभिन्न आयाम को आसानी से हासिल किया जा सके। इसका मकसद उन मानव मूल्यों को भी स्थापित करना है जिससे समस्त समाज का कल्याण हो सके।
दकियानूसी, सामंती और पिछड़ी चेतनाओं को खारिज करते हुए एक नए प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष चेतना का निर्माण करना भी इन्हीं विद्यालयों का काम होता है। शिक्षा का मकसद एक व्यवस्थित जीवन यापन के लिए रोजगार से लेकर एक सचेत और मानवीय मूल्य से समृद्ध समाज का निर्माण करना है जिससे व्यवस्था के संचालन में तथा संचालन करने वालों के लिए भी सहूलियत हो सके।
पूरी दुनिया के सामाजिक बदलाव के ट्रेंड को अगर परखा जाए तो यह बात सामने आती है कि सभी विकसित समाजों में शिक्षा सरकार द्वारा दी जाती रही है। यानी सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के द्वारा ही समाज के शिक्षित किए जाने के लक्ष्य को हासिल किया जाता रहा है। जब जब सरकार इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से पीछे हटी है वहां पर भारी संख्या में शिक्षा व्यवस्था से कटाव पैदा हुआ है। उत्तर प्रदेश में ही 40 लाख बच्चों ने पिछले दो-तीन सालों में अपनी पढ़ाई छोड़ दी है।
यहां सिर्फ सामाजिक परिस्थितियां ही नहीं हैं बल्कि स्पष्ट तौर पर सरकार द्वारा उपेक्षित शिक्षा व्यवस्था के कारण इस देश का भविष्य पढ़ाई लिखाई से वंचित होने के लिए मजबूर है। आज जब एक तरफ पूरी दुनिया में जबरदस्त समृद्धि स्थापित हो चुकी है तब भी हमारे ही सबसे बड़े प्रदेश में से एक में बच्चे अपनी पढ़ाई लिखाई छोड़ने को आखिर मजबूर और बेबस क्यों हैं, इसका जवाब तो ढूंढना होगा और सवाल भी पूछने होंगे।
असल में सवाल न पूछे जाएं इसीलिए तो शिक्षा व्यवस्था को चौपट किया जा रहा है। अगर प्रबुद्ध चेतना के साथ बच्चे जो कल को सचेत नागरिक के रूप में तैयार होंगे वह सरकार के किए-धरे पर सवाल करेंगे और सटीक जवाब न मिलने पर एकजुट होने लगेंगे। इसी बात का डर सरकार को रहता है। सरकार यह भी चाहती है कि वह धन्नासेठों और पूंजीपतियों के लिए जो कर रही है, वह और ताकत के साथ करती रहे।
बड़ी-बड़ी निजी फैक्ट्री को स्थापित करने और उनके मालिकों को मुनाफा पहुंचने के लिए सरकार न सिर्फ भारी मात्रा में धनराशि मुहैया कराती है बल्कि समाज में सस्ता श्रम तैयार हो सके, उसके लिए जरूरी है कि शिक्षा व्यवस्था से बड़ी आबादी को वंचित किया जाए। क्योंकि पढ़े-लिखे लोग सचेत लोग पर्याप्त मजदूरी नहीं मिलने पर सवाल करेंगे और एकजुट होकर अपनी आवाज उठाएंगे। अगर ऐसा होने लगा तो पूंजी पतियों के मुनाखों में भारी कटौती होने लगेगी, सरकार को प्रगतिशील कर व्यवस्था लागू करनी होगी जिससे बड़े-बड़े अमीरों को भारी मात्रा में कर देना होगा ताकि उसे पैसा का उपयोग देश की भलाई में शिक्षा और चिकित्सा में खर्च किया जा सके।
पूरे देश में सरकारों का निर्माण कॉर्पोरेट के पैसों से किया जा रहा है। इसका स्पष्ट उदाहरण हमें इलेक्टोरल बांड से दिखाई देता है। राजनीतिक पार्टियों इन्हीं पूंजीपतियों के पैसों का इस्तेमाल कर चुनाव जीत पाती है और सत्ता बनाने के बाद बहुत साफ तौर पर नीतियों को इस रूप में लागू करती हैं जिससे धन पशुओं को अत्यधिक मुनाफा हासिल हो। बाजार आधारित और मुनाफा द्वारा संचालित व्यवस्था की बुनियादी शर्त है कि सरकार जिस भी व्यवस्था को संचालित कर रही है उससे पीछे हट जाए। उसमें नियंत्रण होने का मतलब है कि मुनाफे में कटौती होगी।
और अगर मुनाफे में बढ़ोतरी होती नहीं दिखी तो यह पूंजीपति लोग पैसा निवेश नहीं करेंगे। इसलिए जरूरी है कि सरकार इन सब मूलभूत जिम्मेदारियां से पीछे हटे ताकि जनता की रीढ़ तोड़कर उन्हें लूटा जा सके। इसी कॉर्पोरेट नीति के तहत हमारी सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन पर पैसा खर्च करने से बचती हैं। जिसका परिणाम राजस्थान में हुई मासूम बच्चों की मौत और तमाम विद्यालयों के विलय किए जाने के कारण लाखों बच्चों की पढ़ाई छूट जाने के रूप में हमारे सामने दिखाई देता है।
एक आंकड़ा यह बताता है कि इस देश की 20% आबादी शिक्षा और स्वास्थ्य पर यानी पढ़ाई और दवाई पर पैसा खर्च करके गरीबी रेखा में चली जाती है। यानी देश का बड़ा मेहनतकश वर्ग अपनी मेहनत का बड़ा हिस्सा सिर्फ बुनियादी जरूरत को पूरा करने में ही खर्च कर देता है। जीवन के विभिन्न आयाम जैसे मनोरंजन, सांस्कृतिक विविधता को जीना, पर्यटन करना इत्यादि तो उसके लिए बहुत दूर की बात हो जाती है। वह एक मशीन की तरह काम करते जाता है और उसके जीवन से अवकाश बहुत दूर चला जाता है। इस बेरोजगारी के संकट में अब जिंदा रहना ही सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।
इसी कारण से आए दिन आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं देखने को मिलती हैं। एक दुरुस्त शिक्षा व्यवस्था द्वारा इन सभी समस्याओं को बड़े पैमाने पर हल किया जा सकता है। जहां न सिर्फ देश का भविष्य शिक्षित और समृद्ध तैयार होगा बल्कि रोजगार के भी बहुआयामी अवसर विकसित होंगे। लेकिन यह सब तभी हो पाएगा जब शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने के जिम्मेदारी सरकार अपने ऊपर ले। इसे निजी मुनाफे की लूट के हवाले नहीं छोड़े।
एक ही चीज स्पष्ट रूप से संभव है या तो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था अपना कर इस देश की शिक्षा व्यवस्था को बेहतर किया जा सकता है या फिर निजी विद्यालयों के मालिकों को उनके अकूत धन संचय को बढ़ाने के लिए इस देश की रीढ़ से समझौता किया जा सकता हैं। निजी हाथों में शिक्षा व्यवस्था सौंप कर ना तो इस देश की संपूर्ण आबादी को शिक्षित और विकसित किया जा सकता है और ना ही पर्याप्त आधारभूत संरचनाओं के साथ उन्हें वैज्ञानिक, तार्किक और प्रगतिशील सोच समझ के साथ तैयार किया जा सकता है। एक तो निजी हाथों में इतनी पूंजी नहीं होगी कि वह तमाम जरूरी सहूलियत को बच्चों को उपलब्ध करा पाए और दूसरी तरफ उनकी लालच उन्हें हमेशा मूलभूत सुविधाओं में कटौती करने के लिए ही प्रेरित करेगी।
ऐसे में सिर्फ सरकार के पास ही वह ताकत और क्षमता है कि वह शिक्षा व्यवस्था की सभी जरूर को पूरा कर सकती है और रोजगार के नए अवसर के साथ-साथ एक दुरुस्त बहुआयामी शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध करा सकती है। लेकिन सरकार भी ऐसा करेगी कब,यह सवाल ज्यादा जरूरी हो जाता है। यह तभी संभव है जब समाज में इस बात को लेकर एक आम सहमति बनी हो कि निजी शिक्षा द्वारा सिर्फ डिग्री के नाम पर कागज प्राप्त हो रहा है और एक बेहतर मनुष्य के निर्माण की प्रक्रिया से समझौता हो रहा है।
वहीं अगर यह जिम्मेदारी सरकार के पास होगी और उसे जनता द्वारा नियंत्रित किया जाएगा तो जाहिर तौर पर शिक्षा की जरूरी सुविधाओं से कोई समझौता नहीं होगा और ना ही कोई भी बच्चा बेहतर शिक्षा प्रणाली से वंचित रह पाएगा। इस सचेत चेतना के साथ तैयार समाज ही एक ऐसे आंदोलन को जन्म दे सकता है जहां से उत्पन्न हुई ताकत और ऊर्जा के बल पर इन सभी निजी विद्यालयों के संचालन पर रोक लगाई जा सकती है और इन्हें सार्वजनिक हाथों में ले लिया जा सकता है।
विद्यालय की इमारत चाहे राजस्थान में गिरी हो या उत्तर प्रदेश में हो रहे विलय इन सब का सिर्फ एक ही समाधान हो सकता है, वह है सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ करना। इसके लिए स्पष्ट रूप से सरकार द्वारा अपनाई जा रही नव उदारवादी नीति के बेड़े को उखाड़ फेंकना होगा। जबरदस्त सामाजिक आंदोलन और एकजुटता की जरूरत होगी। इस बात को सबको समझना होगा और समझाना भी होगा अन्यथा ऐसी मौतों और बदहाल होती शिक्षा व्यवस्था एक नए तरह की सामान्य बात बन कर रह जाएगी। और देश एक बार फिर से एक नए तरह की गुलामी के दौर में चल जाएगा।
(मनीष कुमार छात्र संगठन आइसा के उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष हैं।)