उत्तराखंड में धर्मांतरण विरोधी कानून: सरकार की मंशा पर सवाल

    उत्तराखंड की धामी कैबिनेट ने हाल ही में उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता संशोधन विधेयक 2025 को मंजूरी दी है। इस विधेयक ने पहले से सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून को और कठोर बना दिया है। नए प्रावधानों में जबरन धर्मांतरण की सजा को 14 साल से बढ़ाकर आजीवन कारावास और जुर्माने को 50 हजार से बढ़ाकर 1 लाख रुपये कर दिया गया है। इसके साथ ही धर्म परिवर्तन से अर्जित संपत्ति को जब्त करने, डिजिटल माध्यमों और इंटरनेट नेटवर्किंग साइट्स के दुरुपयोग पर आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई, और विदेशी फंडिंग पर 10 लाख तक के जुर्माने जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं।

    जिला मजिस्ट्रेट को गैंगस्टर एक्ट की तर्ज पर संपत्ति कुर्क करने का अधिकार भी दिया गया है। सरकार इसे अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए जरूरी बता रही है, लेकिन इसकी सख्ती और अस्पष्टता ने कई सवाल खड़े किए हैं। दूसरी ओर, राज्य में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लोकायुक्त की नियुक्ति जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को सरकार लगातार नजरअंदाज कर रही है, जो उसकी मंशा पर सवाल उठाता है।

    कानून के प्रमुख प्रावधान

    संशोधित कानून में कई कठोर प्रावधान जोड़े गए हैं। जबरन धर्मांतरण के लिए सजा को 7 साल से बढ़ाकर आजीवन कारावास और जुर्माना 50 हजार से 1 लाख रुपये किया गया है। धर्म परिवर्तन से अर्जित संपत्ति को जब्त करने का प्रावधान शामिल है, जिसमें जिला मजिस्ट्रेट को कुर्की का अधिकार दिया गया है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए धर्म परिवर्तन के प्रलोभन पर आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई होगी। धर्मांतरण गतिविधियों के लिए विदेशी संस्थानों से फंड लेने पर 10 लाख तक का जुर्माना लगेगा। बिना वारंट गिरफ्तारी और सबूत का भार आरोपी पर डालने जैसे प्रावधान भी शामिल हैं, जो इस कानून को देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक बनाते हैं।

    अन्य राज्यों के कानूनों से तुलना

    भाजपा शासित कुछ अन्य राज्यों ने भी धर्मान्तरण कानून बनाये हैं लेकिन उत्तराखंड का यह कानून देश के अन्य राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों से अधिक सख्त है। उत्तर प्रदेश में अवैध धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के तहत 7 साल की सजा और 50 हजार रुपये तक का जुर्माना है। सामूहिक धर्मांतरण के लिए 10 साल तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन संपत्ति जब्ती का कोई प्रावधान नहीं है।

    मध्य प्रदेश के धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 में भी 7 साल तक की सजा और 50 हजार रुपये का जुर्माना है, जिसमें डिजिटल माध्यमों पर निगरानी शामिल है, लेकिन आजीवन कारावास या संपत्ति कुर्की जैसे प्रावधान नहीं हैं। गुजरात में 3 से 7 साल की सजा और 5 लाख तक का जुर्माना है, लेकिन संपत्ति कुर्की का प्रावधान नहीं है। हिमाचल प्रदेश में भी 7 साल तक की सजा है, लेकिन डिजिटल निगरानी या आजीवन कारावास जैसे प्रावधान नहीं हैं। इस तरह उत्तराखंड का कानून अपनी सख्ती में सबसे आगे है।

    सरकार का तर्क और वास्तविकता

    सरकार का कहना है कि यह कानून अवैध धर्मांतरण को रोकने और राज्य की जनसांख्यिकीय संरचना को बचाने के लिए जरूरी है। उत्तराखंड में 83% हिंदू, 14% मुस्लिम और कुछ ईसाई व अन्य समुदाय हैं। लेकिन क्या धर्मांतरण वाकई इतना बड़ा खतरा है? राज्य के सामने भ्रष्टाचार, पलायन, बेरोजगारी और पर्यावरणीय संकट जैसे गंभीर मुद्दे हैं, जिन पर सरकार का ध्यान अपर्याप्त दिखता है। भ्रष्टाचार व्यवस्था को खोखला कर रहा है। छोटे मामलों में कार्रवाई होती है, लेकिन बड़े भ्रष्ट नेता और नौकरशाह खुलेआम गतिविधियां चला रहे हैं।

    विशेष रूप से, लोकायुक्त की नियुक्ति का मुद्दा सरकार की प्राथमिकताओं की पोल खोलता है। वर्ष 2013 से उत्तराखंड में लोकायुक्त नहीं है, जबकि संसद द्वारा पारित लोकपाल और लोकायुक्त बिल, 2013 के बाद उत्तराखंड पहला राज्य था, जिसने लोकायुक्त के लिए संसद के ड्राफ्ट को हुबहु विधानसभा से पारित किया था। इसके बावजूद, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देशों के बाद भी सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2017 के चुनावी घोषणा पत्र में सत्ता में आने के 100 दिनों के भीतर लोकायुक्त गठन का वादा किया था, लेकिन यह वादा पूरा नहीं हुआ। इसके विपरीत, सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून को और सख्त करने में तत्परता दिखाई। यदि सरकार और उसके लोग ईमानदार हैं, तो लोकायुक्त के गठन से डर क्यों?

    पलायन और भू-माफिया की समस्या

    पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। भू-कानून बनाया गया, लेकिन इसे भूमाफियाओं और बाहरी निवेशकों के हित में ढाला गया। इससे स्थानीय लोग भूमिहीन हो रहे हैं और पलायन की समस्या और गंभीर हो रही है। बेरोजगारी और पर्यावरणीय संकट भी जनता के लिए तत्काल चिंता के विषय हैं। लेकिन सरकार इनके बजाय धर्मांतरण और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रही है। समान नागरिक संहिता की कोई तत्काल जरूरत नहीं थी, फिर भी इसे लागू कर सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा दिया गया।

    कानून पर उठते सवाल

    धर्मांतरण विरोधी कानून की सख्ती और अस्पष्टता कई सवाल उठाती है। संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। इस कानून के अस्पष्ट प्रावधान, जैसे इरादे के आधार पर गिरफ्तारी और सबूत का भार आरोपी पर डालना, इस अधिकार का हनन करते हैं। कठोर प्रावधानों का इस्तेमाल व्यक्तिगत बदले, धार्मिक समुदायों को निशाना बनाने और राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए हो सकता है। जब बेरोजगारी, पलायन, भ्रष्टाचार और पर्यावरणीय संकट जैसे मुद्दे प्राथमिकता मांगते हैं, तब धर्मांतरण को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और लोकायुक्त जैसे महत्वपूर्ण संस्थान को नजरअंदाज करना सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है।

    उत्तराखंड को भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी और जवाबदेह शासन की जरूरत है। धर्मांतरण विरोधी कानून और समान नागरिक संहिता जैसे कदम सामाजिक विभाजन को बढ़ाने और जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाने का काम कर रहे हैं। सरकार को लोकायुक्त की तत्काल नियुक्ति, भू-माफियाओं पर सख्ती, रोजगार सृजन और पर्यावरणीय संकट पर ध्यान देना चाहिए। धर्मांतरण विरोधी कानून के अस्पष्ट और कठोर प्रावधानों की समीक्षा होनी चाहिए ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों का हनन न हो। लोकायुक्त गठन जैसे वादों को पूरा न करके और विवादास्पद कानून बनाकर जनता का ध्यान भटकाना राज्य के दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है।

    (जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

    Leave a Reply