आज संजीव भट्ट की सजा को 7 साल पूरे हो गये हैं। पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट का नाम आप लोगों को याद होगा। वही संजीव भट्ट जिन्होंने गुजरात में वर्ष 2002 में हुये दंगा मामले का तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आरोप लगाने का जोखिम उठाया था। जिसके बाद भट्ट के ऊपर एक पर एक केस लादे गये। पहले उनके ऊपर गुजरात दंगा मामले में कथित सबूत गढ़ने का आरोप लगाया गया।
जिसके बाद भट्ट पर कस्टोडिल डेथ का आरोप लगाकर उन्हें जेल में डाल दिया गया। इस मामले में 29 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी आजीवन कारावास और जमानत की याचिका को खारिज कर दिया। गुजरात के जामनगर की एक अदालत ने प्रभुदास वैष्णानी की हिरासत में मौत मामले में संजीव भट्ट और एक अन्य पुलिसकर्मी को दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। पूर्व आईपीएस ने सेशन कोर्ट के फैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी। जिसके बाद 2024 में गुजरात हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ भट्ट की अपील खारिज कर दी थी।
आज संजीव भट्ट की सजा को सात वर्ष पूरे हो गये हैं। इस पर उनकी पत्नी श्वेता भट्ट ने सोशल मीडिया एक्स पर एक भावुक कर देने वाला पोस्ट लिखा है और कहा कि सरकार ने उन्हें गलत तरीके से कैद किया है। अपने पोस्ट में उन्होंने सरकार को फासीवादी कहते हुये जनता से न्याय के लिये लड़के का आह्वाहन किया है। वे लिखती हैं कि…
“मैं श्वेता संजीव भट्ट हूं,
आज 7 साल पूरे हो गए…2555 दिन हो गए जब एक ईमानदार और नेकदिल अधिकारी संजीव भट्ट जेल में सड़ रहे हैं – सत्ता के सामने सच बोलने का साहस दिखाने के लिए उन्हें गलत तरीके से कैद किया गया है!
जब मैं यह पोस्ट लिखने बैठी हूं, तो सोच रही हूं कि एक राष्ट्र के रूप में हम कब उन चीज़ों को भूल गए जो वाकई मायने रखती हैं… एक महत्वाकांक्षी फ़ासीवाद के नाज़ुक अहंकार को संतुष्ट करना कब हमारे देश की आत्मा की रक्षा से ज़्यादा अहमियत रखने लगा?
आज, प्रतिभाशाली दिमाग, ईमानदार आत्माएं और साहसी दिल जेल में सड़ रहे हैं….न्यायपालिका उनका मज़ाक उड़ा रही है, उन्हें अपमानित कर रही है और उन्हें चुप करा रही है, जिसका काम उनकी रक्षा करना, न्याय देना था, न कि सत्ता की गुलाम बनकर काम करना। इसलिए, हमें खुद से पूछना चाहिए: एक राष्ट्र के रूप में हम कहां गलत हो गए? और उससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि क्या अब पीछे मुड़ने में बहुत देर हो चुकी है?
आपको कुचलने के लिए बनाई गई एक पूरी व्यवस्था के खिलाफ अकेले खड़े होने के लिए अकल्पनीय साहस, लचीलापन और विश्वास की आवश्यकता होती है। दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, ये नायक अपमान, अलगाव और पीड़ा सहते हैं – फिर भी झुकने से इनकार करते हैं! राष्ट्र उनका असीम ऋणी है… और फिर भी, उनके साथ खड़े होने के बजाय, हम उन्हें अकेले लड़ने के लिए छोड़ देते हैं।
आज संजीव की गैरकानूनी कैद के सात साल पूरे हो गए… एक ऐसे व्यक्ति से सात साल छीन लिए गए जिसका एकमात्र “अपराध” सत्ता के सामने सच बोलना था। सात साल जिनमें अन्याय की मशीनरी ने उसकी हिम्मत तोड़ने के लिए अथक प्रयास किया है। सात साल जिनमें बलात्कारी, हत्यारे और लिंचिंग करने वाले आज़ाद घूमते हैं, जबकि एक ज़मीर का आदमी जेल में सड़ रहा है – उसका साहस ही एकमात्र अपराध है जो उसे वहां रखता है।
जैसे-जैसे दिन हफ़्तों में, हफ़्ते महीनों में और महीने सालों में बदलते हैं, न्याय का मज़ाक जारी रहता है। मैं अक्सर सोचती हूं, किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाए? उस अधिनायकवादी राजनीतिक जोड़ी को जो तार खींचती है? उस न्यायपालिका को जो सत्ता की सेवा के लिए अपनी रीढ़ झुका लेती है? या फिर वे मूकदर्शक जो अन्याय के राज में चुपचाप आराम पसंद करते हैं?
हम, एक परिवार के रूप में, न्याय के लिए लड़ते रहे हैं और लड़ते रहेंगे… सवाल यह है कि इस लड़ाई में शामिल होने का साहस आपको कब मिलेगा? आप कब उठेंगे और कहेंगे: बस, बहुत हो गया!!
यह शासन भय पर टिका है। यह कायरता, लालच और चुप्पी पर फलता-फूलता है। लेकिन क्या हमें चुप रहना चाहिए? क्या हमें उन्हें यह मानने देना चाहिए कि हम, भारत के लोग, कायर, दर्शक, आवाज़हीन साये हैं?
अब समय आ गया है कि हम कुछ और साबित करें। अब आवाज़ उठाने का समय आ गया है। उन वीरों के लिए खड़े हों जो अपना सब कुछ कुर्बान कर देते हैं – अपनी आज़ादी, अपने परिवार, अपने भविष्य – फिर भी सिर ऊँचा करके और चेहरों पर मुस्कान लिए चलते हैं!
इस शासन ने अथक प्रयास किया है कि दुनिया इन वीरों को भुला दे, लेकिन हमें ऐसा नहीं करना चाहिए… हम ऐसा नहीं कर सकते!
सात सालों से, संजीव भट्ट अकेले खड़े हैं, चुपचाप, साहसपूर्वक, सत्ता की सबसे काली ताकतों के खिलाफ लड़ते रहे हैं। उन्होंने वह सब सहा है जो हम में से बहुत कम लोग कर सकते हैं, गरिमा और अटूट विश्वास के साथ।
अगर सच की रक्षा करने वालों की रक्षा करने का कभी कोई मौका था, तो वह अब है…
अगर देश की अंतरात्मा को पुनः प्राप्त करने का कभी कोई मौका था, तो वह अब है…
अगर यह साबित करने का कभी कोई मौका था कि भारत में अभी भी ऐसे बहादुर दिल हैं जो अत्याचार के आगे नहीं झुकेंगे – तो वह अब है!
अब समय आ गया है कि हम संजीव भट्ट को दिखाएं कि उन्हें भुलाया नहीं गया है… कि वह अपनी लड़ाई में अकेले नहीं हैं!
न्याय के लिए लड़ने का समय अब है!!”
क्या है पूरा मामला ?
6 जुलाई 1997 को नारन जादव नाम के व्यक्ति ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में भट्ट के खिलाफ शिकायत की थी। नारन यादव 1994 में हथियार बरामदगी मामले के 22 आरोपियों में से एक है। उसने आरोप लगाया कि उसे पुलिस कस्टडी में संजीव भट्ट और कांस्टेबल वजुभाई चौ ने टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (TADA) और आर्म्स एक्ट के मामले में कबूलनामा करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से टॉर्चर किया था।
उसने भट्ट पर आरोप लगाया कि पोरबंदर पुलिस की टीम 5 जुलाई 1997 को ट्रांसफर वारंट पर अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल से जादव को पोरबंदर में भट्ट के घर ले गई थी। जादव को उसके गुप्तांगों और शरीर के अन्य हिस्सों पर बिजली के झटके दिए गए। उसके बेटे को भी बिजली के झटके दिए गए।
जादव ने कोर्ट में टॉर्चर की जानकारी दी, जिसके बाद जांच के आदेश दिए गए। अदालत ने 31 दिसंबर 1998 को मामला दर्ज कर भट्ट और वजुभाई चौ को समन जारी किया। 15 अप्रैल 2013 को कोर्ट ने भट्ट और चौ के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया। चौ की मौत के बाद मामला रफा-दफा कर दिया गया।
(जनचौक की रिपोर्ट ।)