उत्तराखंड: जनसुनवाई की आड़ में जनता की आवाज दबाने का प्रयास

देहरादून। उत्तराखंड में ‘जनसुनवाई’ कार्यक्रम, जिसका उद्देश्य जनता को अपने सुझाव, समस्याएं और चिंताओं को सीधे सरकारी अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने रखने का मंच देना है, आजकल अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण रिस्पना-बिंदाल एलिवेटेड रोड परियोजना है। 

सरकार इस परियोजना को देहरादून में बढ़ते ट्रैफिक की समस्या को हल करने के लिए ला रही है, लेकिन जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं दी जा रही है। बार-बार मांग के बावजूद, सरकार ने न तो प्रोजेक्ट की डीपीआर (Detailed Project Report) और न ही ईआईए (Environmental Impact Assessment) रिपोर्ट साझा की है। कितने लोगों के घरों को अधिकृत किया जाएगा, ये भी स्पष्ट नहीं बताया गया है। ऐसे में नदी के पास बसे लोगों का चिंतित होना लाज़मी है। इसके अलावा क्या ये परियोजना देहरादून शहर के लोगों के लिए फायदेमंद साबित होगी, यह भी कहना मुश्किल ही है।

जो सड़क का नक्शा सामने आया है, उससे तो ऐसा लगता है की सड़क दिल्ली से मसूरी जाने वाली गाड़ियों को देहरादून के ट्रैफिक में ना फ़सना पड़े, उसके लिए बनायी जा रही है। और इस परियोजना से देहरादून शहर में जो कंक्रीट, धूल और टायरों का शोर बढ़ेगा, जो नादियों का विनाश होगा उसको यहाँ की जनता को ही सहना पड़ेगा। 6200 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस बड़ी परियोजना को शुरू करने से पहले, क्या सरकार ने सार्वजनिक परिवहन जैसे अन्य विकल्पों पर विचार किया है? ऐसे में, जनसुनवाई की बैठकों में जनता को अपनी बात रखने का मौका मिलना और भी ज़रूरी हो जाता है, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा।

जनसुनवाई के दौरान हुई हाल की घटनायें इस बात का प्रमाण हैं कि कैसे ये महत्वपूर्ण मंच कुछ नेताओं के व्यक्तिगत एजेंडे और गुंडागर्दी के कारण बेअसर हो रहे हैं।

विधायक की मनमानी: “चुप हो जा!”

जनसुनवाई की बैठकों में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करना और उन्हें बोलने का अवसर देना बेहद ज़रूरी है, लेकिन रायपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक उमेश शर्मा ‘काऊ’ ने इस प्रक्रिया का खुलेआम उल्लंघन किया। रिस्पना पुल के समीप पिछली सुनवाई के दौरान उन्होंने न केवल लोगों को बोलने से रोका, बल्कि उनके साथ अभद्र व्यवहार भी किया। जब एक बस्ती के निवासी ने अपनी बात रखने के लिए हाथ उठाया, तो उन्हें डांटकर “चुप हो जा!” कहा गया और उन्हें अपनी बात कहने का मौका नहीं दिया गया।

यह घटना दिखाती है कि कैसे जनप्रतिनिधि अपने पद का दुरुपयोग कर जनता को धमकाते हैं।

सवाल उठाने पर शक और आरोप

एक अन्य व्यक्ति जब एक सरकारी परियोजना के बारे में अपनी चिंता व्यक्त कर रहे थे, तो विधायक ने उन्हें बीच में ही टोक दिया। उन्होंने उस व्यक्ति पर यह कहकर हमला किया कि वह परियोजना की बुराई क्यों कर रहा है, क्या उसका घर जा रहा है, और क्या वह किसी एनजीओ से जुड़ा हुआ है?

इस तरह के सवाल लोगों को अपनी चिंताओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने से हतोत्साहित करते हैं। यह जनसुनवाई की भावना के विपरीत है, जहां नागरिक बिना किसी डर के अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं। विधायक का यह रवैया सीधे तौर पर जनता की आशंकाओं को खारिज करने और उन्हें चुप कराने का एक तरीका था।

जनता को शांत करने का प्रयास और मनमाना भाषण

जब जनसुनवाई चल रही थी, तब विधायक उमेश शर्मा बिना किसी आमंत्रण के खुद ही खड़े हो गए और भाषण देना शुरू कर दिया। उन्होंने जनता को यह समझाने की कोशिश की कि परियोजना अभी केवल नियोजन चरण में है, और उन्हें बार-बार अपनी चिंताओं को नहीं दोहराना चाहिए। उन्होंने आश्वासन दिया कि जब परियोजना की अंतिम रिपोर्ट आ जाएगी, तो वह अधिकारियों से बात कर जनता के लिए लड़ेंगे। शायद वो ये समझाना चाह रहे थे की आप लोगों को अपनी राय रखने की जरूरत नहीं है, मैं सब देख लूँगा। वाह मंत्री जी, आपके रहते तो इस देश को संविधान की भी जरूरत नहीं पड़ेगी शायद।

विधायक ने इस भाषण के साथ ही बैठक को समाप्त कर दिया, जबकि जनसुनवाई का संचालन देहरादून के जिला मजिस्ट्रेट (DM) सदर कर रहे थे। SDM ने भी उन्हें नहीं रोका और उनके भाषण के बाद जनसुनवाई को समाप्त कर दिया।

यह कार्रवाई जनसुनवाई के नियमों के खिलाफ है, क्योंकि यह एक निर्धारित प्रक्रिया है जहाँ अधिकारी नागरिकों की शिकायतों को सुनते हैं, न कि किसी नेता के भाषण को। विधायक ने इस मंच का उपयोग लोगों को चुप कराने और अपनी बात थोपने के लिए किया, जिससे पूरी प्रक्रिया का मज़ाक बन गया।

अगली सुनवाई में गुंडागर्दी और हाथापाई

अगले दिन, कांवली रोड के पास की जनसुनवाई में तो हद ही हो गई। वहां मौजूद पार्षदों और विधायक के गुंडों ने पूरी जनसुनवाई को ही हाईजैक कर लिया। लोगों को अपनी आशंकाएं व्यक्त करने पर उनसे उलटे सवाल पूछे गए। जब उन्होंने जवाब देने का आग्रह किया, तो उनके साथ धक्का-मुक्की की गई। एक महिला पार्षद को जब यह बात नागवार गुजरी कि उनकी वीडियो रिकॉर्ड की जा रही है, तो उन्होंने उस व्यक्ति के फोन पर ही झपट्टा मार दिया। संयोग से मोबाइल तो बच गया, पर उस व्यक्ति का चश्मा नीचे गिरकर टूट गया।

भरी सभा में इस तरह की गुंडागर्दी और मनमानी इस बात का प्रमाण है कि देहरादून में जनसुनवाई की प्रक्रिया जनता की आवाज़ को सुनने का नहीं, बल्कि कुछ राजनेताओं को अपनी राजनीतिक भाषण देने का मंच बनकर रह गई है। यह हमारे देश के लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है और बेहद हानिकारक है।

व्यवस्था पर सवाल

ये घटनायें न केवल कुछ नेताओं की मनमानी को उजागर करती हैं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर भी सवाल उठाती हैं। जब राज्य के नेता ही जनसुनवाई के नियमों का पालन नहीं करते, तो जनता की आवाज़ सुनी जाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सबसे चिंताजनक बात यह है कि वहां मौजूद सरकारी अधिकारी, जिनकी जिम्मेदारी इन सुनवाई को ठीक ढंग से संचालित करने की है, उन्होंने भी विधायकों को नहीं रोका। इससे यह संदेश जाता है कि नेता नियमों से ऊपर हैं और आम जनता की आवाज का कोई महत्व नहीं है।

जब तक इस तरह की घटनाओं पर रोक नहीं लगाई जाती, तब तक जनसुनवाई जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएंगे। जनता को अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना प्रशासन और जन प्रतिनिधियों दोनों की जिम्मेदारी है।

(प्रेस विज्ञप्ति पर आधारित।)

Leave a Reply