शोध में संकट: NFOBC फेलोशिप सूची में देरी ने हाशिए के शोधार्थियों को अनिश्चितता में डाला

2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से भारत के शिक्षा क्षेत्र में कई बड़े बदलाव हुए हैं। इनमें से कई बदलाव विचारधारात्मक रहे हैं, जिसके बाद से विश्वविद्यालयों को अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सोच को आगे बढ़ाने का केंद्र बना दिया गया है। कई अहम शैक्षणिक नियुक्तियाँ और बदलाव इसी विचारधारा के अनुसार किए गए हैं।

इसी के साथ दो बड़ी बातें—कॉरपोरेटीकरण और भगवाकरण—ने उच्च शिक्षा की हालत खराब कर दी है। नई शिक्षा नीति (NEP) 2020, जिसे सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार बताया था, असल में यह खुलेरूप में निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। सरकार कहती है कि उसने शिक्षा में निवेश बढ़ाया है और भारतीय विश्वविद्यालयों को दुनिया में शीर्ष स्तर पर लाना चाहती है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है।

आज कई बड़े केंद्रीय विश्वविद्यालय गंभीर आर्थिक संकट में हैं। सरकार से उन्हें पर्याप्त अनुदान नहीं मिल रहा है, उल्टा वे खुद ही पैसे जुटाने को मजबूर हैं—अक्सर छात्रों की फीस बढ़ाकर हायर एजुकेशन फाइनेंसिंग एजेंसी (HEFA) जैसी संस्थाएं बनाई गई हैं जो विश्वविद्यालयों को कर्ज देती हैं, जबकि उन्हें जरूरत अनुसार अनुदान मिलना चाहिए था।

नई शिक्षा नीति (2020) के अनुसार अब सरकार देश की GDP का 6% शिक्षा पर खर्च करेगी। मोदी सरकार इसे एक ऐतिहासिक कदम बताती है, लेकिन सच्चाई है कि शिक्षा पर 6 प्रतिशत व्यय की अनुशंसा सन् 1964 में ही कोठारी आयोग ने कर दी थी जबकि उस समय छात्रों की संख्या बहुत सीमित थी। आज जब इतनी संख्या में स्टूडेंट्स उच्च शिक्षा में आ रहे तब भी क्या सिर्फ 6 प्रतिशत काफी है? हालांकि वास्तविकता इसके ठीक उलट है, मोदी सरकार नई शिक्षा नीति का डंका पीटने के बाद अभी भी अपनी GDP का 3% से भी कम शिक्षा पर खर्च कर रही है।

उच्च शिक्षा में फंड कटौती के बुरे परिणाम आ रहे हैं। इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हाशिए से आने वाले शोध छात्र हुए हैं। एक बेहतर समाज के लिए ज्ञान ज़रूरी है, और ज्ञान तभी पैदा होता है जब शोध को पूरा सहयोग मिले। लेकिन आज भारत में कई शोधार्थी अपनी पढ़ाई और रिसर्च बिना सरकार या विश्वविद्यालय से कोई सहायता के खुद के पैसे से कर रहे हैं। उन्हें किताबें, उपकरण, फील्डवर्क, सेमिनार और अपनी बुनियादी ज़रूरतें खुद ही पूरी करनी पड़ रही है। इस कटौती का ताज़ा उदाहरण है – नेशनल फेलोशिप फॉर अदर बैकवर्ड कास्ट।

नेशनल फेलोशिप फॉर अदर बैकवर्ड कास्ट (NFOBC) फेलोशिप मोदी सरकार द्वारा साल 2014-15 में शुरू की गई थी। यह फेलोशिप उन 1,000 छात्रों को मिलती है जो UGC NET या CSIR NET में जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) से बहुत ही कम नंबरों से चूक जाते हैं।

लेकिन जून 2024 से UGC ने NFOBC की सूची जारी नहीं की है। जून 2024, दिसंबर 2024 और जून 2025- तीन बार NET परीक्षा हो चुकी है, पर फेलोशिप की सूची नहीं आई। स्टूडेंट्स JRF पाने की कोशिश में बार बार NET परीक्षा दे रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि उन्हें JRF मिल जाए, जबकि वे पहले ही NFOBC के लिए योग्य हैं।

सरकार की चुप्पी से स्टूडेंट्स बेहद निराश, आर्थिक रूप से परेशान और मानसिक रूप से तनाव में हैं। फेलोशिप न मिलने के कारण उन्हें घर के पैसे से पढ़ाई करनी पड़ रही है- जिससे उनके रिसर्च की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।

NFOBC योजना सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत आती है, फिलहाल यह मंत्रालय डॉ. वीरेंद्र कुमार खटीक के पास है। स्टूडेंट्स ने उन्हें कई बार ईमेल और सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क किया, आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी और डेलिगेशन के माध्यम से डॉ. खटीक से मुलाकात भी की लेकिन अब तक सकारात्मक परिणाम नहीं मिला है।

24 जुलाई, 2025 को, दिल्ली विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, इग्नू और बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के शोध छात्रों ने डॉ. खटीक से मुलाकात की। अगले दिन उन्होंने गजेंद्र सिंह शेखावत से भी बात की।

सुभी यादव, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की शोधार्थी, भी उस डेलीगेशन में शामिल थी। वह बताती है कि “हम अप्रैल 2025 से लगातार मांग कर रहे हैं कि NFOBC की सूची जारी हो। हमने हर तरीका अपनाया- सोशल मीडिया, ईमेल, RTI, मंत्रियों से मिलना- लेकिन कोई असर नहीं हुआ। हमें लग रहा है कि सरकार ने हमें छोड़ दिया है। लेकिन हम हार नहीं मानेंगे। हम अपने हक के लिए लड़ते रहेंगे।”

इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि 29 अगस्त, 2025 को प्रधानमंत्री शिकायत पोर्टल पर एक शोधार्थी के शिकायत के जवाब में कहा गया कि सरकार के पास फंड नहीं है, इसलिए सूची नहीं आई। लगातार कोशिश करने के बाद अब इस जवाब से स्टूडेंट्स और ज़्यादा नाराज़ हो गए।

कॉरपोरेट्स के लिए पैसा है, छात्रों के लिए नहीं?

स्टूडेंट्स का कहना है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार मोदी सरकार ने 2014 से 2024 के बीच कॉरपोरेट घरानों के ₹16.35 लाख करोड़ के कर्ज माफ किए हैं। एक तरफ सरकार फंड की कमी बताती है वहीं जनता के टैक्स के पैसों से कॉरपोरेट घरानों को अनगिनत फायदे पहुंचाती है, इन सब के बीच मोदी सरकार द्वारा प्रचारित फंड की कमी की बात सरासर झूठी लगती है। यह मोदी सरकार के स्टूडेंट विरोधी नीतियों को खुलकर दिखाता है।

शोधार्थियों में यह डर है कि जिस तरह से दिसंबर 2022 में अल्पसंख्यक छात्रों को मिलने वाली फेलोशिप मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय फेलोशिप (MANF) को बंद कर दिया गया था,अब मोदी सरकार फंड की कमी का बहाना मारकर NFOBC फेलोशिप को भी बंद कर सकती है।

स्टूडेंट्स की कोशिशें जारी हैं – 3 सितंबर 2025 को, शोधार्थियों ने सोशल मीडिया X (पहले Twitter) पर एक अभियान शुरू किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार को टैग किया। उन्होंने अपनी तकलीफ साझा की, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

NFOBC फेलोशिप का इंतज़ार कर रही लखनऊ विश्वविद्यालय की शोधार्थी अंकिता सिंह कहती हैं कि: “मोदी सरकार का छात्रों के प्रति रवैया बहुत दुखद है। हमने हर कोशिश की, लेकिन हमें बस यही सुनने को मिलता है कि NTA ने लिस्ट भेज दी है, और मंत्रालय में रुकी है। ये मानसिक उत्पीड़न जैसा लगता है।”

उन्होंने बताया कि उन्होंने स्थानीय नेताओं से भी मदद मांगी: “हमने उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री आशीष पटेल से मिलने की कोशिश की। बहुत कोशिश के बाद 22 जुलाई को उनसे मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि वो इस मुद्दे को उठाएंगे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अनुप्रिया पटेल, मिर्जापुर की सांसद, ने भी मंत्री को चिट्ठी लिखी, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।”

अतुल यादव, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधार्थी कहते हैं कि: “पिछले डेढ़ साल से हम NFOBC सूची का इंतज़ार कर रहे हैं। जून 2024 में मैं JRF से सिर्फ 2 अंक से चूक गया था। मुझे भरोसा था कि NFOBC के तहत मेरा नाम आएगा, लेकिन दिसंबर 2023 के बाद से कोई सूची नहीं आई। सरकार की ओर से कोई आर्थिक मदद नहीं मिल रही, और रिसर्च के लिए किताबें, उपकरण और सेमिनार में शामिल होना बहुत मुश्किल हो गया है। मानसिक और आर्थिक दोनों तरह की परेशानी हो रही है।”

इन सब के बीच यह कहना सटीक है कि NFOBC सूची में देरी के कारण हज़ारों शोधार्थी अनिश्चितता में जी रहे हैं। इनमें से कई पहली पीढ़ी के पढ़ने वाले छात्र हैं, जिन्होंने संघर्ष करके उच्च शिक्षा तक पहुंच बनाई। लेकिन अब सरकारी लापरवाही के कारण उनकी उम्मीदें टूट रही हैं।

(आकांक्षा आजाद भगत सिंह छात्र मोर्चा की एक्टिविस्ट हैं।)

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