सुमित अवस्थी जैसे तमाम ऐसे लोग हैं जो खुलेआम कह रहे हैं कि वे गोदी मीडिया का हिस्सा रहे हैं। उन्हें अब महसूस हो रहा है कि वे छले गए हैं। अन्ना हजारे का आंदोलन एक छलावा था, उनकी समझ में अब आ रहा है। दरअसल वह फासिस्ट ताकतों का केंद्रीय सत्ता के अपहरण का पहला चरण था।
उसके बाद पूरे देश की सत्ता पर कब्जा करने का दूसरा चरण शुरू किया गया। जिससे सम्बंधित बहुचर्चित वोट चोरी का राहुल गाँधी द्वारा किया गया रहस्योद्घाटन उस आइसबर्ग की सिर्फ चोटी भर है जो सतह से नीचे बहुत गहराई तक विस्तृत है और यह आरएसएस-बीजेपी के नाज़ी षड्यंत्रकारी डीएनए का प्रतिफल है।
इस षड्यंत्र की शुरुआत दिसंबर, 2023 में संसद के शीतकालीन सत्र से पहले हो चुकी थी। जिसके अनुसार कर्नाटक से भाजपा सांसद प्रताप सिम्हा से लोकसभा की दर्शक दीर्घा में जाने और 13 दिसंबर, 2023 को संसद में धुआँ फैलाने के लिए दो युवकों को विजिटर पास जारी करवाए गए थे।
योजनानुसार वे दोनों युवक दर्शक दीर्घा से लोकसभा चैंबर में कूदे और वहाँ पीला धुआँ छोड़ दिया जिससे स्वाभाविक रूप से अफ़रा-तफ़री फैली। इन्हीं के कुछ साथी संसद भवन परिसर में नारेबाजी करते हुए पकड़े गए।
इस मामले पर संसद परिसर में हुई सुरक्षा चूक को लेकर विपक्षी दलों द्वारा गृहमंत्री के बयान की माँग करते हुए जोरदार हंगामा और नारेबाजी की उम्मीद स्वाभाविक रूप से अपेक्षित थी। उन्होंने इससे भी आगे बढ़कर सदन में तख्तियाँ लहराईं और वेल में आकर भारी विरोध दर्ज कराया।
पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार संसद की कार्यवाही बाधित करने के बहाने लोकसभा और राज्यसभा के कुल 141 सांसद (अधिकांश विपक्षी) संसद के शीतकालीन सत्र से निलंबित कर दिए गए।
अब चूँकि विपक्ष को पूरी तरह सदन से बाहर करके ठीक अवसर पैदा कर लिया गया तो उसी अवधि, 20-21 दिसंबर, 2023 में चुनाव आयुक्तों को उनके कर्तव्यों के लिए पूर्ण न्यायिक सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून—’मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023′ लोकसभा और राज्यसभा से फटाफट पारित करवा लिया गया।
इस नये कानूनी प्रावधान में चुनाव आयुक्तों को उनके किसी भी कार्य, निर्णय या कथन के लिए न्यायालय में चुनौती से पूरी सुरक्षा दी गई है। इस कानून की धारा 16 स्पष्ट रूप से कहती है—”कोई भी व्यक्ति, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त या अन्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर कार्यरत है या कभी रहा है, उसके द्वारा अपने पद के कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए किसी भी कार्य, कथन या निर्णय के सम्बंध में किसी भी न्यायालय में कोई दीवानी या आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।”
इस नए कानूनी प्रावधान से चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए पूरी न्यायिक प्रतिरक्षा प्रदान कर दी गई। उनके पद-सम्बंधी निर्णयों, कर्तव्य के निर्वहन व कार्यों के विरुद्ध कोई न्यायिक चुनौती, मुकदमा या आपराधिक कार्रवाई संभव नहीं है। यानी उन्हें मनमानी करने की पूरी छूट दे दी गई।
उन्हें उनके पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह केवल संसद द्वारा ही संभव है, लेकिन उनके निर्णयों या कार्यों के लिए न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
यह प्रावधान चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति से भी अधिक असाधारण संरक्षण और पूरी न्यायिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसके जरिए उनकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता को कानूनी रूप से अभेद्य बना दिया गया।
इतना सब करने के बाद केंद्रीय सत्ता के अपहरण वाले षड्यंत्र का तीसरा चरण शुरू हुआ लोकसभा चुनाव 2024 में। जिसका खुलासा राहुल गाँधी अब करते जा रहे हैं।
इसी षड्यंत्र का चौथा और अंतिम चरण है—मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कार्यक्रम, जिसका आरंभ 25 जून, 2025 को बिहार में कर दिया गया है। जिसे बाद में पूरे देश में किया जाना है।
यानी राज्यों सहित सत्ता पर देसी फ़ासिस्टों का एब्सोल्यूट कब्जा। वैसे भी भाजपा फिलवक्त 14 राज्यों में जनाधारविहीन अपने खड़ाऊं मुख्यमंत्रियों के माध्यम से तथा 7 राज्यों में सहयोगी दलों के साथ मिलकर सत्ता सँभाले हुए है।
अब जरा याद कीजिए—”कांग्रेस अगले पचास साल तक सत्ता में नहीं आ सकती” और “अब हमें संघ की जरूरत नहीं है” जैसी आत्मविश्वास से भरी बातें। ऐसी गर्वोन्मत्त घोषणाएँ किस बल पर की जा रही थीं, अब इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
