इस बार बिहार का असली किंगमेकर वोटर कौन होगा? वैसे तो सियासी दलों के लिए सच यही है कि चाहे जो भी फार्मूला अपनाया गया हो, जीत हो गई, सत्ता मिल गई तो वही सत्य है। वही चाणक्य नीति है, वही सफलता की कुंजी है। लेकिन यह खेल हमेशा सफल नहीं होता। बिहार जैसे सूबे में तो और भी नहीं।
बिहार का सच यही है कि यहाँ के लोग बातें तो हर मुद्दों पर करते हैं लेकिन जातीय समीकरण, जान पहचान, पैसे की आमदनी पार्टी के प्रति लगाव पर ही दांव लगाने में यकीन करते हैं। चूंकि बिहार में धार्मिक खेल बहुत ज्यादा किसी भी वर्ग को आकर्षित नहीं करता इसलिए यहाँ ध्रुवीकरण का खेल ज्यादा सफल नहीं हो पाता। बीजेपी का प्रयास धार्मिक ध्रुवीकरण पर होता है और वह करती भी दिखती है लेकिन बिहारी समाज को यह ध्रुवीकरण ज्यादा रास नहीं आता।
बिहार के चुनावी परिणामों को गौर से देखें तो दो बातें समझ में आती हैं। पहली बात तो यह है कि बिहार के पहली बार के नए मतदाता किधर जाते हैं? और दूसरी बात यह है कि स्विंग वोटर के नाम से मशहूर बिहार की अति पिछड़ी जातियां क्या रुख अपनाती हैं? ये दो ऐसे वोट बैंक हैं जो बिहार के चुनावी परिणाम पर काफी हद तक असर डालते हैं और पिछले कुछ चुनाव के परिणाम इन्हीं वोट बैंकों के जरिए सत्ता तक पहुँचने का कारक बनती रही हैं।
बिहार का माहौल अभी जिस तरह का बना हुआ है जहाँ बेरोजगारी और पलायन की बातें सबकी जुबान पर हैं ऐसे में नए वोटरों का खेल कुछ ज्यादा ही अहम हो जाता है। और इस खेल में अगर युवाओं के साथ अति पिछड़ी जातियों का वोट बैंक एक साथ जुड़ जाए तो उसी के साथ सत्ता की कुर्सी भी मिल जाती है। संभव है कि इस बार भी कुछ ऐसा ही हो।
बिहार में इस बार 14 लाख से ज्यादा नए युवा वोटर पहली बार मतदान करने को तैयार हैं। बिहार विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम की घोषणा करते हुए पिछले दिनों चुनाव आयोग ने कहा कि राज्य में 18 से 19 साल की उम्र के 14.01 लाख पहली बार वोट देने वाले मतदाता हैं। हालांकि पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं की संख्या 2020 में 11.17 लाख थी जबकि 2015 में यही संख्या 24.13 लाख थी।
जाहिर है नए वोटरों की संख्या 2020 से ज्यादा और 2015 से कम है लेकिन इसकी अहमियत आज काफी बढ़ गई है। 14 लाख से ज्यादा ये सब वही वोटर हैं जो या तो 12 वीं की पढ़ाई पूरा कर चुके हैं या फिर स्नातक में पढ़ रहे हैं या फिर नौकरी की तलाश में मैदान में उतर रहे हैं। सूबे के ये नए वोटर लगातार कई सालों से यह देख रहे हैं कि बिहार में नौकरियों की कितनी तंगी है और नौकरी पाने के लिए युवा क्या क्या कर रहे हैं। युवाओं के साथ सरकारी रवैया भी क्या है यह भी बिहारी युवा देख रहे हैं।
अब सवाल है कि बिहार के नए पहली बार के 14 लाख से ज्यादा वोटर क्या कुछ कर सकते हैं? अगर इन वोटरों को बिहार की 243 विधानसभा सीटों के हिसाब से देखा जाए तो औसतन हर सीट पर करीब 5,700 से ज्यादा मतदाता चुनाव का फ़ैसला कर सकते हैं? पिछले कई चुनावों से देखा जा रहा है कि जिस तरह से चुनाव प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है और जीत का अंतर लगातार कम होता जा रहा है ऐसे में ये नए पहली बार के वोटर अहम भूमिका निभा सकते हैं।
2020 के विधानसभा चुनावों में, 56 सीटें जो बिहार के सभी निर्वाचन क्षेत्रों का 23% के बराबर है, ऐसी थीं जहाँ पहली बार मतदान करने वालों की वर्तमान औसत संख्या (5,765) जीत के अंतर से अधिक थी। 2020 में, राज्य भर में जीत का औसत अंतर 16,825 वोट था। 2015 के चुनावों की इसी तुलना से पता चलता है कि 41 ऐसी सीटें थीं जहाँ जीत का अंतर इस साल पहली बार मतदान करने वालों की संख्या से कम था।
2015 के विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि 73 सीटें ऐसी थीं जहाँ उस समय पहली बार मतदान करने वालों की औसत संख्या जीत के अंतर से अधिक थी। उदाहरण के लिए, तरारी में, भाकपा (माले) (लि) के उम्मीदवार ने लोजपा के दूसरे स्थान के उम्मीदवार को 272 वोटों के मामूली अंतर से हराया, जो पहली बार मतदान करने वाले 9,930 औसत मतदाताओं से काफी कम है। ऐसी 73 सीटों में से, भाजपा ने 30 सीटें जीतीं, उसके बाद जदयू ने 16, राजद ने 13, कांग्रेस ने नौ और अन्य दलों ने शेष पाँच सीटें जीतीं।
इसी तरह 2020 के विधानसभा चुनाव में, 49 सीटें ऐसी थीं जहां उस वर्ष पहली बार मतदान करने वालों की औसत संख्या जीत के अंतर से अधिक थी। जदयू और राजद ने 13-13 सीटें जीतीं, उसके बाद कांग्रेस ने नौ, भाजपा ने आठ और अन्य दलों ने छह सीटें जीतीं।
2015 में, जीत का औसत अंतर 18,108 वोट था, जो उस वर्ष प्रत्येक सीट पर पहली बार मतदान करने वाले औसत मतदाताओं से लगभग दो गुना था। 2020 तक, जीत का औसत अंतर घटकर 16,825 हो गया, लेकिन यह आँकड़ा उस वर्ष प्रति सीट पहली बार मतदान करने वाले औसत मतदाताओं (4,597) से लगभग चार गुना अधिक था। ऐसे में एक बात तो साफ़ है कि पहली बार के नए मतदाता जिधर जायेंगे खेल होता जाएगा।
बिहार में अभी इन युवाओं को लेकर कोई नया सर्वे तो नहीं आया है लेकिन जॉब और देश की समस्या को लेकर बिहार के युवा राजद और कांग्रेस की तरफ कुछ ज्यादा ही झुकते दिख रहे हैं। अधिकतर युवा यह राय बता रहे हैं कि भले ही युवाओं की बात सभी पार्टियां कर रही हैं और नौकरी की बात मौजूदा सरकार भी करती दिख रही है लेकिन वे यह भी कहते हैं कि अब सत्ता परिवर्तन भी जरूरी है और एक बार महागठबंधन पर दांव लगाने में क्या जाता है?
युवाओं की पसंद की पार्टी जन सुराज भी है लेकिन पटना के युवाओं को यह कहते सुना जा रहा है कि भले ही प्रशांत किशोर कुछ अलग बड़ा काम बिहार के लिए करना चाहते हैं लेकिन उनके लिए अभी काफी समय है। अगर इस बार महागठबंधन चूक जाता है तो बिहारी युवा पीके को भी मौका देने से नहीं चूकेगा। लेकिन बिहारी युवा यह ज़रूर कहते कहीं कि हमें रोजगार चाहिए, धार्मिक उन्माद नहीं। समाज में कोई दुश्मनी नहीं।
अब अति पिछड़े वोट बैंक की बात। बिहार में अति पिछड़े समाज की आबादी करीब 36 फीसदी है। यानी यह बिहार का सबसे बड़ा वोट बैंक है। जब से नीतीश की राजनीति बिहार में स्थापित हुई, उन्होंने पिछड़े समाज यानी ओबीसी की बजाय अति पिछड़ा वर्ग को ज्यादा आगे बढ़ाने का काम किया। उसके कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाईं और उसका राजनीतिक लाभ भी उठाते रहे। नीतीश का यह खेल ठीक महादलित बनाने जैसा ही था।
जहाँ तक अति पिछड़ी जातियों की कहानी है, इसमें दर्जनों जातियां हैं। बहुत ही छोटी -छोटी आबादी वाली जातियां। ये जातियां बिखरी हुई हैं और इनका कोई नेता भी नहीं है। फिर इनमें से कोई छोटी जाति का नेता कुछ कर भी नहीं सकता। इसी सोच के तहत नीतीश कुमार ने अति पिछड़ी जातियों को अलग किया और स्वाभाविक रूप से जदयू और उसकी सहयोगी बीजेपी को इन जातियों के वोट बैंक का लाभ मिलता रहा।
चूंकि ये जातियां स्विंग वोटर कहलाती हैं इसलिए इन जातियों का वोट जिधर भी टर्न करता है, सत्ता की कुर्सी उसके पास पहुँच जाती है। एनडीए को अभी तक इसका बड़ा लाभ मिलता रहा है। नीतीश जब-जब बीजेपी से अलग होकर राजद और महागठबंधन के साथ गए हैं अति पिछड़ी जातियों के वोट भी उसी गठबंधन को मिले हैं और जीत पक्की होती गई है। ऐसे में बिहार की ये अति पिछड़ी जातियां किंग मेकर की भूमिका में रही हैं और इस बार भी यही जातियां बड़ा कमाल दिखा सकती है।
“किंगमेकर” वे समुदाय हैं जो भले ही स्वयं बहुमत न जीत पाएँ, लेकिन फिर भी किसी न किसी गठबंधन के पक्ष में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। उनका समर्थन काँटे के मुकाबलों में, जहाँ किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, संतुलन बिगाड़ सकता है। ऐसी स्थितियों में, उनके वोट या समर्थन अक्सर यह तय करते हैं कि कौन सी पार्टी या गठबंधन सरकार बना पाएगा।
2022 में हुई नवीनतम जाति जनगणना में पाया गया कि बिहार की आबादी में लगभग 36% अति पिछड़े वर्ग हैं, जिनमें से 10% मुस्लिम आबादी अति पिछड़े वर्ग के रूप में पहचानी जाती है। इसके बाद हिंदू अति पिछड़े वर्ग बचे, जो शेष 26% के लिए ज़िम्मेदार थे, और यही बिहार में सबसे बड़ा मतदाता वर्ग है।
1978 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, जो स्वयं अति पिछड़ा वर्ग समुदाय से थे, ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 26% आरक्षण की घोषणा की।इस प्रणाली के तहत, 12% नौकरियां अति पिछड़े वर्गों (जिन्हें बाद में अति पिछड़ा वर्ग कहा गया) के लिए, 8% अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए, 3% महिलाओं के लिए और 3% आर्थिक रूप से कमज़ोर उच्च-जाति समूहों के लिए आरक्षित थीं। ये कोटे मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट पर आधारित थे, जिसने बिहार में 128 पिछड़े समुदायों की पहचान की थी, जिनमें से 94 को “अति पिछड़ा” के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
1990 के दशक में, राजद सरकार ने अति पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण बढ़ाया। लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में यह लगभग 14% तक पहुँच गया, और राबड़ी देवी के कार्यकाल में यह लगभग 18% तक पहुँच गया। 2006 में, नीतीश कुमार की सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं में अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के लिए 20% सीटें आरक्षित कीं – एक राजनीतिक कदम जिसकी कई लोगों ने सराहना की। बाद में, इन आरक्षणों को नगर निकायों और कई कल्याणकारी योजनाओं तक बढ़ा दिया गया।
2023 में, अल्पकालिक जदयू-राजद गठबंधन के दौरान, बिहार विधानसभा ने जाति सर्वेक्षण के बाद अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों और अति पिछड़ा वर्गों के लिए कुल आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 65% करने वाले विधेयक पारित किए। विशेष रूप से अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) का कोटा 25% तक बढ़ा दिया गया। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए मौजूदा 10% आरक्षण के साथ, इससे सरकारी नौकरियों और शिक्षा में कुल आरक्षण 75% हो जाता।
हालाँकि, जून, 2024 में, पटना उच्च न्यायालय ने इन वृद्धियों को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया। अदालत ने तर्क दिया कि केवल जनसंख्या के आंकड़ों का उपयोग करना 1992 के इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 50% की सीमा से आगे जाने के लिए पर्याप्त नहीं था।
इसमें कोई दो राय नहीं कि आज भी अति पिछड़ी जातियां नीतीश और बीजेपी के साथ खड़ी हैं लेकिन पिछले साल से इस समाज में भी बहुत कुछ बदलता दिख रहा है। और बहुत संभव है कि इस बार के चुनाव में अति पिछड़ा समाज पूरी तरह से पलट कर महागठबंधन के साथ न खड़ा हो जाए। जिस तरह से राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव अति पिछड़ों के लिए काम करते दिख रहे हैं और पिछले दिनों पटना में कुछ वादा भी कर आये हैं इससे एनडीए की मुश्किलें बढ़ी हैं। ऐसे में अति पिछड़ा अगर पलटी मार गया तो खेल कुछ और भी हो सकता है और इस समाज ने खेल किया तो बिहार की सियासत नए तरीके की दिखेगी।
महागठबंधन ने सितंबर में अति पिछड़ा न्याय संकल्प नामक एक 10-सूत्रीय योजना जारी की थी, जिसमें ईबीसी समुदायों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से कई उपायों का वादा किया गया है। सितंबर में पटना में आयोजित कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक इसी संदेश को प्रसारित करने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार की गई थी। यह बैठक ऐतिहासिक सदाकत आश्रम में आयोजित की गई थी, जिसमें पार्टी द्वारा बिहार की जड़ों से फिर से जुड़ने के प्रयास को रेखांकित किया गया था।
अगर इस बार अति पिछड़ी जातियां और नए युवा वोटर संभावनाओं का खेल तलाशते हैं तो बिहार की राजनीति बदल सकती है और ऐसा होता है तो निजाम को बदलते देर नहीं लगेगी।
(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)