“हम देखेंगे” ने स्वतंत्र फिलिस्तीन के लिए वैश्विक नागरिक आंदोलन तेज़ करने का आह्वान किया

(फिलिस्तीन मुक्ति के सवाल पर लेखकों और संस्कृतिकर्मियों के संगठनों के साझा मंच “हम देखेंगे” ने एक बयान जारी कर स्वतंत्र फिलिस्तीन के लिए वैश्विक नागरिक आंदोलन तेज़ करने का आह्वान किया है जो यहाँ प्रस्तुत है – संपादक)

हम भारतीय लेखक-कलाकार गज़ा में दो सालों से अनवरत जारी जनसंहार पर लगी रोक का स्वागत करते हैं।

हम जानते हैं कि गज़ा की हमास सरकार के साथ हुई डील पर आधारित इस तथाकथित ‘युद्ध – विराम’ का लगातार उल्लंघन किया जा रहा है। यह उल्लंघन कब्ज़ाकारी इज़रायली सेना द्वारा  किया जा रहा है।

हम यह भी जानते हैं कि पिछली बार की तरह इस बार भी इजरायल कोई न कोई बहाना बनाकर एक तरफ़ा ढंग से इसे समाप्त कर सकता है।

पहले भी युद्ध विराम के उल्लंघन को  रोकने में अमेरिका की असमर्थता और अनिच्छा को हम देख चुके हैं। 

हम देख रहे हैं कि इस डील के आधार पर नोबेल शांति पुरस्कार के लिए अपनी दावेदारी जताने वाले राष्ट्रपति ट्रंप खुद अपने देश में व्यापक “नो किंग्स प्रोटेस्ट” का सामना कर रहे हैं। 

गज़ा को फिलिस्तीनियों से खाली कराकर उसे एक अंतर्राष्ट्रीय रिवेरिया में बदलने के उनके सपने को भी हम जानते हैं। 

ऐसे में यह विराम क्षणभंगुर हो सकता है। 

फिर भी ऐसी कई बड़ी बातें हैं जिनके चलते हम इस विराम में उम्मीद की एक किरण देख पा रहे हैं। 

हम  बतौर लेखक-कलाकार समूची मानवता की अन्तश्चेतना की आवाज के रूप में अपनी  जिम्मेदारी को भी समझ पा रहे हैं।

पहली बात यह है कि युद्ध विराम की यह डील अमरीकी भलमनसाहत के कारण नहीं, बल्कि दुनिया भर में जनसंहार के खिलाफ उठ खड़े हुए विस्फोटक जनाक्रोश और “दो राज्य समाधान” के पक्ष में बने निर्णायक जनमत के दबाव में संभव हुई है।

हमने दुनिया के तमाम देशों में इन दो मांगों के लिए अभूतपूर्ण जन प्रदर्शन देखे और उनके दबाव में पश्चिमी सरकारों को फिलिस्तीन राज्य को मान्यता देने को मजबूर होते देखा। 

अब तक विश्वजनमत की उपेक्षा करते आए ट्रंप को इस अभूतपूर्व नागरिक आक्रोश के सामने झुकना पड़ा और वह नेतन्याहू  को यह संदेश देने के लिए विवश हुए कि वह सारी दुनिया से लड़कर जीतने की उम्मीद नहीं कर सकता। 

स्पष्ट है कि यह युद्ध विराम इसी वैश्विक नागरिक विप्लव का परिणाम है।  इसकी उपेक्षा करने पर विश्व राजनीति में  अमेरिका की भूमिका की  गंभीर क्षति  हो सकती है।

दूसरी बात यह है कि इन दो  वर्षों में फिलिस्तीन की आवाम ने कष्ट सहने, कुर्बानियां देने और लगातार संघर्ष करने की अपनी अजेय क्षमता को स्थापित कर दिया है।

 उन्होंने न केवल अपनी राजनीतिक और सामाजिक एकजुटता बनाए रखी, बल्कि  गज़ा के भीतर सशस्त्र माफिया को प्रोत्साहन देने की इजरायली नीति को भी विफल कर दिया।

आम जनता की एकता और समर्थन के बिना कोई भी सरकार ऐसे विषम युद्ध में शत्रु को पीछे हटने के लिए विवश नहीं कर सकती थी। 

दो वर्षों के संघर्ष से यह स्पष्ट हो गया है कि आज समूची दुनिया फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय और स्वतंत्रता के अधिकार को न केवल स्वीकार करती है बल्कि उसे संभव करने के लिए प्रतिबद्ध हो चुकी है। 

आज की यह स्थिति अक्टूबर 2023 की उस परिस्थिति से बहुत अलग है जबकि दो राज्य समाधान को लगभग हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाला जा चुका था । फिलिस्तीन के आधिपत्य, गज़ा की घेरेबंदी और फिलिस्तीन अवाम की निपट असहायता को मध्यपूर्व  की ‘सामान्य परिस्थिति’ के रूप में स्थापित किया जा चुका था।

हम समझते हैं कि यह विश्व नागरिकता की एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस उपलब्धि को बनाए रखने में दुनिया भर के लेखकों और कलाकारों की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। 

स्वतंत्र फिलीस्तीन के पक्ष में वैश्विक जन भावना को मजबूत बनाने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हम लेखकों कलाकारों के ऊपर है। 

अगर हम इस कार्य में विफल रहते हैं तो साम्राज्यवादी, फासीवादी और जियनवादी शक्तियों को दुनिया को एक अभूतपूर्व अंधेरे दौर में ढकेलने से नहीं रोका जा सकेगा।

-जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, जनवादी लेखक संघ, प्रतिरोध का सिनेमा, इप्टा, अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच और स्त्री दर्पण

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