इस बार जब पूरा देश, खासकर उत्तर भारत और उसमें भी दिल्ली दीपावली के उत्सव को उन्माद में बदल देने पर तुला हुआ था, हिंदी साहित्य की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात विद्वान फ्रांचेस्का ओर्सीनी को दिल्ली के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया।
यह घटना 20 अक्टूबर की है। उनके पास भारत के लिए पांच साल के लिए मान्य वीसा था। लेकिन, अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार उन्हें इस वीसा की शर्तों का उलघंन करते हुए पाया गया था इसीलिए उन्हें भारत में आने नहीं दिया गया। वह किन शर्तांे का उलघंन कर रही थी, यह अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है।
यह जानना दिलचस्प होगा कि वह इलाहाबाद को अपना दूसरा घर मानती हैं। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी की पढ़ाई की और भारत में लगभग 30 साल रहीं। उन्होंने सिर्फ हिंदी साहित्य और भाषा का ही अध्ययन नहीं किया, उन्होंने हिंदी भाषी क्षेत्र में गिने जाने वाले क्षेत्र के समाज का अध्ययन किया। इलाहाबाद में रहते हुए उन्होंने हिंदी-उर्दू विवाद को नये सिरे से देखा और हिंदी के साथ जुड़कर बन रहे राष्ट्रवाद की गहरी पड़ताल की। उन्होंने आमजन की भाषा, उनका पाठन और सांस्कृतिक सुरूचियों पर शोध किया और उन्हें रेखांकित किया।
यहां हम उनकी लिखी प्रमुख पुस्तकों की सूची प्रस्तुत कर रहे हैं: ‘द हिंदी पब्लिक स्फीयर 1920-40: लैंग्वेज एंड लिटरेचर इन द एज ऑफ नेशनलिज्म’। इस पुस्तक का अनुवाद हिंदी के प्रसिद्ध कवि और अनुवादक नीलाभ ने ‘हिन्दी का लोकवृत्त’ के नाम से किया है और इसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया। ‘प्रिट एण्ड प्लीजर’, प्रकाशक- द ओरिएंट ब्लैकस्वान। ‘ईस्ट ऑफ दिल्ली’, प्रकाशक -आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस। ‘बिफोर द डिवाइड: हिंदी एण्ड उर्दू लिटरेरी कल्चर’, प्रकाशक- ओरिएंट लागमैन। उन्होंने हाल ही में लेखक रविकांत के साथ उन्होंने एक पुस्तक संपादित की जो अंग्रेजी भाषा का हिंदी के साथ वर्तनी स्तर पर घुलने मिलने पर है। इसका शिर्षक ‘हिंगलिश लाइव’ है और प्रकाशक ‘ ओरिएंट ब्लैकस्वान’ है।
उन्होंने कई अन्य पुस्तकों का संपादन किया है जो सांस्कृतिक पहलुओं को समेटती हैं। इसमें से एक प्रमुख पुस्तक ‘लव इन साउथ एशिया: ए कल्चरल हिस्ट्री’ है। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी पे्रस से प्रकाशित यह पुस्तक उनका शुरूआती दौर का काम है। यह पुस्तक उन्होंने मूलतः संपादित की थी।
भारत के महत्वपूर्ण विद्वानों ने भारत सरकार द्वारा उन्हें दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा से वापस भेज देने और उन्हें भारत में काम करने न देने की कड़ी आलोचना की है। मीडिया संस्थानों के हिस्से ने भी इस पर चिंता और नाराजगी जताई है। भाजपा की केंद्र की सरकार की ओर से फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है जिससे पता चले कि उन्हें क्यों भारत आने नहीं दिया। भाजपा और उसकी जहां भी सरकार है, हिंदी की सेवा के लिए जिस तरह से उतावली दिखाते हुए आ रही है, वह सरकार एक इतालवी को, जो हिंदी के लिए पिछले कई दशकों से काम कर रही हैं और विदेश की संस्थानों में हिंदी पढ़ाती हैं और खुद अच्छी हिंदी बोलती हैं, को भारत में आने से रोकने में लग गई?
यदि हम भाजपा की केंद्र सरकार के इस तरह के निर्णयों को देखें तो इसके कई उदाहरण दिखेंगे। लेकिन, इसमें एक महत्वपूर्ण उदाहरण शेल्डेन पोलक का है जो संस्कृत के अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों में गिने जाते हैं और उनकी पुस्तकों ने संस्कृत भाषा को काफी समृद्ध किया। उन्हें 2016 में भारत में जिस संस्थान में काम कर रहे थे, उन्हें हटाने को लेकर बकायदा अभियान चलाया गया और अंत में उन्हें वहां से हटना पड़ा। ‘स्वदेशी’ के नाम पर हटाये गये विद्वानों का यह शुरूआती दौर था। उनके खिलाफ चलाये गये अभियान में कुछ शब्दावलियों में ‘देश की एकता और अखंडता’ का प्रयोग किया गया था। कुछ समय बाद शेल्डेन पोलक को अपने पद से हटना पड़ा।
फ्रांचेस्का ओर्सीनी कें संदर्भ में इस तरह की बातों का उल्लेख नहीं आ रहा है। और, फिलहाल कोई बयान सामने नहीं आ रहा है। लेकिन, यदि आप उनकी पुस्तकों से होकर गुजरें तब शायद बात और अधिक साफ हो। ‘हिन्दी का लोकवृत्त’ पुस्तक की समयावधि ठीक वही है जब भारत में राष्ट्रवाद कई स्तरों पर बन रहा था। फ्रांचेस्का ओर्सीनी अपने शोध में सिर्फ हिंदी, उर्दू के विभाजन, हिंदू धर्म के आग्रह पर हिंदुस्थान पर ही जोर नहीं देती हैं, वह मार्क्सवादी और गांधीवादी समाजवाद की धारा पर भी काम करती हैं और बताती है कि हिंदुस्तानी एकेडमी जैसे संस्थान भाषा और समाज को ठीक वैसे ही नहीं देख रहे थे जैसा आज की हिंदी बनती जा रही है।
वह भाषा को समाज और राजनीति के जटिल संबंधों और उसकी अभिव्यक्तियों के साथ जोड़कर उन जड़ों की तलाश की ओर जाती है जहां से आज के दौर की भाषा और समाज को बनाने और बनने वाली प्रवृत्तियों को तलाशा जा सकता है। उनके अनुसार भाषा से शब्द हटाने का अर्थ उस समाज को निकालना भी है। भारत के संदर्भ में भाषा की शुद्धता का अर्थ वर्ण की शुद्धता तक जाएगा। ऐसे में जो भाषा बनेगी उसमें देश और समाज का अंत्यंत सकीर्ण हिस्सा ही बच जाएगा। वह शुद्धता के खतरे को बहुत जोर देते हुए रेखांकित करती हैं।
उनकी पुस्तक ‘प्रिंट एण्ड प्लीजर’ इस शोध को और भी ठोस रूप में सामने लेकर आती है। वह इलाहाबाद से निकलने वाली पत्रिकाओं और प्रकाशकों पर काम करते हुए उन पाठकों तक जाती हैं जो मेलों, ठेलों और सड़क के किनारे बिकने वाली पुस्तकों को खरीदते थे और पढ़ते थे। ये साहित्य हिंदी साहित्य के मूर्धन्यों की साहित्यिक रूचियों से बाहर परित्यक्त थे लेकिन वे आमजन के साहित्य बोध के अधिक करीब थे। वह उनकी भाषा और कथ्य का अध्ययन करती हैं। इस तरह के साहित्य में कथा, शेरो-शायरी आदि हुआ करते थे जिनका प्रयोग आम जीवन में होता था और इनकी भाषा हिंदी-उर्दू के विभाजनों से परे रोजमर्रा की भाषा थी। ‘बिफोर द डिवाइड: हिंदी एण्ड उर्दू लिटरेरी कल्चर’ भाषा विवाद, राजनीति और संस्कृति का ऐतिहासिक विकास को रेखांकित करती है।
हाल ही के दिनों में कई मीडिया संस्थानों को ‘उर्दू’ के शब्दों के प्रयोग को लेकर नोटिस जारी किया गया। इसी तरह, न्यायापलिका जैसे संस्थानों में हिंदी शब्दों के प्रयोग को लेकर निर्देश जारी किये गये। इस तरह की शुद्धता का आग्रह हमें आज से सौ पीछे की हुई घटनाओं की याद दिलाती हैं। और, इसी समयावधि पर फ्रांचेस्का ओर्सीनी का शोध और लेखन है। इस बात की पूरी संभावना है कि शुद्धता के इस आग्रह, विचारधारा, चिंतन और कार्यकारी पद्धति को फ्रांचेस्का ओर्सीनी की शोध पद्धति, लेखन और चिंतन नागवार गुजरे।
यहां उनका एक और काम हमें ध्यान में रखना होगा। उनकी एक पुस्तक तैमूर लंग के हमले के बाद के समय में साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक जीवन को लेकर है और दूसरी उसके बाद ‘ईस्ट ऑफ डेल्ही’ है। यह दोनों ही पुस्तकें हमला, दमन और तबाही के बाद संस्कृतियों के विसरण की प्रवृत्तियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती हैं।
किसी भी समाज में संस्कृतियां ही होती हैं जो न तो किसी राजघराने को मानती हैं और न ही फासाीवाद के दौर में मरती हैं। ये जन के जीवन में रची बसी होती हैं और उसके साथ अमर-यात्रा करती रहती हैं। जिस भाषा और साहित्य को मारना हो, उसे जन से अलग कर दो। फ्रांचेस्का ओर्सीनी जिस हिंदी भाषा को प्यार करती है उसमें उसका जन है, उसकी संस्कृति है और उसका समाज है। यह समझना बेहद आसान है कि फ्रांचेस्का ओर्सीनी किन्हें नागवार गुजर रही हैं।