बिहार चुनाव : एनडीए की टिकट वितरण की सामाजिक सरंचना क्या बता रही है?

माना जा रहा है कि बिहार नये मोड़ पर खड़ा है और 2025 विधान सभा का चुनाव यह तय करेगा कि वह आगे की तरफ जाएगा या फिर पीछे की तरफ लौटेगा।माना जा रहा है कि एनडीए की सत्ता में पुनर्वापसी अब बिहार को 90 से पीछे की तरफ ले जाएगा।मतलब है कि बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में ऊंची जाति हिंदुओं का प्रभुत्व आगे बढ़ेगा।एनडीए सत्ता से बेदखल होगा तो यह प्रभुत्व कमजोर पड़ेगा और बिहार बदलाव की दिशा में बढ़ेगा।जरूर ही बिहार के आगे या पीछे जाने का रिश्ता सामाजिक-राजनीतिक जीवन में ऊंची जाति हिंदुओं के प्रभुत्व के घटने-बढ़ने के साथ बनता है।

एनडीए और खासतौर से भाजपा के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना भी सामाजिक न्याय का माखौल उड़ाती दिखती है.।स्पष्ट दीखता है कि एनडीए और भाजपा 2020 के चुनावी प्रदर्शन को दुहराती भी है तो विधान सभा की सामाजिक संरचना बदलेगी और बिहार की सत्ता पर ऊंची जाति हिंदुओं का नियंत्रण मजबूत होगा।टिकट वितरण की सामाजिक संरचना से भी एनडीए का ऊंची जाति हिंदुओं के सामाजिक-राजनीतिक प्रभुत्व को आगे बढ़ाने का एजेंडा साफ तौर पर सामने आता है।

बकायदा इतिहास में भी झांक कर विधान सभा की बदलती सामाजिक संरचना के साथ बिहारी समाज व राजनीति के बदलाव का संबंध देख सकते हैं।आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व को 1967 में जबर्दस्त धक्का लगता है और बिहार में संयुक्त विधायक दल(संविद) की सरकार बनती है.इस विधान सभा में पिछड़े समुदाय के विधायकों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है।कांग्रेस के सत्ता से पहली बार बाहर होने और विधान सभा की सामाजिक संरचना में आए बदलाव के साथ अंतत: आजादी के बाद कोई पिछड़ा बिहार के सत्ता के शीर्ष-मुख्यमंत्री की कुर्सी तक भी पहुंचता है।

यद्यपि,इस विधान सभा में भी ऊंची जाति हिंदू विधायकों की संख्या ही ज्यादा रहती है,वे 41.82 प्रतिशत और हिंदू पिछड़े 25.78 प्रतिशत होते हैं.फिर 1990 में जब बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में निर्णायक मोड़ आता है और लालू यादव सत्ता की बागडोर संभालते हैं तो विधान सभा की सामाजिक संरचना भी उलट जाती है।पहली बार पिछड़े विधायकों की संख्या उच्च जाति हिंदू विधायकों की संख्या से अधिक हो जाती है.विधायकों में उच्च जाति हिंदू 32.40 प्रतिशत और हिंदू पिछड़े 36.11 प्रतिशत होते हैं।1995 के विधान सभा चुनाव में जब लालू यादव को भारी समर्थन हासिल होता है,वे बिहार की राजनीति में अधिकतम ताकत हासिल करते हैं तो विधान सभा में भी पिछड़ों की तादाद नई ऊंचाई पर पहुंचती है.विधायकों में ऊंची जाति हिंदू घटकर 17.28 प्रतिशत तो हिंदू पिछड़े बढ़कर 49.69 प्रतिशत हो जाते हैं।

2000 में विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है और वे 23.04 प्रतिशत हो जाते हैं।2005 में राजनीतिक बदलाव घटित होता है,भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार सत्ता की बागडोर संभालते हैं और विधान सभा में 25.9 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू पहुंचते हैं.फिर 2010 में नीतीश कुमार की अगुआई में एनडीए को भारी सफलता मिलती है.नीतीश कुमार अधिकतम राजनीतिक ताकत हासिल करते हैं.जद-यू विधान सभा में 115,भाजपा 91 और राजद 22 सीटों पर सिमट जाती है.इसके साथ ही विधान सभा में ऊंची जाति के हिंदू विधायक बढ़कर 1990 की संख्या के लगभग 32.51 प्रतिशत हो जाते हैं.ऊंची जाति हिंदुओं के कुल 79 विधायकों में जद-यू से 31 और भाजपा से 40 जीतते है़ं. 2015 में लालू यादव और नीतीश कुमार साथ आते हैं और जबर्दस्त चुनावी सफलता हासिल करते हैं तो विधानसभा में फिर से ऊंची जाति हिंदुओं की संख्या में गिरावट आती है और वे 21.39 प्रतिशत विधानसभा पहुंचते हैं।

2015 में राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है,जद (यू) 71 सीटों के साथ दूसरे और भाजपा 53 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रहती है।ऊंची जाति हिंदू विधायकों की संख्या घटकर 51हो जाती है,28 सीटों का नुकसान होता है.भाजपा से 23,जद-यू से 12 और राजद से 3 ऊंची जाति हिंदू जीतते हैं.पिछले 2020 के विधान सभा में फिर से सवर्ण विधायकों की संख्या 5 प्रतिशत से बढ़कर 26.33 प्रतिशत हो जाती है.इस चुनाव में फिर से नीतीश कुमार एनडीए के साथ होते हैं.स्पष्ट तौर पर विधान सभा की बदलती सामाजिक संरचना बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन के बदलाव की कहानी कहता है।
साफ तौर पर दिखाई पड़ता है कि 90 के दशक में खासतौर पर 95 में ऊंची जाति हिंदुओं के राजनीतिक हैसियत पर सबसे कड़ा प्रहार होता है।आजादी के बाद 2020 के विधान सभा तक पर नजर डालें तो 1995 में ऊंची जाति हिंदू विधायकों की संख्या सबसे कम होती है.2000 में ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत बढ़ती है और 2005 से वे अपने राजनीतिक प्रभुत्व को लगे धक्के से एनडीए के जरिए उबरने और सत्ता व राजनीति पर नियंत्रण को मजबूत करने की दिशा में बढ़ते हैं।2010 में विधान सभा में ऊंची जाति हिंदुओं की संख्या 1990 के लगभग बराबर हो जाती है.जरूर ही 2015 में वे घटते हैं,लेकिन 1995 की तुलना में वे 5 प्रतिशत ज्यादा रहते हैं.2020 में फिर 2015 की तुलना में 5 प्रतिशत बढ़ते हैं.साफ तौर पर देखते हैं कि 1990 में लगे धक्के के बाद कांग्रेस की जगह पर ऊंची जाति हिंदुओं की नंबर एक पार्टी के बतौर भाजपा आगे बढ़ती है.उसके राजनीतिक उत्थान के साथ ही ऊंची जाति हिंदुओं की बिहार की सत्ता व राजनीति पर नियंत्रण आगे बढ़ता है।

अब 2025 में एनडीए के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना क्या बता रहा है,इसको समझते हैं.एनडीए में शामिल पार्टियों में भाजपा बिहार में 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है,इसने लगभग आधी-49 सीटों पर ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार खड़े किए हैं.भाजपा के हिस्से 12 रिजर्व सीटें हैं।इन सीटों को छोड़कर देखें तो उसके 89 सामान्य सीटों पर 55 फीसद ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार हैं।शेष 40 सीटें हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से आया है.वहीं,भाजपा के बराबर 101 सीटों पर लड़ रही जद-यू के भी उम्मीदवारों में 22 ऊंची जाति हिंदू हैं।एससी-एसटी के लिए आरक्षित 16 सीटें जद-यू के हिस्से है तो इसके उम्मीदवारों में हिंदू पिछड़ों-अतिपिछड़ों के हिस्से 59 सीटें हैं।लोजपा (आर) ने 29 में से 10 सीट ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया है।6 आरक्षित सीटें लोजपा के हिस्से है तो इसके उम्मीदवारों में 12 हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े हैं।जीतनराम मांझी की पार्टी-हम ने 6 में से 2 सीट ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया है।उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी ने 6 में से 2 सीट ऊंची जाति हिंदुओं को दिया है.कुल मिलाकर,एनडीए ने 243 में 85 सीटें-लगभग 34.97 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया है।

एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटें छोड़ दें तो 204 सामान्य सीटों में से 5 पर मुस्लिम उम्मीदवार हैं।शेष बची 199 सामान्य सीटों में 85 पर ऊंची जाति हिन्दू हैं।एनडीए ने हिंदू पिछड़ों-अतिपिछड़ों को कुल 114 सीटें दी है,यह लगभग 46.91 प्रतिशत होता है.आबादी में हिस्सेदारी के आधार पर बात करें तो एनडीए ने ऊंची जाति के हिंदुओं को तीन गुना से ज्यादा सीटें दी हैं तो हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े को आबादी से कम।वहीं,विपक्षी गठबंधन-INDIA ने 39 सीटें ऊंची जाति हिंदुओं को दिया है,यह लगभग 16.04 प्रतिशत है और उसकी आबादी के डेढ़ गुना के लगभग है।

ध्यान दिया जाना चाहिए कि 2020 विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 74 ऊंची जाति हिंदुओं को टिकट दिया था,जबकि एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों के साथ जद-यू द्वारा मुसलमानों को दिए गये 11 सीटें छोड़ दें तो 119 सीटें हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से आई थी.2020 में भाजपा ने अपने हिस्से की 110 सीटों में 50 ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया था,जबकि जदयू ने अपने हिस्से की 115 सीटों में 19 ऊंची जाति हिंदुओं को दिया था।एनडीए ने 2020 में 30.45 प्रतिशत सीटें ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया था,2025 वह बढ़कर 34.97 प्रतिशत हो गया है।दूसरी तरफ,एनडीए ने हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से 48.97 प्रतिशत सीटें दिया था,जो 2025 में घटकर 46.91 प्रतिशत हो गया है.इस बार भाजपा 9 कम सीटों पर लड़ रही है तो ऊंची जाति हिंदुओं का 1 सीट घटाया है.वहीं,जद-यू 14 कम सीटों पर लड़ रही है,लेकिन ऊंची जाति हिंदुओं को 3 सीटें ज्यादा दी है।टिकट वितरण में पिछली बार की तुलना में जद-यू में भी ऊंची जाति हिंदुओं का हिस्सा बढ़ा है।2020 की अपेक्षा एनडीए ने ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले 11 ज्यादा सीटें की हैं.वहीं,विपक्षी गठबंधन इंडिया ने ऊंची जाति हिंदुओं को 2020 की अपेक्षा 10 सीटें कम दी हैं।

उल्लेखनीय है कि 2020 के विधान सभा में उच्च जाति हिंदू प्रतिनिधियों की संख्या 64 थी,इनमें एनडीए के 45,महागठबंधन के 17 और लोजपा व निर्दलीय एक-एक थे।लगभग आधे उच्च जाति हिंदू विधायक भाजपा से थे।
भाजपा के 74 विधायकों में 33 उच्च जाति हिंदू थे।भाजपा के ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवारों की जीत की दर भी सबसे ज्यादा थी.जद-यू से ऊंजी जाति हिंदू 9 जीते थे।भाजपा की अपेक्षा जद-यू के उच्च जाति हिंदू उम्मीदवारों की जीतने की दर कम थी.दूसरी तरफ,महागठबंधन से 49 ऊंची जाति हिंदुओं को उम्मीदवार बनाया था,जिसमें 17 जीते थे।
पिछली बार एनडीए के 60.81 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार जीत गये थे।महागठबंधन के ऊंची जाति के उम्मीदवारों के जीतने की दर 34.69 प्रतिशत थी,जो एनडीए के मुकाबले कम थी।

2020 में एनडीए के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना और परिणामों के आधार पर आकलन करें तो स्पष्ट है कि अगर एनडीए और भाजपा पुराने चुनावी प्रदर्शन को भी दुहराती है तो वह विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की 2020 की तुलना में अधिक संख्या को विधान सभा पहुंचाएगी।वह संख्या 52 के लगभग पहुंचेगी,जो 2020 से 7 ज्यादा होगी।स्पष्ट है कि भाजपा के 2020 के चुनावी प्रदर्शन के साथ एनडीए की पुनर्वापसी होती है तो वह सत्ता पर ऊंची जाति हिंदुओं के नियंत्रण के बढ़ने के साथ होगी।ऐसी स्थिति में विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की कुल संख्या भी बढ़ना तय होगा और बिहार पीछे की तरफ ही कदम बढ़ाऐगा!2025 में बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए के टिकट वितरण की माना जा रहा है कि बिहार नये मोड़ पर खड़ा है और 2025 विधान सभा का चुनाव यह तय करेगा कि वह आगे की तरफ जाएगा या फिर पीछे की तरफ लौटेगा.माना जा रहा है कि एनडीए की सत्ता में पुनर्वापसी अब बिहार को 90 से पीछे की तरफ ले जाएगा।

मतलब है कि बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में ऊंची जाति हिंदुओं का प्रभुत्व आगे बढ़ेगा.एनडीए सत्ता से बेदखल होगा तो यह प्रभुत्व कमजोर पड़ेगा और बिहार बदलाव की दिशा में बढ़ेगा।जरूर ही बिहार के आगे या पीछे जाने का रिश्ता सामाजिक-राजनीतिक जीवन में ऊंची जाति हिंदुओं के प्रभुत्व के घटने-बढ़ने के साथ बनता है।एनडीए और खासतौर से भाजपा के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना भी सामाजिक न्याय का माखौल उड़ाती दिखती है.स्पष्ट दीखता है कि एनडीए और भाजपा 2020 के चुनावी प्रदर्शन को दुहराती भी है तो विधान सभा की सामाजिक संरचना बदलेगी और बिहार की सत्ता पर ऊंची जाति हिंदुओं का नियंत्रण मजबूत होगा।टिकट वितरण की सामाजिक संरचना से भी एनडीए का ऊंची जाति हिंदुओं के सामाजिक-राजनीतिक प्रभुत्व को आगे बढ़ाने का एजेंडा साफ तौर पर सामने आता है।

बकायदा इतिहास में भी झांक कर विधान सभा की बदलती सामाजिक संरचना के साथ बिहारी समाज व राजनीति के बदलाव का संबंध देख सकते हैं।आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस के राजनीतिक वर्चस्व को 1967 में जबर्दस्त धक्का लगता है और बिहार में संयुक्त विधायक दल(संविद) की सरकार बनती है।इस विधान सभा में पिछड़े समुदाय के विधायकों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है।कांग्रेस के सत्ता से पहली बार बाहर होने और विधान सभा की सामाजिक संरचना में आए बदलाव के साथ अंतत: आजादी के बाद कोई पिछड़ा बिहार के सत्ता के शीर्ष-मुख्यमंत्री की कुर्सी तक भी पहुंचता है।यद्यपि,इस विधान सभा में भी ऊंची जाति हिंदू विधायकों की संख्या ही ज्यादा रहती है,वे 41.82 प्रतिशत और हिंदू पिछड़े 25.78 प्रतिशत होते हैं.फिर 1990 में जब बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में निर्णायक मोड़ आता है और लालू यादव सत्ता की बागडोर संभालते हैं तो विधान सभा की सामाजिक संरचना भी उलट जाती है।

पहली बार पिछड़े विधायकों की संख्या उच्च जाति हिंदू विधायकों की संख्या से अधिक हो जाती है।विधायकों में उच्च जाति हिंदू 32.40 प्रतिशत और हिंदू पिछड़े 36.11 प्रतिशत होते हैं.1995 के विधान सभा चुनाव में जब लालू यादव को भारी समर्थन हासिल होता है,वे बिहार की राजनीति में अधिकतम ताकत हासिल करते हैं तो विधान सभा में भी पिछड़ों की तादाद नई ऊंचाई पर पहुंचती है.विधायकों में ऊंची जाति हिंदू घटकर 17.28 प्रतिशत तो हिंदू पिछड़े बढ़कर 49.69 प्रतिशत हो जाते हैं।

2000 में विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है और वे 23.04 प्रतिशत हो जाते हैं।2005 में राजनीतिक बदलाव घटित होता है,भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार सत्ता की बागडोर संभालते हैं और विधान सभा में 25.9 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू पहुंचते हैं।फिर 2010 में नीतीश कुमार की अगुआई में एनडीए को भारी सफलता मिलती है।नीतीश कुमार अधिकतम राजनीतिक ताकत हासिल करते हैं.जद-यू विधान सभा में 115,भाजपा 91 और राजद 22 सीटों पर सिमट जाती है.इसके साथ ही विधान सभा में ऊंची जाति के हिंदू विधायक बढ़कर 1990 की संख्या के लगभग 32.51 प्रतिशत हो जाते हैं.ऊंची जाति हिंदुओं के कुल 79 विधायकों में जद-यू से 31 और भाजपा से 40 जीतते है़ं. 2015 में लालू यादव और नीतीश कुमार साथ आते हैं और जबर्दस्त चुनावी सफलता हासिल करते हैं तो विधानसभा में फिर से ऊंची जाति हिंदुओं की संख्या में गिरावट आती है और वे 21.39 प्रतिशत विधानसभा पहुंचते हैं।

2015 में राजद 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरती है,जद (यू) 71 सीटों के साथ दूसरे और भाजपा 53 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रहती है.ऊंची जाति हिंदू विधायकों की संख्या घटकर 51हो जाती है,28 सीटों का नुकसान होता है.भाजपा से 23,जद-यू से 12 और राजद से 3 ऊंची जाति हिंदू जीतते हैं.पिछले 2020 के विधान सभा में फिर से सवर्ण विधायकों की संख्या 5 प्रतिशत से बढ़कर 26.33 प्रतिशत हो जाती है.इस चुनाव में फिर से नीतीश कुमार एनडीए के साथ होते हैं.स्पष्ट तौर पर विधान सभा की बदलती सामाजिक संरचना बिहार के सामाजिक-राजनीतिक जीवन के बदलाव की कहानी कहता है।
साफ तौर पर दिखाई पड़ता है कि 90 के दशक में खासतौर पर 95 में ऊंची जाति हिंदुओं के राजनीतिक हैसियत पर सबसे कड़ा प्रहार होता है।आजादी के बाद 2020 के विधान सभा तक पर नजर डालें तो 1995 में ऊंची जाति हिंदू विधायकों की संख्या सबसे कम होती है.2000 में ऊंची जाति हिंदुओं की राजनीतिक हैसियत बढ़ती है और 2005 से वे अपने राजनीतिक प्रभुत्व को लगे धक्के से एनडीए के जरिए उबरने और सत्ता व राजनीति पर नियंत्रण को मजबूत करने की दिशा में बढ़ते हैं।2010 में विधान सभा में ऊंची जाति हिंदुओं की संख्या 1990 के लगभग बराबर हो जाती है.जरूर ही 2015 में वे घटते हैं,लेकिन 1995 की तुलना में वे 5 प्रतिशत ज्यादा रहते हैं।2020 में फिर 2015 की तुलना में 5 प्रतिशत बढ़ते हैं.साफ तौर पर देखते हैं कि 1990 में लगे धक्के के बाद कांग्रेस की जगह पर ऊंची जाति हिंदुओं की नंबर एक पार्टी के बतौर भाजपा आगे बढ़ती है।उसके राजनीतिक उत्थान के साथ ही ऊंची जाति हिंदुओं की बिहार की सत्ता व राजनीति पर नियंत्रण आगे बढ़ता है।

अब 2025 में एनडीए के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना क्या बता रहा है,इसको समझते हैं।एनडीए में शामिल पार्टियों में भाजपा बिहार में 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है,इसने लगभग आधी-49 सीटों पर ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार खड़े किए हैं.भाजपा के हिस्से 12 रिजर्व सीटें हैं।इन सीटों को छोड़कर देखें तो उसके 89 सामान्य सीटों पर 55 फीसद ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार हैं।शेष 40 सीटें हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से आया है.वहीं,भाजपा के बराबर 101 सीटों पर लड़ रही जद-यू के भी उम्मीदवारों में 22 ऊंची जाति हिंदू हैं.एससी-एसटी के लिए आरक्षित 16 सीटें जद-यू के हिस्से है तो इसके उम्मीदवारों में हिंदू पिछड़ों-अतिपिछड़ों के हिस्से 59 सीटें हैं.लोजपा (आर) ने 29 में से 10 सीट ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया है.6 आरक्षित सीटें लोजपा के हिस्से है तो इसके उम्मीदवारों में 12 हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े हैं।जीतनराम मांझी की पार्टी-हम ने 6 में से 2 सीट ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया है।

उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी ने 6 में से 2 सीट ऊंची जाति हिंदुओं को दिया है।कुल मिलाकर,एनडीए ने 243 में 85 सीटें-लगभग 34.97 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया है।एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटें छोड़ दें तो 204 सामान्य सीटों में से 5 पर मुस्लिम उम्मीदवार हैं.शेष बची 199 सामान्य सीटों में 85 पर ऊंची जाति हिन्दू हैं।एनडीए ने हिंदू पिछड़ों-अतिपिछड़ों को कुल 114 सीटें दी है,यह लगभग 46.91 प्रतिशत होता है।आबादी में हिस्सेदारी के आधार पर बात करें तो एनडीए ने ऊंची जाति के हिंदुओं को तीन गुना से ज्यादा सीटें दी हैं तो हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े को आबादी से कम।वहीं,विपक्षी गठबंधन-INDIA ने 39 सीटें ऊंची जाति हिंदुओं को दिया है,यह लगभग 16.04 प्रतिशत है और उसकी आबादी के डेढ़ गुना के लगभग है।

ध्यान दिया जाना चाहिए कि 2020 विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 74 ऊंची जाति हिंदुओं को टिकट दिया था,जबकि एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों के साथ जद-यू द्वारा मुसलमानों को दिए गये 11 सीटें छोड़ दें तो 119 सीटें हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से आई थी.2020 में भाजपा ने अपने हिस्से की 110 सीटों में 50 ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया था,जबकि जदयू ने अपने हिस्से की 115 सीटों में 19 ऊंची जाति हिंदुओं को दिया था.एनडीए ने 2020 में 30.45 प्रतिशत सीटें ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले किया था,2025 वह बढ़कर 34.97 प्रतिशत हो गया है.दूसरी तरफ,एनडीए ने हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से 48.97 प्रतिशत सीटें दिया था,जो 2025 में घटकर 46.91 प्रतिशत हो गया है.इस बार भाजपा 9 कम सीटों पर लड़ रही है तो ऊंची जाति हिंदुओं का 1 सीट घटाया है.वहीं,जद-यू 14 कम सीटों पर लड़ रही है,लेकिन ऊंची जाति हिंदुओं को 3 सीटें ज्यादा दी है।टिकट वितरण में पिछली बार की तुलना में जद-यू में भी ऊंची जाति हिंदुओं का हिस्सा बढ़ा है।2020 की अपेक्षा एनडीए ने ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले 11 ज्यादा सीटें की हैं.वहीं,विपक्षी गठबंधन इंडिया ने ऊंची जाति हिंदुओं को 2020 की अपेक्षा 10 सीटें कम दी हैं।

उल्लेखनीय है कि 2020 के विधान सभा में उच्च जाति हिंदू प्रतिनिधियों की संख्या 64 थी,इनमें एनडीए के 45,महागठबंधन के 17 और लोजपा व निर्दलीय एक-एक थे.लगभग आधे उच्च जाति हिंदू विधायक भाजपा से थे।
भाजपा के 74 विधायकों में 33 उच्च जाति हिंदू थे.भाजपा के ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवारों की जीत की दर भी सबसे ज्यादा थी।जद-यू से ऊंजी जाति हिंदू 9 जीते थे।भाजपा की अपेक्षा जद-यू के उच्च जाति हिंदू उम्मीदवारों की जीतने की दर कम थी।दूसरी तरफ,महागठबंधन से 49 ऊंची जाति हिंदुओं को उम्मीदवार बनाया था,जिसमें 17 जीते थे।
पिछली बार एनडीए के 60.81 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार जीत गये थे।महागठबंधन के ऊंची जाति के उम्मीदवारों के जीतने की दर 34.69 प्रतिशत थी,जो एनडीए के मुकाबले कम थी।

2020 में एनडीए के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना और परिणामों के आधार पर आकलन करें तो स्पष्ट है कि अगर एनडीए और भाजपा पुराने चुनावी प्रदर्शन को भी दुहराती है तो वह विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की 2020 की तुलना में अधिक संख्या को विधान सभा पहुंचाएगी.वह संख्या 52 के लगभग पहुंचेगी,जो 2020 से 7 ज्यादा होगी.स्पष्ट है कि भाजपा के 2020 के चुनावी प्रदर्शन के साथ एनडीए की पुनर्वापसी होती है तो वह सत्ता पर ऊंची जाति हिंदुओं के नियंत्रण के बढ़ने के साथ होगी.ऐसी स्थिति में विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की कुल संख्या भी बढ़ना तय होगा और बिहार पीछे की तरफ ही कदम बढ़ाऐगा!सामाजिक संरचना क्या बता रही है, इसको समझते हैं। एनडीए में शामिल पार्टियों में भाजपा बिहार में 101 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, इसने लगभग आधी-49 सीटों पर ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार खड़े किए हैं। भाजपा के हिस्से 12 रिजर्व सीटें हैं। इन सीटों को छोड़कर देखें तो उसके 89 सामान्य सीटों पर 55 फीसद ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार हैं। शेष 40 सीटें हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से आया है।

वहीं,भाजपा के बराबर 101 सीटों पर लड़ रही जद-यू के भी उम्मीदवारों में 22 ऊंची जाति हिंदू हैं। एससी-एसटी के लिए आरक्षित 16 सीटें जद-यू के हिस्से हैं तो इसके उम्मीदवारों में हिंदू पिछड़ों-अतिपिछड़ों के हिस्से 59 सीटें हैं।

लोजपा (आर) ने 29 में से 10 सीट ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले की हैं। 6 आरक्षित सीटें लोजपा के हिस्से हैं तो इसके उम्मीदवारों में 12 हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े हैं।

जीतनराम मांझी की पार्टी-हम और उपेन्द्र कुशवाहा की पार्टी ने छह-छह सीटों में से 2-2 सीट ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले की हैं।

कुल मिलाकर,एनडीए ने 243 में 85 सीटें-लगभग 34.97 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले की हैं। एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटें छोड़ दें तो 204 सामान्य सीटों में से 5 पर मुस्लिम उम्मीदवार हैं। शेष बची 199 सामान्य सीटों में 85 पर ऊंची जाति हिन्दू हैं। एनडीए ने हिंदू पिछड़ों-अतिपिछड़ों को कुल 114 सीटें दी हैं। यह लगभग 46.91 प्रतिशत होता है। आबादी में हिस्सेदारी के आधार पर बात करें तो एनडीए ने ऊंची जाति के हिंदुओं को तीन गुना से ज्यादा सीटें दी हैं।

वहीं, विपक्षी गठबंधन-इंडिया ने 39 सीटें ऊंची जाति हिंदुओं को दी हैं। यह लगभग 16.04 प्रतिशत है और उसकी आबादी के डेढ़ गुना के लगभग है।

ध्यान दिया जाना चाहिए कि 2020 विधानसभा चुनाव में एनडीए ने 74 ऊंची जाति हिंदुओं को टिकट दिए थे, जबकि एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों के साथ जद-यू द्वारा मुसलमानों को दी गई 11 सीटें छोड़ दें तो 119 सीटें हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से आई थीं।

2020 में भाजपा ने अपने हिस्से की 110 सीटों में 50 ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले की थीं, जबकि जदयू ने अपने हिस्से की 115 सीटों में 19 ऊंची जाति हिंदुओं को दी थीं। एनडीए ने 2020 में 30.45 प्रतिशत सीटें ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले की थीं , 2025में वह बढ़कर 34.97 प्रतिशत हो गई हैं।

दूसरी तरफ, एनडीए ने हिंदू पिछड़े-अतिपिछड़े के हिस्से को 48.97 प्रतिशत सीटें दी थीं, जो 2025 में घटकर 46.91 प्रतिशत हो गई हैं। इस बार भाजपा 9 कम सीटों पर लड़ रही है तो ऊंची जाति हिंदुओं की 1 सीट घटाई है। वहीं,जद-यू 14 कम सीटों पर लड़ रही है, लेकिन ऊंची जाति हिंदुओं को 3 सीटें ज्यादा दी हैं।

टिकट वितरण में पिछली बार की तुलना में जद-यू में भी ऊंची जाति हिंदुओं का हिस्सा बढ़ा है। 2020 की अपेक्षा एनडीए ने ऊंची जाति हिंदुओं के हवाले 11 ज्यादा सीटें की हैं।

वहीं,विपक्षी गठबंधन इंडिया ने ऊंची जाति हिंदुओं को 2020 की अपेक्षा 10 सीटें कम दी हैं।

उल्लेखनीय है कि 2020 के विधान सभा में उच्च जाति हिंदू प्रतिनिधियों की संख्या 64 थी, इनमें एनडीए के 45, महागठबंधन के 17 और लोजपा व निर्दलीय एक-एक थे। लगभग आधे उच्च जाति हिंदू विधायक भाजपा से थे।

भाजपा के 74 विधायकों में 33 उच्च जाति हिंदू थे। भाजपा के ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवारों की जीत की दर भी सबसे ज्यादा थी। जद-यू से ऊंजी जाति हिंदू 9 जीते थे। भाजपा की अपेक्षा जद-यू के उच्च जाति हिंदू उम्मीदवारों की जीतने की दर कम थी। दूसरी तरफ,महागठबंधन से 49 ऊंची जाति हिंदुओं को उम्मीदवार बनाया था, जिसमें 17 जीते थे।

पिछली बार एनडीए के 60.81 प्रतिशत ऊंची जाति हिंदू उम्मीदवार जीत गये थे। महागठबंधन के ऊंची जाति के उम्मीदवारों के जीतने की दर 34.69 प्रतिशत थी,जो एनडीए के मुकाबले कम थी।

2020 में एनडीए के टिकट वितरण की सामाजिक संरचना और परिणामों के आधार पर आकलन करें तो स्पष्ट है कि अगर एनडीए और भाजपा पुराने चुनावी प्रदर्शन को भी दुहराती है तो वह विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की 2020 की तुलना में अधिक संख्या को विधान सभा पहुंचाएगी।

वह संख्या 52 के लगभग पहुंचेगी,जो 2020 से 7 ज्यादा होगी। स्पष्ट है कि भाजपा के 2020 के चुनावी प्रदर्शन के साथ एनडीए की पुनर्वापसी होती है तो वह सत्ता पर ऊंची जाति हिंदुओं के नियंत्रण के बढ़ने के साथ होगी। ऐसी स्थिति में विधान सभा में उच्च जाति हिंदुओं की कुल संख्या भी बढ़ना तय होगा और बिहार पीछे की तरफ ही कदम बढ़ाएगा!

(लेखक ऐक्टिविस्ट हैं और सामाजिक न्याय आंदोलन से जुड़े हैं।)

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