कुछ दिनों से सीमित ही सही एक खबर चर्चा में है। यह घटना 20 नवम्बर, 2025 की है जब अरावली की पहाड़ियों में होने वाली खदानों को रोकने के लिए इसकी पहाड़ी की परिभाषा को इसकी 100 मीटर या इससे अधिक होना सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया और इसे न्यायालय ने स्वीकृति दे दी। यह प्रस्ताव केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के पैनल द्वारा प्रस्तुत किया गया था। इस ऊंचाई वाली पर्वत श्रृंखला की ढलान और इससे जुड़ी जमीन भी इसका हिस्सा माना जाएगा।
इस उपरोक्त खबर को पढ़ते यदि आप अरावली की पहाड़ियों से अवगत नहीं हो तो यह एक सामान्य खबर लगेगी। खासकर, जो लोक उत्तरांखड या हिमांचल के ऊंचे पहाड़ों को देखने के आदी हैं, उन्हें इसमें कुछ भी नागवार नहीं गुजरेगा। लेकिन, यदि आप भारत की सबसे प्राचीन पहाड़ियों में से एक इस अरावली पहाड़ियों से परिचित हों, तब आप सकते में आ सकते हैं।
इस पहाड़ श्रृंखला में, भारत के वन विभाग के सर्वेक्षण बताते हैं कि राजस्थान कुल 12081 में से सिर्फ 1048 पहाड़ियां ही ऐसी हैं जो 100 मीटर की ऊंचाई के मानक को पास करती हैं। इसका सीधा अर्थ है कि लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां खदान के लिए उपयोग में लाई जा सकती हैं।
यदि ऐसे प्रावधान को लागू कर दिया जाए तब तो पूरी अरावली पहाड़ी ही खत्म हो जाएगी। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैले इस अरावली पहाड़ी में माउंट आबू एक अपवाद की तरह दिखता है। लेकिन, इसकी सामान्य ऊंचाई कम होने का अर्थ यह नहीं है कि इसने पर्यावरण में कमतर भूमिका है। पुरातात्विक अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि सिंधु बेसिन की उथल-पुथल से सभ्यताएं इसी की पहाड़ियों की तरफ बढ़ीं।
इसकी सबसे निचली पहाड़ियां दिल्ली और इसके एनसीआर की ओर दिखती हैं जिसमें लगभग एक लाख साल पूर्व की पाषाण सभ्यता के निशान मिले हैं। इसी तरह थार क्षेत्र के रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने में अरावली की पहाड़ियों ने महती भूमिका निभाया है। अरावली की पहाड़ियां झीलों से भरी हुई हैं। दिल्ली में ऐसी कुछ झीलें अब भी बची हुई हैं।
लेकिन, खासकर राजस्थान में जलअभ्यरण और वन्य जीवों के अभ्यरण्यों की उपस्थिति वन-जीवन में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं। यदि 100 मीटर ऊंचाई का प्रावधान यदि राजस्थान में लागू कर दिया जाए तब मात्र 8.7 प्रतिशत पहाड़ियां ही संरक्षित क्षेत्र में आ पाएंगी। इसे दिल्ली और इसके आसापास के क्षेत्र में लागू करने पर स्थिति और भी बदतर हो जाएगी।
सरकार का विन विभाग अपने रिपोर्टों में अरावली को बचाने के लिए जिस तरह के रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहा था उसमें छोटी पहाड़ियों के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्हें बचाने के प्रावधानों की मांग कर रहा था। मसलन, वन विभाग के सर्वेक्षण में यह बात निहित थी कि छोटी पहाड़ियां धूल के कण के साथ-साथ धुंए जैसी पर्यावरणीय कण को रोकने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
ऐसा लगता है कि ये बातें पर्यावरण मंत्रालय द्वारा तैयार की जा रही रिपोर्ट की चिंताओं में नहीं आ सकीं, या उन पर उतनी तवज्जो नहीं दी गई। पर्यावरण मंत्रालय ने इससे भिन्न एक अलग तरह के प्रावधान के साथ सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया और इसे माननीय न्यायालय ने स्वीकार भी कर लिया। जबकि, जिन संदर्भों में यह मानक तैयार किया जा रहा था उसमें इन कणों को नियंत्रित करना एक प्रमुख विषय रहा है।
किसी पहाड़ी 100 मीटर की ऊंचाई समुद्र तल से मापी जाएगी या कोई और मानक रखा जाएगा, अखबारों में आई रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं है। वन विभाग की ओर से 2010 से इसे सामान्य तल से 3 डिग्री कोण की ढलान को पहाड़ी माना गया था। 2024 में इसे 4.57 डीग्री कर दिया गया और ऊंचाई को 30 मीटर पर पहाड़़ के मानक को स्वीकृत किया गया। इस नये मानक से भी अरावली का सिर्फ 40 प्रतिशत हिस्सा ही सुरक्षित हो पा रहा था।
इंडियन एक्सप्रेस ने वन विभाग के द्वारा राजस्थान के 15 जिलों के सर्वेक्षण का चार्ट पेश किया है उसमें 20 मीटर तक ऊंचाई वाली पहाड़ियां 107,494 है। इसे 40 मीटर तक के मानक पर लाने पर यह संख्या 5009 हो जाती है। ये सर्वे यह दिखाता है कि अरावली की पहाड़ियों की सामान्य ऊंचाई कम है।
ऊंचाई को मानक बनाकर इसके संरक्षण के दायरे में लाना उपयुक्त तरीका नहीं हो सकता। अरावली को बचाने को लेकर लंबे समय से सर्वोच्च न्यायालय अपनी चिंता जाहिर करता रहा है। पर्यावरणविदों की ओर से भी काफी प्रयास किये गये। खुद, वन विभाग की ओर से समय समय पर रिपोर्ट जारी हुए। दिल्ली, फरीदाबाद और गुरूग्राम में अरावली की पहाड़ियों में निर्माण और खदान को लेकर पहले भी चिंता और इस रोकने के लिए आदेश जारी होते रहे हैं।
पिछले दस सालों में पूरे एनएसीआर और दिल्ली में पर्यावरण में धूल और धुएं के कणों का जमाव तेजी से बढ़ा है। ऐसे में, इन प्रभावों को रोकने को लेकर भी योजनाएं और इस संदर्भ में नये प्रावधान बनाने की जरूरतें लगातार बनी हुई हैं। इसमें से एक प्रावधान राष्ट्रीय संरक्षण क्षेत्र का निर्माण भी है। सर्वोच्च न्यायालय की चिंता इस संदर्भ में भी रही है कि अवैध खदानों से अरावली की बहुत सी पहाड़ियां लुप्त हो गई।
इस नवम्बर के महीने में जिस तरह के प्रावधान स्वीकृत हुए हैं, उससे तो अरावली का पहाड़ियां बचने के बजाय नष्ट होने की ओर ही बढ़ जाएंगी। अरावली के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत योजना और इसकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिया जाना एक चिंता का विषय है। इस निर्णय और प्रावधानों पर एक बार फिर से पुनर्विचार करना चाहिए। इन निर्णयों और प्रावधानों को ऐसे जारी करने और लागू करने दिया गया तब निश्चित ही इसके भयावह परिणाम सामने आएंगे।