संतों के बारे में हिंदू और मुसलमान लिखना उचित नहीं लगता। वे धर्म की कट्टरता और इससे जुड़ी पहचान के खिलाफ खड़े हुए और हमेशा ही ‘प्रेम’ के रस और भाषा को अपनाने का पैगाम दिया। लेकिन, कोई भी लेखन समय से बाहर नहीं होता। आज जिस तरह का माहौल है उसमें इस धार्मिक पहचान को याद कर लेना उपयुक्त लगा।
यहां मैं बताता चलू कि पिछले कुछ वर्षों से आजमगढ़ का पुरातत्व, इतिहास, समाज और धर्म-संस्कृति मेरी रूचि और अध्ययन के केंद्र में है। मुझे जब भी समय मिला, वहां की यात्राएं करता रहा हूं। पिछले महीने में मेरी यात्रा उन पुरातत्व स्थलों की थी जो समय के साथ तेजी से लुप्त हो रहे हैं। इन स्थलों के बारे में कुछ हद तक राहुल सांकृत्यायन और अन्य अध्येता, लेखकों के साथ-साथ पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षणों और लेखन में उपलब्ध है।

लेकिन, आज ये पुरातत्व स्थल या तो खत्म हो गये हैं या खत्म होने की ओर हैं। इस संदर्भ में जनचौक में मैं इन स्थलों की रिपोर्ट लिखूंगा। यहां स्पष्ट कर दूं कि आजमगढ़ का अर्थ मैं उसके प्रशासनिक क्षेत्र के रूप में नहीं बल्कि उसके सांस्कृतिक और धार्मिक परिक्षेत्र के तौर पर ले रहा हूं। इसमें मऊ, गाजीपुर, जौनपुर और अकबरपुर का भी हिस्सा शामिल है।
यहां मैं भुड़कुड़ा में संत बूला साहिब, संत गुलाल साहिब, संत भीखा जी महाराज की परम्परा के विकसित होने और आज भी उनके जीवंत बने रहने के बारे में लिख रहा हूं। यह संत परम्परा बहुत सारे राजनीतिक दबावों के बावजूद अपने मूल स्वर को बनाये रखने के प्रयास में लगा हुआ है। भुड़कुड़ा में इस संत परम्परा का मठ आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ और वाराणसी के बीच में पड़ता है।

इस मठ को लेकर कई रोचक कहानियां भी हैं। इसमें से एक कहानी इस मठ के एक हिस्से के फटकर एक ओर झुक जाने को लेकर है। कहते हैं कि बनारस के संत कीनाजी महाराज एक बार संत भीखा जी से मिलने आये। संत कीनाजी महाराज तांत्रिक धारा से आते थे जिसमें शराब का निषेध नहीं था। संत भीखाजी संत यारी साहब की परम्परा में आते थे जिसमें इसकी मनाही थी।
संत यारी साहब दिल्ली में रहते थे, उनका कर्म क्षेत्र दिल्ली के आसपास का इलाका माना जाता है और धर्म की पहचान के तौर पर वह मुसलमान थे। संत कीनाजी महाराज ने शराब के सेवन के लिए संत भीखा जी से आग्रह किया जिसे भीखा जी महाराज ने मना कर दिया। संत कीना जी ने वहां के कुंए के पानी को ही शराब में बदल दिया। संत भीखाजी ने इसे वापस पानी में बदल दिया।

संत कीनाजी क्रोध में आ गये और उन्होंने पूरे मठ को, मकान सहित लेकर जाने का निर्णय लिया और मकान को चलने का आदेश दिया जिसे तुरंत ही संत भीखा जी ने रोक दिया। संतों की इस चमत्कारिक संघर्ष की ठोस अभिव्यक्ति मकान के एक ओर झुक जाने और नीचे से ऊपर तक दरार आ जाने में हुई। लोगों के बीच मकान के इस दरार को लेकर कई कहानियां प्रचलित हुईं जिसमें संत भीखा जी की महिमा स्थापित होती है।
ऐसी कहानियां निश्चित ही मठ और उसमें रहने वाले संत की आध्यात्मिक शक्ति को स्थापित करती हैं। संभव है कि कीना जी महाराज के बारे में बनारस में भी ऐसी ही कहानियां प्रसिद्ध हों। यह घटना जिस समय की बताई जाती है उस समय तक भारत में तांत्रिक साधना वाली संत परम्परा अवसान की ओर चल चुकी थी। यह कहानी सहजयानियों की तांत्रिक साधना से ऊपर होने का संकेत करती है। संत भीखा जी का समय 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध का है।

भुड़कुड़ा का मठ आज मुख्यतः भीखा जी महाराज के नाम से ही जाना जाता है। इस संत परम्परा और मठ की स्थापना औरंगजेब के शासन काल में हुई। आज यह जिस रूप में है वह बाद का है और इसका निर्माण, यहां एक सेवादार के अनुसार काशी के राजा के द्वारा कराया गया। हालांकि यह स्थल काफी प्राचीन है। पुरानी ईंटों का प्रयोग यहां के निर्माण में हुआ है। कुछ हिस्सों पर सीमेंट की परत नहीं चढ़ाई गई है जिसमें गुप्तकाल की ईंटों की उपस्थिति को देखा जा सकता है।
कुछ ईंट कुषाण काल के प्रतीत हो रही थीं, खासकर उसकी मोटाई। ये खंडित थीं। आप इस स्थल पर स्थित एक मकान की दीवार में ईंटों के प्रकार को देख सकते हैं जिसमें सबसे ऊपर की ईंट लाखौरी पैटर्न की है जबकि नीचे वाली संरचना में ईंट कई प्रकार की हैं।

भुड़कुड़ा के प्रथम संत बूला साहिब थे। बूला साहिब एक खेतिहर मजदूर थे। वह एक जमींदार गुलाल सिंह के यहां हल चलाते थे। यह जमींदार अपनी जमीन के विवाद को हल कराने के लिए दिल्ली के मुगल दरबार में गये। जमींदार अपनी सेवा के लिए बूला साहिब को दिल्ली साथ ले गये। जमींदार दिन भर खेत के मामले को सुलझाने की जुगत में लगे रहते थे और बूला साहिब खाली समय में उस समय के सूफी संत यारी साहब के सानिध्य में रहते थे।
यह माना जाता है कि यारी साहब बावरी संप्रदाय से जुड़े थे। बावरी सम्प्रदाय के बारे में इतना ही जिक्र मिलता है कि यह मुगल खानदान की एक स्त्री द्वारा अध्यात्म का रास्ता अपनाने के साथ अस्तित्व में आया। यह संप्रदाय योग की अवधारणा को स्वीकार करता था। यह कुछ हद तक सहजयानी संपद्राय के करीब था जिसमें सूफी संतों की अवधारणा जुड़ी हुई थी। योग का व्यवहार इसका हिस्सा माना जाता रहा है।

मुगल खानदान दिल्ली की ओर शाहजहां के शासनकाल में बसा। बावरी संप्रदाय यदि मुगल खानदान से जुड़ा है तब यह इसके पीछे के काल का नहीं होना चाहिए। लेकिन, यदि यह संप्रदाय निजामुद्दीन औलिया की परम्परा में आ रहा हो, जिसका घनिष्ट संबंध मुगल खानदान से बना रहा था तब इसे और पीछे ले जाया जा सकता है।
बहरहाल, सूफी परम्परा में स्थानीय भाषा, संस्कृति और धार्मिक चिन्हों को अपनाने की जोरदार परम्परा रही है जिसे यारी साहब की रचनाओं में भी देखा जा सकता है। यारी साहब की दो रचनाओं को पढ़ना उपयुक्त होगा-:
हमारे एक अलह पिय प्यारा है।।
घट घट नूर मुहम्मद साहब, जा का सकल पसारा है।
चौदह तबकजा की रूसनाई, झिलमिल जोत सितारा है।
बेनमून बेचून अकेला, हिंदू तुरुक से न्यारा है।
सोह दरवेस दरस निज पायो, सोई मुसलम सारा है।
आवै ना जाय मरै नहिं जीवै, यारी यार हमारा है।।
यहां एक और पद को देना उपयुक्त होगा जिसमें वह योग साधना की प्रक्रिया के बारे में लिख रहे हैं:
जोगी जुगति जोग कमाव।।
सुखमना पर बैठि आसन, सहज ध्यान लगाव।
दृष्टि सम करि सुन्न सोवो, आपा मेटि उड़ाव।
प्रगट जोति अकार अनुभव, सब्द सोहं गाव।
छोड़ि मठ को चलहूं जोगी, बिना पर उड़ि जाव।
यारी कहे यह मत बिहंगम, अगम चढ़ि फल खाव।।
इसी यारी साहिब के शिष्य बने संत बूला साहिब। वह जमींदार गुलाल सिंह के साथ वापस गांव आ गये लेकिन उनका मन यारी साहिब के उपदेशों पर टिक गया। वह खेत में हल चलाते हुए ध्यान में मग्न हो जाते। कई बार हल बैल छोड़कर योग साधना में लग जाते। एक खेतिहर मजदूर को जमींदार की गुलामी से मुक्त एक दुनिया मिल चुकी थी जिसका रास्ता अध्यात्म के रास्ते होकर जा रहा था।
एक दिन जमींदार गुलाल सिंह ने बाबा बूला साहिब पर उनके काम न करने को लेकर गालियों की बौछार किया, मारा-पीटा और काम से निकाल देने की धमकी दी। बूला साहिब अध्यात्म की दुनिया में इतना रम चुके थे। इस संदर्भ में कई और भी कहानियां हैं। जिसके मूल में यही है कि जमींदार को अपने इस किये बुरे व्यवहार पर गहरा पश्चाताप हुआ और अंततः उसने बूला साहिब का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया। यहीं से इस संत परम्परा की नींव पड़ी।
यहां ये रेखांकित करना ठीक रहेगा कि औरंगजेब के काल में जमींदारी व्यवस्था का पुनगर्ठन हुआ था जिसमें बड़े पैमाने पर हिंदुओं को जमींदारी दी गई थी। इसमें छोटे जमींदारों की संख्या काफी थी। इससे छोटे जमींदारों का उद्भव हुआ और साथ उत्पादन में भी वृद्धि हुई। इसी का नतीजा दिल्ली के मुगलों के अधीन केंद्रीय राज्य से अलग अवध राज्य का उद्भव हुआ।
अवध के नवाबों ने न सिर्फ बड़ी जमींदारियों की जमीनों का एक बार फिर से पुनर्गठन किया, खेतिहर जातियों को जमींदारी व्यवस्था का हिस्सा बनाया। इस दौर में मध्यवर्ती मानी जाने वाली जातियों की जमींदारी में हिस्सेदारी को देखा जा सकता है। इसमें से कुछ जातियों ने अंग्रेजी काल में खुद को राजपूत/क्षत्रिय के तौर पर नामांकित किया।
जमींदारों की इस नई व्यवस्था की टकराहट 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ खड़ी हुई और जो आने वाले समय में चलती रही। पूर्वांचल के इस इतिहास पर जितना काम होना था, उतना कभी नहीं हुआ।
संत भीखा जी महाराज इस परम्परा में तीसरे थे। इनकी परम्परा में आने वाले दो महान संत फैजाबाद के गोबिन्द साहब और अयोध्या के पल्टू साहब हैं। दिल्ली से चली यह संत परम्परा गाजीपुर के एक छोटे से गांव भुड़कुड़ा में विकसित हुई। यह अयोध्या, फैजाबाद, बाराबंकी, बलिया, आजमगढ़, वाराणसी और पटना तक फैलती गई।
हिंदू और मुसलमान जैसे विभाजन को नकारने वाली यह धारा जाति जैसी संरचना को स्वीकार नहीं करती है। यह अंधविश्वास और चमत्कार जैसे विधानों को स्वीकार नहीं करती है।
भुड़कुड़ा के मठ पर उनके सेवादार से बातचीत के दौरान एक परिवार अपने बच्चे को लेकर आया। वे उस सेवादार से आग्रह कर रहे थे कि बच्चे पर टोना-टोटका हुआ है, उस पर फूंक मार दें। सेवादार काफी धैर्य के साथ उनकी बात को सुनते रहे। वे अंधविश्वास को लेकर कई कहानियां सुनाते रहे। परिवार का फूंक मारने का आग्रह पहले से कम हुआ, लेकिन बात बनी नहीं। अंततः वे उठे और उस परिवार को संत भीखा जी की समाधि की ओर ले गये। उन्होंने उनसे उन्हें प्रणाम करने को कहा।
वह परिवार संतुष्ट था। परिवार चला गया। सेवादार बता रहे थे कि रोज ही ऐसे लोगों की काफी संख्या आती है। इस मठ के बारे में यह माना जाता है कि यह संतों की भूमि है तो जरूर लाभ होगा। मठ की शक्ति से लाभ हासिल करने का लोभ गांव के लोगों को यहां खींचकर लाता है। सेवादार बताते हैं ऐसी स्थिति में हमें समझाना भी होता है और बीच का रास्ता भी लेना होता है।
भुड़कुड़ा की इस मठ की संत परम्परा दिल्ली से शुरू हुई। इसके गुरू दिल्ली के संत यारी साहब थे। दिल्ली में इनकी समाधि कहां है, इसे मैं खोज रहा हूं। इसी दिल्ली में मुगल खानदान की एक स्त्री ने शाही जिंदगी से निकलकर सहज ज्ञान और जीवन का रास्ता चुना। इस जिंदगी पर चलते हुए उसने जीवन दर्शन का पथ बनाया। उसके नाम पर बावरीया संप्रदाय बना। यह संत बावरी कौन थीं, इस बारे में फिलहाल मुझे कुछ पढ़ने को नहीं मिला।
सहज ज्ञान, योग, ध्यान, प्रेम के रास्ते मुक्ति की यह संत परम्परा भुड़कुड़ा में आज भी जिंदा है और धर्म की नफरतों और अंधविश्वासों के बाजार में अब भी ज्ञान की बात कर रहा है। कभी समय मिले तब आप वहां ज़रूर पहुंचे। यह स्थल दुल्लहपुर रेलवे स्टेशन के पास है। नजदीकी रेलवे जंक्शन का नाम औड़िहार है जहां वाराणसी से गाजीपुर/मऊ रेलवे लाइन पर ट्रेन से चलते हुए पहुंचा जा सकता है।
अंत में संत भीखा जी की एक खूबसूरत रचना को पढ़ना उपयुक्त होगा जिसमें परम्परा के प्रति लगाव और जीवन की चुनौतियों के प्रति विनम्रता को पढ़ा जा सकता है:
भीखा केवल एक है, कृत्रि भयो अनन्त।
एकै आतम सकल घट, यह मति जानहि सन्त।।
एकै धागा नाम का, सब घट मनियां माल।
फेरत सोई सन्त जन, सतगुरू नाम गुलाल।।
(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)