मैं नोएडा के एक मुहल्ले में रहता हूं। आप अपार्टमेंट कह लीजिए। अपार्टमेंटों में तीन-चार फ्लोर्स होते थे, अब 30-32 भी होते हैं। अब 30-32 होंगे तो लिफ्ट भी तो होंगे। पहले, तीन-चार फ्लोर्स के जमाने में नहीं होते थे। इस तरह के भौतिक कारण, मंदिर होने के नहीं होते, पर हर अपार्टमेंट में मंदिर तो होते ही हैं। आप कहीं भी चले जाइए, नोएडा से नोएडा एक्सटेंशन तक या फिर ग्रेटर नोएडा तक। शायद पहले ऐसा नहीं होता होगा, गो अपार्टमेंट पहले भी होते थे।
जब से अपने देश में मुस्लिम आबादी दोयम दर्जे की बना दी गयी है, अपार्टमेंटों में दूसरे समुदायों के इबादतगाहों की जरुरत ही नहीं महसूस की गयी। पहले जरुरत महसूस की जाती रही होगी। यह भ्रम नहीं है, पूर्वी दिल्ली में ‘ताज अपार्टमेंट’ जैसे एकाध आल—मुस्लिम अपार्टमेंटों पर नजर पड़ चुकने पर भी। बस पिछले दशकों में मंदिरों की ऐसी बहुतायत हुई है कि दूसरे समुदायों के इबादतगाहों की गैर-मौजूदगी ने आंखों में उंगली डालकर इस गैर-मौजूदगी को स्प्ष्ट कर दिया है।
मुहम्मद अखलाक से लेकर पहलू खान, जुनैद खान से शुरू हुई हत्याओं का सिलसिला अब भी जारी है।
खबर है कि लगभग 370 रिपोर्टेड ‘हेट क्राइम्स’ में से 61 फीसदी में शिकार मुस्लिम थे और 2010 से 2017 तक गाय संबंधी घटनाओं और ‘काउ विजिलैंटिज्म’ की घटनाओं में से, विभिन्न शोध संस्थानों के अनुसार 91 फीसदी तो साहेब के केंद्र की सत्ता में आने के बाद ही हुई हैं, यद्यपि साहेब की हत्या की ‘ई-मेल आधारित साजिश’ के मामले में गिरफ्तार 15 से अधिक बुद्धिजीवियों में से कोई भी मुस्लिम नहीं था।
मार्टिन नीमोलर ने बहु—उद्धृत कविता में यों ही नहीं लिखा है कि:
सबसे पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आये
और मैं कुछ नहीं बोला,
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
फिर वे समाजवादियों के लिए आये,
मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं समाजवादी नहीं था।
यह हिटलर का यहूदी-मुक्त धरती का आह्वान था और रणनीति, यहूदी-समर्थन के नाम पर अपने हर विरोधी से निबटने की थी, ऐसे कि जब तानाशाह आपको लेने आये, आप जो ‘सबसे शुद्ध और महान कौम के प्रतिनिधि भी हों’ तो कोई हो ही नहीं, जो इसके विरोध में आवाज उठा सके।
मार्टिन नीमोलर की बहु-उद्धृत कविता की अंतिम पंक्तियां हैं:
फिर वे मुझे लेने आये,
और तब कोई बचा ही नहीं था
जो मेरे लिए बोल पाता।
तो कथा ऐसे ही एक अपार्टमेंट की है। हर सुबह और हर रात आप भी कम-ज्यादा टहलते होंगे। और टहलते होंगे तो कोई, कहीं मिल भी जाता होगा। और मिलता होगा तो मिल जानेवाले की भौतिक स्थिति जो भी हो, रहते तो अधिकतर लोग उसी मानसिक पर्यावरण में होंगे, उसी में रचे-बसे भी, जिनमें ये अपार्टमेंट हैं।
बल्कि अपार्टमेंट तो उनकी मानसिक संतानें ही है, जैसे खुद वे अपने राजनीतिक आकाओं के मन:प्रतिरूप। आप विचार-भिन्नता या विचार-शून्यता की बिना पर सबसे किनारा तो कर नहीं लेंगे और बातचीत करेंगे तो उसका चरित्र, उसका स्वभाव लगभग यही होगा –
एक ने कह दिया, ”आपने कहा कि जिसे हमने नहीं देखा, उसका तो अस्तित्व कभी हो ही नहीं सकता।” उन्होंने यह बात तब कही, जबकि अभी मिनट-दो मिनट पहले आपने चीख-चीखकर सवाल पूछा था कि ‘आपने तो अपने दादा को नहीं देखा। आप दुधमुंहा थे, तभी आपके दादा चल बसे थे। तब क्या आपके दादा कभी हुए ही नहीं थे, उनका कोई अस्तित्व ही नहीं था?’
यह आध्यात्मिक चर्चा होगी, ईश्वर के होने-न होने से शुरू हुई होगी और बाद में इतिहास और मिथक का एक घालमेल बन गया होगा।
दूसरे थोड़े राजनीतिक होंगे, बल्कि घनघोर ह्वाट्स-ऐपिया। अब ह्वाट्स-ऐपिया होंगे और सुबह-सबेरे हिन्दी का कोई ‘गोदी’ अखबार भी देखते होंगे, वर्तमान और भविष्य में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होगी, और हर बात में 10-12 साल से लेकर 10-12 हजार साल पहले तक के बारे में उनकी दिलचस्पी छलक-छलक पड़ती रही होगी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का या एक जो भारतीय जनता पार्टी हुआ करती थी, उसमें उनकी दिलचस्पी तो छोड़िए, उन्हें इसकी चिन्ता भी नहीं होगी कि साहेब और उनके चाणक्य ने जिसे ‘प्राइवेट लिमिटेड पार्टी’ में बदल दिया है, साहेब के जाने के बाद उसका क्या होगा?
साहेब ने भले स्वयं को नॉन-बायोलॉजिकल घोषित कर दिया हो, उन्हें पीएम नहीं रहने और फिर भी जीवित बचे रहने की चिन्ता तो रहती होगी, जबकि उनके सभी भक्तों की ही तरह दूसरे पड़ोसी को भी भरोसा होगा कि साहेब सदियों यों ही रहेंगे और पीएम भी। आप हिटलर और जोसफ गोयबल्स की भयावह आत्महत्याओं के बारे में उन्हें लाख बताते रहें, वह अपनी पर टिके रहेंगे।
और गलती से भी आपके ऐसे पड़ोसी कभी कुछ पढते नहीं होगे, बल्कि सुनते भर होंगे। हर बात में कहते होंगे कि ‘मैंने सुना है, मैंने सुना है… ‘
दोनों समझिये ऐसे ही किसी अपार्टमेंट में होंगे, टावर भले कोई और होगा। सूर्य की वलयाकार गति के कारण धूप भी आहिस्ता-आहिस्ता टावरों तक पहुंचती होगी। और दोनों धूप के लोभ में किसी-टावर की लॉबी के बाहर रखे बेंचों पर दोपहर एक बजे के आसपास बैठकी जमा लेते होंगे।
दूसरा समझिये आपको एक टावर पहले मिला होगा, क्योंकि जब आप निकले थे, धूप तब तक उस टावर की बेंचों तक नहीं पहुंची थी और आप एक टावर पहले ही बैठ गये थे। दूसरे तमाम भक्तों की तरह ही दूसरा पड़ोसी भी साहेब की गड़बड़ियों से, उनकी भूलों-गलतियों से, उनके अपराधों से इंकार नहीं करता होगा, पर ये सब उसे मालूम नहीं। आप ‘प्वाइंट आउट’ करेंगे तो वह इंकार नहीं करेगा, पर वह उन पर ठहरेगा भी नहीं।
दूसरे ने समझिये आप पर आरोप लगाया कि आप कांग्रेस को और तमाम दूसरे दलों को ‘परफेक्ट’ मानते हैं। यह तब होगा, जब खुद आप कई लोगों से और पहले स्वयं उनसे भी कई बार प्रसंगवश कह चुके होंगे कि कैसे सोनिया गांधी की नजदीकी और उनके समर्थन के कारण ही, ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद मनरेगा लागू कर सके, जबकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो इसके सख्त खिलाफ थे।
आप कह चुके होंगे कि कैसे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और लोकसभा में लगभग 60 सदस्यों वाली वाम पार्टियों के विरोध और सरकार के अल्पमत में आ जाने के जोखिम के बावजूद पीएम मनमोहन सिंह ने अमरीका के साथ परमाणु समझौता किया और वाम दलों की समर्थन वापसी के बाद भी ‘भ्रष्ट’ तरीकों से सरकार बचा ली।
और कैसे जी-न्यूज के मालिक सुभाषचंद्रा ने कांग्रेस के मनमोहन सिंह के ही समय में समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज आफ इंडिया गैर-कानूनी तौर पर खरीद ली और केवल 40 करोड़ रुपये के इस सौदे के लिए मनमोहन सरकार के कई मंत्रियों को नकद और दूसरे तरीकों से ‘रिश्वत’ दी गई।
यानि कि विरोध में आपके सवालों के बाद भी एक पड़ोसी ने आपके मुंह में डाल दिया कि ‘जिसे आपने नहीं देखा, उसका अस्तित्व आप कभी मान नहीं सकते’ और साहेब के ठीक पहले, कांग्रेस सरकार की गड़बड़ियों, भूल—गलतियों और अपराधों के बारे में स्वयं आपके उदाहरणों के बावजूद दूसरे पड़ोसी ने आरोप लगा दिया कि ‘भाजपा को छोड़ कांग्रेस और दूसरे दलों को आप किसी भी दोष से मुक्त मानते हैं। सारे अपराध, सारे जुर्म आपको साहेब की सरकार में ही दिखते हैं।’
कमाल ये कि इस उलटबासी के बाद भी दोनों पड़ोसी झूठ नहीं बोल रहे होंगे। या कम-से-कम दोनों को लग रहा होगा कि वे कुछ भी झूठ/गलत नहीं कह रहे हैं, उन्हें सचमुच लग रहा होगा कि आपके बारे में दोनों की जो राय रही थी, वह कतई असत्य नहीं थी।
संभव है, सभी मनुष्यों को भक्तों के जो झूठ दिखते हैं, खुद भक्तों को उनमें कोई झूठ, कोई असत्य, कुछ भी गलत न दिखता हो। इस अर्थ में भक्तों का असत्य, उनके भगवानों के झूठ से बिल्कुल अलग है – भगवानों का, साहेब और उनके चाणक्य का झूठ एक रणनीति है।
यह जरुरी है, आक्सीजन की तरह, साहेब और उनके चाणक्य और उनके तमाम लगुए-भगुए दिन भर में 100 झूठ न बोलें तो वे मर जायेंगे, जैसे आक्सीजन के बिना अधिकतर जीव-जंतु मर जाते हैं। भक्तों का असत्य खुद उन्हें असत्य नहीं दिखता। इस अर्थ में असत्य बोलता हुआ भक्त, भगवानों के झूठ का शिकार है, झूठ फैलानेवाले उनके अमितों, उनके गोदी पत्रकारों, उनके ह्वाट्स-ऐप संदेशों और उनके तमाम टूलों का शिकार।
आप भक्त पर केवल दया कर सकते हैं, जैसे उन्हें शिकार करनेवाले तमाम टूलों से क्रोध, क्योंकि यही आपको लड़ाई के लिए प्रेरित करेगा।