आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबोले द्वारा मुसलमानों से “सूरज और नदी की पूजा” करने की सलाह कोई आकस्मिक जुबान फिसलन नहीं है। बल्कि वेदों की मूल भावना से विचलन और एक तरह की बौद्धिक मूर्खता है।
यह बयान उस गहरी वैचारिक समस्या का लक्षण है, जिसमें वेदों की दार्शनिक परंपरा, संविधान की धर्मनिरपेक्ष चेतना और राजनीतिक हिंदुत्व—तीनों को जानबूझकर गड्ड-मड्ड कर दिया जाता है। परिणाम यह होता है कि न वेद बचे रहते हैं, न संविधान—केवल वर्चस्व की भाषा बचती है।
यहां यह समझना ज़रूरी है कि हिन्दू धर्म को मूल रूप से वैदिक धर्म के रूप में परिभाषित किया जाता रहा। वेदों के एकेश्वरवादी भावना की सर्वोच्चता की पैरवी करने वाला संघ धीरे-धीरे मुस्लिम विरोध में मूर्ति पूजा के लिए अभियान इसलिए चला रहा ताकि इस बहाने इस्लाम के एकेश्वरवाद पर वर्चस्व बना सके।
आइए देखते हैं मूल वैदिक धर्म के स्रोत वेदों और उपनिषदों में एकेश्वरवाद के बारे में क्या निर्देश हैं
1. वेद क्या कहते हैं—और क्या नहीं कहते
वेद और उपनिषद् वैदिक भारतीय परंपरा के सबसे पुराने, सबसे गहन और सबसे बौद्धिक ग्रंथ हैं। उनमें ईश्वर कोई मूर्ति, कोई ग्रह, कोई नदी या कोई दृश्य वस्तु नहीं है। वे साफ़ कहते हैं—
“न तस्य प्रतिमा अस्ति”
उस परम सत्ता की कोई प्रतिमा नहीं है।
“अकायम्”
वह देह और आकार से परे है।
“नेति नेति”
वह यह नहीं, वह यह भी नहीं।
और कठोपनिषद् तो यहाँ तक कहता है कि सूर्य स्वयं उस ब्रह्म के प्रकाश से प्रकाशित होता है—
तो सूर्य की पूजा, ईश्वर-पूजा कैसे हो सकती है?
इसलिए जब कोई स्वयं को “वैदिक परंपरा” का प्रतिनिधि बताकर सूर्य और नदी की पूजा का उपदेश देता है, तो वह दरअसल वेदों को ही नकार रहा होता है। यह वैदिक नहीं, बल्कि वैदिकता का सरलीकरण और विकृतिकरण है।
2. संविधान और उपनिषद्—अप्रत्याशित समानता
अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि भारतीय संविधान “पश्चिमी” है और वेद–उपनिषद् उससे अलग हैं। जबकि सच्चाई इसके उलट है।
संविधान धर्मनिरपेक्ष है—
अर्थात राज्य किसी एक धार्मिक प्रतीक, पद्धति या आस्था को थोप नहीं सकता।
उपनिषद् भी यही कहते हैं—
ईश्वर किसी एक रूप, नाम या प्रतीक में सीमित नहीं किया जा सकता।
संविधान नागरिक को आस्था की स्वतंत्रता देता है,
उपनिषद् मनुष्य को विचार और अनुभव की स्वतंत्रता।
इस दृष्टि से देखें तो होसबोले का बयान संविधान-विरोधी ही नहीं, उपनिषद-विरोधी भी है। वह राज्य और समाज को उस रास्ते पर ले जाना चाहता है, जहाँ बहुसंख्यक प्रतीक अलिखित आदेश बन जाते हैं।
3. आरएसएस और उपनिषदिक परंपरा के बीच खाई
आरएसएस बार-बार वेदों का नाम लेता है, लेकिन उसका वैचारिक ढाँचा उपनिषदों से नहीं, बल्कि पहचान-आधारित राजनीति,अनुशासनात्मक आज्ञा और प्रतीक-केंद्रित धार्मिकता से संचालित होता है।
उपनिषद् प्रश्न पूछते हैं— आरएसएस उत्तर थोपता है।
उपनिषद् व्यक्ति को सोचने देते हैं— आरएसएस व्यक्ति को ढालने की कोशिश करता है।
होसबोले का बयान इसी खाई का परिणाम है—जहाँ दार्शनिक एकेश्वरवाद की जगह सांस्कृतिक वर्चस्व आ बैठता है।
4. मुसलमानों से यह कहना क्यों खतरनाक है?
मुसलमानों से सूर्य और नदी की पूजा करने को कहना न संवाद है, न समन्वय। यह कहना असल में यह जताना है कि,
“हमारी धार्मिक कल्पना श्रेष्ठ है, तुम्हें उसी के अनुसार ढलना होगा।”
क्या होसबोले यह नहीं जानते कि इस्लाम का एकेश्वरवाद और उपनिषदों का निराकार ब्रह्म—दार्शनिक रूप से एक-दूसरे के काफी निकट हैं। सभी अब्राहम मज़हब एकेश्वरवाद की मान्यता की स्थापना करते है, भारत में एकेश्वरवाद की उस साझा जमीन पर बात करने के बजाय, जानबूझकर ऐसे प्रतीक चुनना हैं जो दूरी बढ़ाते है, समानता और समन्वय नहीं। इसीलिए पूरे मुल्क में संघी और उसके जुड़े संगठन दूरी बनाने के एक्शन कर रहे हैं। होसबोले का यह बयान ऐसे विभेदकारी घटनाओं को बढ़ावा देगा।
यह बयान मुसलमानों को नहीं बदल सकता, हां यह भारत की बौद्धिक परंपरा को संकुचित करेगा जिससे मुल्क की इमेज पर धब्बा लगेगा।
असली सवाल आस्था का नहीं, सत्ता का है-यह विवाद धर्म का नहीं है। यह वेद बनाम इस्लाम का भी नहीं है।
यह सवाल है—क्या वेदों का इस्तेमाल ज्ञान के लिए होगा, या वर्चस्व के लिए? जब वेदों को न समझकर उनका राजनीतिक हथियार बनाया जाता है, तो नुकसान किसी एक समुदाय का नहीं होता— नुकसान उस परंपरा का होता है, जिसने कभी कहा था— सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से जानते हैं।
तो होसबोले और आरएसएस इस मामले में गलत ट्रैक पर हैं। उनको अपनी ग़लती सुधारते हुए एकेश्वरवादी बनकर किसी तरह की मूर्ति पूजा से बचना चाहिए। और ना किसी को डिक्टेट करते हुए किसी की आस्था को चैलेंज करना चाहिए।
यहां गांधीजी की बात को समझना ज़रूरी है, गांधी जी को पक्का हिन्दू सनातनी कहा जाता है, उन्होंने वेदों की इस भावना के अनुरूप सभी धर्मों संस्कृतियों के समन्वय के लिए काम किया। भारतीय आश्रम परम्परा में उन्होंने ऐसे आश्रम आरंभ किए जिसमें धर्म नस्ल, जाति से परे इंसानियत को आधार बनाकर सामाजिक आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास के लिए रास्ता बनाया था। उनके आश्रमों में सभी धर्मों में वर्णित एकेश्वरवाद और इंसानियत की बातों को कहा और पढ़ा जाता है ऐसी ही प्रार्थनाएं होती है।
यही संविधान का मंतव्य भी है
आज जरूरत इस बात की है कि गांधीवादी दृष्टि से भारत में संविधान की मूल भावना के अनुरूप समाज में समन्वय बनाया जाए ना कि किसी धार्मिक दृष्टिकोण के वर्चस्व को प्रचारित और प्रसारित करने की।
तो होसबोले गलती पर हैं, इसीलिए होसबोले को नाम के अनुसार अच्छा बोलते हुए भारतीय एकता और समन्वयवादी परम्परा को मजबूत करना चाहिए। भारत के समन्वयवादी सोच के लोग होसबोले के इस बयान और सोच की निंदा करेंगे।
इस्लाम हुसैन
(पत्रकार लेखक इस्लाम हुसैन देश की गांधीवादी शीर्ष संस्था सर्व सेवा संघ वर्धा की राज्य इकाई उत्तराखंड सर्वोदय मण्डल के अध्यक्ष हैं।)