इस दौर में जबकि मुल्क में बहुत से मसायल/समस्याएं आम आदमी को परेशानी की वजह बनी है, कुछ मसलों और बाहरी दबाव से आम आदमी की जिंदगी और अस्तित्व तक ख़तरे में है ऐसे ख़तरनाक वक्त में मीडिया ने आस्तिकता पर बहस की मुर्गा लड़ाई रखकर सत्ता के लिए कम्फर्ट जोन बना दिया है।
अस्तित्ववाद और नास्तिकवाद की हालिया बहस इसी मुर्ग़ा लड़ाई की कड़ी है। जिससे वास्तविक मुद्दों से बखूबी ध्यान हटा दिया जाता है।
जावेद अख्तर और एक मुफ्ती की बहस के नतीजों से समाज को क्या मिला गया। सिवाय ज़हनी अय्याशी (मानसिक विलासिता) के।
ना तो जावेद ने आस्तिकवाद को स्वीकार किया और न मुफ्ती ने नास्तिकता के तर्क मंजूर किए। अलग अलग नज़रिए से दोनों के समर्थक अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। इधर मुसलमानों के विरोध में 33 करोड़ देवी देवताओ को मानने वाले समाज का एक हिस्सा भूतपूर्व मुसलमान को बहस में जीतता हुआ देखकर परपीड़न का सुख चाह रहा था।
ऐसे लोगों को शायद नहीं मालूम कि जावेद अख्तर उस परिवार से आते हैं जो मुस्लिम फिलासफी के इल्मे मंतक (तर्क शास्त्र) और इल्मे रियाज़ी (गणित) परम्परा का वाहक था। उनके परदादा और खानदान के बुजुर्ग इल्मे मंतक और इल्मे रियाज़ी से आस्तिकवाद को सिद्ध करते रहे होंगे। क्योंकि इस्लाम के सुतून और पूरी फिलासफी एकेश्वरवादी आस्तिकता पर है।
ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसमें यह कहा गया हो कि जावेद अख्तर के परदादा अल्लामा फ़जले हक़ खैराबादी या उनके किसी बुजुर्ग ने एकेश्वरवाद और आस्तिकता के सुतून नमाज की इंकारी की हो।
अगर जावेद अख्तर को अपने बुजुर्गों की इस विरासत पता होता तो शायद वो इस बहस में हिस्सा नहीं लेते। दूसरी तरफ मुफ्ती शमायल क़ासमी नदवी मुफ्ती तभी बने होंगे जब वो इल्मे मंतक (तर्कशास्त्र) पढ़ कर मुफ्ती की डिग्री पास कर ली होगी। इस तरह देखा जाए तो यह मुकाबला बराबरी का नहीं था। बहस के बारे में आई प्रतिक्रिया देखकर लगता है जावेद अख्तर इल्मे मंतक से नावाकिफ थे।
वैसे यह बहस आज की नहीं है मुस्लिम मुफ्ती और विद्वान पिछले सैकड़ों सालों में दूसरे धर्मों और सम्प्रदायों के साथ ऐसी बहसें कर चुके हैं। आज भी मुस्लिम समाज में बहस करना एक ज़रूरी शगल है।
यहां यह जानना ज़रूरी है कि मुस्लिम संस्कृति और समाज में ऐसी बहस जिसे हिन्दी संस्कृत में शास्त्रार्थ या अरबी फारसी में मुनाज़रा कहा जाता एक लम्बी परम्परा है। मुस्लिम समाज में इन मुनाज़रों ने तब सकारात्मक दिशा दी जब इसका मक़सद इल्मी बहस को समाज की यकजहती, शिक्षण और इंसानी उरूज/विकास में शामिल करना था।
तो दूसरी तरफ़ इन मुनाज़रो ने मुस्लिम समाज में गहरा विभाजन भी बढ़ाया, कभी कभी यह मुनाज़रे मुस्लिम समाज और मुल्क के लिए तबाहकुन (विनाशकारी) भी हुई है। पांच सौ साला खिलाफते अब्बासी की तबाही में बगदाद में दजला नदी के किनारे रात रात होने वाले फुजूल के मुनाजरे भी जिम्मेदार थे।
आज भी बेकार के फिरकेवाराना मुनाजरों (और मुशायरों) का समाज में कोई पाज़िटिव रोल नहीं है। सुन्नी मसलक के दो फिरकों में सन् 1905 से चली बहस आजतक बेनतीजा और गहरे इख़्तेलाफात की वजह बनी हुई है।
मानव सभ्यता के इतिहास में मुनाज़रा और शास्त्रार्थ को सच्चाई को खोजने जानने का का जरिया माना गया है। विचारों का टकराव, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता सवाल करने की आज़ादी और उसके मतभेद सुलझाने की कोशिश—इन सबने बौद्धिक परंपराओं को समृद्ध किया। लेकिन इतिहास यह भी दिखाता है कि यही परंपरा कई बार अपने मूल उद्देश्य से भटककर वर्चस्व, पहचान और सत्ता संघर्ष का औज़ार बन गई। ऐसा भारत से लेकर योरोप और मध्य एशिया में सदियों से होता आ रहा है।
प्राचीन भारत में शास्त्रार्थ की परंपरा;
भारत में शास्त्रार्थ की जड़ें वैदिक और उपनिषदिक काल तक जाती हैं। उस समय प्रश्न थे—ब्रह्म क्या है, आत्मा क्या है, कर्म और मोक्ष का संबंध क्या है।
ईसा पूर्व छठी सदी में बौद्ध और जैन परंपराओं के साथ ये बहसें और तेज़ हुईं। बुद्ध और महावीर ने वैदिक कर्मकांड, यज्ञ और वर्ण-आधारित श्रेष्ठता को चुनौती दी। इस दौर में शास्त्रार्थ का स्वर अपेक्षाकृत नैतिक और दार्शनिक था।
लेकिन जैसे-जैसे धार्मिक संस्थाएँ मज़बूत हुईं और राजाश्रय मिलने लगा, शास्त्रार्थ का उद्देश्य बदलने लगा। अब बहस केवल सत्य की खोज नहीं रही, बल्कि परंपरा की रक्षा और प्रतिद्वंद्वी के निषेध का माध्यम बन गई।
एकेश्वरवाद और बहुदेवतावाद की बहस;
आस्तिकता की बहस के अलावा एकेश्वरवाद और उपनिषदों का अद्वैतवादी चिंतन या यूं कहा जाए “सत्य एक है” और पुराणों की बहुदेववादी परंपरा—“सत्य अनेक रूपों में प्रकट होता है”—भारतीय दर्शन की दो धाराएँ रहीं। यह बहस तब तक सार्थक थी जब तक यह दार्शनिक स्तर पर रही।
समस्या तब शुरू हुई जब यह बहस पूजा-पद्धति, धार्मिक श्रेष्ठता और सामाजिक पहचान से जुड़ गई। दर्शन पीछे छूट गया और प्रश्न यह हो गया कि किसका धर्म अधिक शुद्ध और प्रामाणिक है। इस मोड़ पर शास्त्रार्थ ने समाज को जोड़ने के बजाय बाँटना शुरू किया।
जैन–बौद्ध और ब्राह्मण परंपरा का टकराव;
जैन और बौद्ध परंपराओं ने अहिंसा, करुणा और तप पर ज़ोर दिया, जबकि ब्राह्मण परंपरा कर्मकांड और सामाजिक संरचना की रक्षा में लगी रही। यह टकराव केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सामाजिक सत्ता और संसाधनों से भी जुड़ा था।
धीरे-धीरे शास्त्रार्थ का स्वर नैतिक विमर्श से हटकर सामाजिक नियंत्रण और धार्मिक प्रभुत्व की ओर बढ़ गया। इसका परिणाम यह हुआ कि संवाद की जगह बहिष्कार और वर्चस्व ने ले ली।
शैव–वैष्णव परंपराएँ और भक्ति का विभाजन;
मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन ने व्यक्तिगत आस्था और भावनात्मक जुड़ाव पर बल दिया। लेकिन शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच हुई बहसों ने दिखाया कि भक्ति भी विभाजन से अछूती नहीं रही।
शास्त्रार्थ अब केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मंदिरों, यात्राओं और सार्वजनिक जीवन तक फैल गया। भक्ति की भाषा में भी संप्रदायिक प्रतिस्पर्धा स्पष्ट दिखने लगी।
इस्लामी दुनिया में मुनाज़रे: एक तुलनात्मक दृष्टि;
इस्लामी इतिहास में भी मुनाज़रे की परंपरा रही है। अब्बासी काल में अक़्ल और वह्य, फ़िक़्ह और फ़लसफ़ा, सुन्नी और शिया के बीच बहसें हुईं। प्रारंभ में ये बहसें बौद्धिक उन्नति का कारण बनीं।
लेकिन जब ये बहसें आम जनता तक पहुँचीं और सत्ता से जुड़ गईं, तो समाज भीतर से कमजोर होने लगा। बग़दाद का पतन इस बात का प्रतीक है कि जब आंतरिक विवाद बाहरी ख़तरों से बड़ा बन जाए, तो सभ्यताएँ टिक नहीं पातीं।
मुस्लिम काल में शिया सुन्नी के मुनाजरे चला करते थे इससे कुछ सकारात्मक बदलाव आया हो ऐसा मौजूदा दौर को देखकर तो नहीं लगता।
पहली जंगे आजादी के बाद मुस्लिम समाज में फिरकों पर बहस शुरू हुई जो आजतक बेनतीजा चल रही है। इन बहसों से मुस्लिम समाज में गहरा विभाजन हुआ। सुन्नियों के दो फिरकों में 20वी सदी के शुरुआती दौर से चली आ रही फिरकेवाराना बहस से मुस्लिम समाज गहराई से अलग-अलग हिस्सों में तक़सीम किया हुआ है जिसके नतीजे में आज मुस्लिम समाज अपनी दिफा करने में क़ासिर है।
औपनिवेशिक भारत: आर्य समाज और सनातन परंपरा;
19वीं और 20वीं सदी में भारतीय समाज ख़ासकर बहुसंख्यक हिन्दू समाज गहरे संकट में था। जाति प्रथा, छुआछूत स्त्री अधिकार व शिक्षा, सामाजिक पिछड़ापन और औपनिवेशिक शोषण जैसे प्रश्न सामने थे। इस दौर में आर्य समाज और सनातन परंपरा के बीच तीखी वैचारिक बहसें हुईं।
आर्य समाज ने वेदों की ओर लौटने और मूर्तिपूजा के विरोध को सुधार का मार्ग बताया, जबकि सनातन परंपरा ने लोकधर्म और परंपरा की रक्षा पर ज़ोर दिया। यह बहस समाज सुधार से अधिक धार्मिक पहचान पर केंद्रित होती चली गई, जिससे मूल सामाजिक प्रश्न हाशिए पर चले गए। और यह प्रश्न अभी भी समाज के सामने खड़े हैं। और सत्ता केंद्रों और उनसे जुड़े संगठनों को लगातार खाद पानी दे रहे हैं।
ईसाई और यूरोपीय समाज में धार्मिक और दार्शनिक बहसों की परंपरा;
ईसाई समाज और यूरोपीय बौद्धिक इतिहास में भी मुनाज़रे और शास्त्रार्थ जैसी बहसों की एक लंबी परंपरा रही है। मध्यकालीन यूरोप में यह परंपरा स्कोलास्टिकवाद के रूप में विकसित हुई, जहाँ धर्मशास्त्र, दर्शन और तर्कशास्त्र आपस में जुड़े।
मध्यकालीन चर्च और तर्क, चर्च के भीतर यह प्रश्न केंद्रीय रहा कि आस्था और तर्क का संबंध क्या है। ईश्वर को तर्क से समझा जा सकता है या केवल विश्वास से।
थॉमस अक्विनास जैसे विद्वानों ने अरस्तू के तर्कशास्त्र को ईसाई धर्मशास्त्र से जोड़ने का प्रयास किया। इस दौर में विश्वविद्यालयों में डिस्प्यूटेशन (औपचारिक बहस) शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा थे।
बहसों का संकट;
लेकिन जैसे-जैसे चर्च की सत्ता मज़बूत हुई: गहरे दार्शनिक मतभेद उभरे, एक दूसरे पर विधर्म के आरोप लगे जैसे शैव वैष्णव और शिया सुन्नी की बहसों में लगे और फिर जो पक्ष मजबूत या सत्ता संरक्षित था उसने कमजोर पक्ष का दमन तेज़ होते गए।
गैलीलियो जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि जब बहस सत्ता से टकराई, तो संवाद की जगह दंड ने ले ली।
सुधार आंदोलन और नई बहसें;
16वीं सदी में प्रोटेस्टेंट रिफ़ॉर्मेशन ने बहसों को नया मोड़ दिया: चर्च बनाम व्यक्ति। पोप की सत्ता बनाम ग्रंथ की सर्वोच्चता वगैरह। इससे ईसाई समाज में गंभीर विभाजन पैदा हुआ, लेकिन साथ ही चर्च की एकाधिकारिता टूटी।
ज्ञानोदय और सीमाएँ;
ज्ञानोदय के दौर में बहसें धर्म से निकलकर राजनीति, विज्ञान, मानवाधिकार तक पहुँचीं। यहीं से यूरोपीय समाज ने यह सीखना शुरू किया कि: हर बहस धार्मिक नहीं हो सकती और हर सत्य धार्मिक मंच पर तय नहीं किया जाना चाहिए।
मुनाज़रा और शास्त्रार्थ का औचित्य;
सभी समाजों की तारीख यह नहीं बताती कि बहस बेकार और गैर ज़रूरी है। बहस तब तक उपयोगी है जब तक वह, प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देती है जड़ता को चुनौती देती है। और आत्मालोचना को संभव बनाती है। लेकिन जब बहस आत्मसंतोष, श्रेष्ठता बोध और दूसरों को नीचा दिखाने या परपीड़न का ज़रिया बन जाए, तो वह समाज को आगे नहीं, पीछे ले जाती है।
मुनाज़रा और शास्त्रार्थ मानव बौद्धिक इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनका मूल्य परिणाम से तय होता है, शोर से नहीं। और बहस के नतीजे लम्बा वक्त चाहते हैं इसलिए हर बहस से तुरंत ही नतीजे निकालने का कोई फायदा नहीं है।
तुरत फुरत के फौरी नतीजे तो आपसी कशीदगी, मारपीट, सिरफुटव्वल से लेकर एफआईआर और बुलडोजर तक जाते हैं।
जब बहस करुणा, न्याय और सामाजिक ज़िम्मेदारी से जुड़ती है, तो वह प्रगति का साधन बनती है।
और जब वह केवल पहचान और वर्चस्व की लड़ाई बन जाती है, तो वह सभ्यताओं को भीतर से खोखला कर देती है।
आज के दौर में इतिहास हमें यही सिखाता है कि, बहस से पहले समझ, और तर्क से पहले उत्तरदायित्व ज़रूरी हो।
(पत्रकार-लेखक इस्लाम हुसैन इस्लाम के जानकार होने के साथ साथ समकालीन धार्मिक विश्वासों के अध्येता हैं।)