‘अरावली बचाओ आंदोलन’ की तेज़ होती मुहिम और आम आदमी का आक्रोश

मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश। अरावली पर्वत श्रृंखला को बचाने की मुहिम तेज़ होने के साथ पूरे देश में फ़ैल एक जन आंदोलन का रुप लेने को आतुर होती हुई दिखाई देने लगी है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक लोग इसे एक अच्छी पहल तो बताते ही हैं, सरकार की पर्यावरण विरोधी सोच-मंशा पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहते हैं कि आखिरकार, “यह सरकार उन जंगलों पहाड़ों, पेड़ों के प्रति इतनी निष्ठुर और असंवेदनहीन कैसे हुई है जिनका नाता हमारे जीवन और संस्कृति से जुड़ा हुआ रहा है।”

देश की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत, थाती को संभालकर रखने को कौन कहे यह तो उन्हें एक दम से नष्ट करने पर तुली हुई है।

विकास वादी सोच और कॉरपोरेट घरानों, पूंजिपतियों के हाथों बिकी यह सरकार क्या यह भी भूल बैठी है कि कोरोना काल में इसी पर्यावरण (हरे-भरे पेड़ों, पहाड़ों) ने चेताया था कि हम सुरक्षित हैं तो सारा जग सुरक्षित है, वरना यह ‘विकास रुपी हवेली’ और ‘कंक्रीट के कालोनी’, कुछ भी नहीं है, बावजूद इसके इन्हें नज़र अंदाज़ करते हुए जंगलों-पहाड़ों की कुर्बानी जिस तेज़ी के साथ देश के विभिन्न हिस्सों में शुरू किए गए हैं वह निकट भविष्य के लिए शुभ संकेत तो नहीं कहें जा सकतें हैं।

अरावली पर्वत को बचाने की आवाज़ मिर्जापुर में भी गूंजी 

अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए आगे आए लोगों के समर्थन में खड़े हुए उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में  प्रगतिशील युवा मंच के कार्यकर्ताओं संग अधिवक्ताओं ने सोमवार, 22 दिसंबर को जिला मुख्यालय पर ज़ोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के बाद मंच की ओर से प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपकर अरावली पर्वत को सुरक्षित और संरक्षित करते हुए राष्ट्र और समाज हित में इसे बचाने की गुहार लगाई गई।

कहा गया कि, “अरावली पर्वतमाला सिर्फ एक पर्वत पहाड़ ही नहीं बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ा हुआ है, जिसकी जड़ें सम्पूर्ण देश व मानव जीवन से लेकर उन तमाम प्राणियों से जुड़ी हुई हैं जिन्हें शुद्ध हवा और पानी के साथ जीवन हितकारी आक्सीजन प्रदान करता है। जिसे संरक्षित और सुरक्षित बनाए रखने का काम सरकार का है। यदि सरकार इसे संरक्षित नहीं कर पा रही है तो यह उसकी घोर नाकामी ही कही जाएगी।”

प्रगतिशील युवा मंच मिर्ज़ापुर के अध्यक्ष एडवोकेट आयुष सिंह कहते हैं, “अरावली पर्वत श्रृंखला सिर्फ़ और सिर्फ़ एक पर्वत श्रृंखला मात्र ही नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत की जीवन रेखा भी है। ऐसे में 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को अगर पर्वत श्रृंखला का हिस्सा नहीं माना जाएगा तो बड़े पैमाने पर अरावली पर्वत श्रृंखला के नष्ट होने की आशंका है। जिसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ना तय है।”

वह अपनी बात पर जोर देते हुए बोलते हैं, 

“यही अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल की रेत, लू और धूल भरी आंधियों को दिल्ली, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के उपजाऊ इलाकों तक पहुंचने से रोकती है। यहीं अरावली भू-जल को रिचार्ज करती है। जंगलों और वन्यजीवों को आश्रय देती है। करोड़ों लोगों को सांस लेने लायक हवा हवा उपलब्ध कराती है, ऐसे में इस बहुमूल्य पर्वत श्रृंखला को बचाना समस्त देश के हित में होगा।”

अवैध खनन और अतिक्रमण के कारण पिछले दो दशकों में अरावली का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुका है। प्रगतिशील युवा मंच ने मांग कि है कि पूरी अरावली पर्वतमाला को उसके संपूर्ण भू-आकृति सीमा में महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय क्षेत्र घोषित किया जाए, सभी प्रकार के खनन और रियल इस्टेट गतिविधियों पर सख्त रोक लगाई जाए।

100 मीटर ऊंचाइयों वाली नई परिभाषा को वापस लिया जाय और समुदायों व पर्यावरण विशेषज्ञों की भागीदारी से एक मजबूत संरक्षण मॉडल विकसित किया जाए। सरकार से अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व की रक्षा की गुहार लगाई गई।

 निशाने पर अडानी और सरकार की विध्वंसकारी सोच

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में अरावली पर्वत माला को बचाएं जाने की उठीं मांग के कई मायने देखे जा रहे हैं। मिर्ज़ापुर में अडानी के अधीन वाले कंपनी का थर्मल पॉवर प्लांट प्रस्तावित है। पर्यावरण मानकों की पूरी तरह से अनदेखी करते हुए आए इस थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट को प्रस्तावित करने के लिए पूरा तंत्र चाहे वह कंपनी का हो या शासन सत्ता से जुड़ा हुआ हो एड़ी-चोटी एक कर दिया है।

गुपचुप जनसुनवाई कार्यक्रम आयोजित करने से लेकर, वन भूमि में जहां आम आदमी का जाना कठिन होता है, वहां देखते ही देखते 10/12 किमी लंबी दिवार का खड़ा हो जाना शुरू से ही इसे विवादास्पद बनाते हुए आया है, बावजूद इसके पर्यावरण संरक्षण पर काम करने वाले संगठन के युवा कार्यकर्ताओं का दृढ़ विश्वास और संकल्प डटकर इनका (अडानी के थर्मल पॉवर प्लांट का) विरोध करते हुए आया है। 

मिर्ज़ापुर में अरावली पर्वतमाला को बचाने को लेकर उठी आवाज़ भले ही छोटी दिखाई देती हो, लेकिन इसके मायने बड़े दिखाई दे रहे हैं। आंदोलन कोई भी वह छोटे स्तर से ही शुरू होकर एक वृहद आकार लेता है। अरावली पर्वतमाला को बचाने को लेकर जिस प्रकार से पूरे देश में विभिन्न हिस्सों से आवाज उठी है उससे पर्यावरण प्रेमियों को काफी बल मिला है।

बात करते हैं यदि मिर्जापुर जिले की जो जंगलों और ऊंचे पहाड़ों से घिरा हुआ अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए विख्यात रहा है पहले ही अंधाधुंध खनन कारोबार की कमाई ने इसे नष्ट कर कुरुप बना दिया है। बची हुई कसर को लेकर अब अडानी के स्थापित होने वाले थर्मल पॉवर प्रोजेक्ट से लोग आशंकित हुए हैं।

मिर्ज़ापुर जिले में तेज़ी के साथ जंगलों पहाड़ों के नष्ट होने से लेकर लुप्त होते हुए आएं दुर्लभ वन्य जीवों की घटती संख्या ने लोगों को सोचने पर विवश किया है कि, ऐसे ही अंधाधुंध खनन, क्रेशर प्लाटों की शोर, जंगलों पहाड़ों, हरियाली का चीरहरण होता रहा तो मिर्जापुर का पुराना नैसर्गिक सौंदर्य कितने दिनों तक बचेगा? यह सवाल अब लोगों की ज़ुबान पर मजबूती से उठने लगा है।”

छात्र नेता रहे संजय सिंह गहरवार पर्यावरण मंत्रालय को कटघरे में खड़े करते हुए इसकी भूमिका पर संदेह जताते हुए कहते हैं, जब समूचा देश अरावली पर्वतमाला को बचाने को लेकर चिंतित देखा जा रहा है और इसे बचाने की खातिर लोग आंदोलित हो रहें हैं, ऐसे समय में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गढ़ी गई परिभाषा ने इसके अस्तित्व पर ही संकट पैदा कर दिया है।” 

वह बड़े ही बेबाकी से बोलने है कि “भारत देश की सरकार अपने पूंजीपति (अडानी-अंबानी) मित्रों को फायदा पहुंचाने के लिए रोज नए प्रकार के हथकंडे अपना रही है। इसे तत्काल रोकना होगा, वरना इसका कुप्रभाव समूचे भारतवासियों को झेलना पड़ेगा।”

सपा छात्र नेता आकाश यादव ने कहा कि “सरकार अध्यादेश लाकर सबसे प्राचीनतम भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में से एक अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरक्षा सुनिश्चित करें। 100 मीटर से कम की ऊंचाई वाली परिभाषा को वापस ले, वरना सरकार की इस पर्यावरण विरोधी मुहिम के विरुद्ध मुहिम छेड़ने के लिए हम युवा छात्र, नौजवान सड़क पर उतरने को बाध्य होंगे।”

वसीम रजा बताते हैं कि, “ऐसे समय में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सभी प्रकार के खनन, स्टोन क्रशिंग, रियल एस्टेट गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध लगाया जाए, ताकि पर्यावरण संरक्षण को बल मिले और लोगों को खुलीं हवा में सांस लेने की सहुलियत मिल सके।” 

वसीम अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरक्षा पर गहरी चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग करते है। 

वरिष्ठ पत्रकार अंजान मित्र भारत की सबसे प्राचीन भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में शामिल अरावली पर्वत श्रृंखला के सुरक्षा को लेकर देश भर में गहराती जा रही चिंता की लकीरों को जायज़ और उचित ठहराते हैं। वह प्रगतिशील युवा मंच मिर्जापुर द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित ज्ञापन के माध्यम से अरावली के संरक्षण को लेकर उठाएं गये गंभीर सवालों का पुरजोर समर्थन करते हैं।

वह कहते हैं, जो मुद्दा देश की आम आवाम से जुड़ा हुआ हो, पर्यावरण संरक्षण और हर एक सांसों से जुड़ा हुआ हो उसपर तो बिना किसी विरोध प्रदर्शन के सरकार को इसके संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। 

प्रगतिशील युवा मंच ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में दाखिल उस जवाब पर भी घोर आपत्ति जताई है, जिसमें अरावली पर्वत श्रृंखला की पहचान के लिए 100 मीटर ऊंचाई को आधार बनाने की बात कही गई है। सरकार के मुताबिक स्थानीय भू-स्तर से 100 मिटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों ही अरावली का हिस्सा मानी जाएगी, जबकि इसके कम उंचाई वाले टीले और पहाड़ियां इसके दायरे से बाहर हो जाएंगे।

पर्यावरणविद् का मानना है कि इस परिभाषा से आरावली का लगभग 90% क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएगा। 

संजय सिंह गहरवार सवाल करते हुए कहते हैं कि, “देश में वायु प्रदूषण का लेबल बढ़ता जा रहा है, ऐसे समय में जल-जंगल और पहाड़ नहीं रहेंगे तो लोगों का जीवन कैसे बचेंगे? बोलते हैं, पर्यावरण का घोर संकट गहराता जा रहा है। राष्ट्र संकट में है भारत सरकार से वह गुहार लगाते हुए तंज़ कसते हुए दुहराते हैं प्रधानमंत्री जी अपने पूंजिपति मित्र अडानी की खातिर देश राष्ट्र को दांव पर न लगाएं।

(मिर्ज़ापुर उत्तर प्रदेश से संतोष देव गिरी की रिपोर्ट)

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