गुजरात में उबाल: 131 किलोमीटर पैदल चलकर पहचान मांगने को मजबूर हुए आदिवासी युवा

गुजरात के आदिवासी युवा अब कुछ भी मानने को तैयार नहीं हैं। सालों तक सरकार का रुख समझने के बाद अब उन्हें पता चल गया है कि जब उनकी आवाज को ही सरकार नहीं सुन रही है तब इंतजार करने से क्या लाभ? न तो उन्हें आदिवासी होने का सम्मान मिल रहा है और न ही उनको आरक्षण का लाभ ही। सही मायने में उनकी पहचान ही संकट में जा फंसी है। और अगर पहचान ही नहीं है तो फिर भविष्य की चिंता कौन करे? उसका क्या लाभ? अब जिंदगी में बचा ही क्या है? आखिर एक बार तो अपनी आवाज के जरिये सरकार के कान को खोला जाए। सैकड़ों आदिवासी युवकों की बैठक हुई, निर्णय हुआ और फिर निकल गए 131 किलोमीटर की लम्बी यात्रा पर।

गुजरात के बनासकांठा से निकली 131 किलोमीटर लंबी पदयात्रा किसी तात्कालिक उबाल का नतीजा नहीं है। यह तीन साल से जमा गुस्से, ठहराए गए करियर और टूटते भरोसे की भौतिक अभिव्यक्ति है। पालनपुर से गांधीनगर की ओर बढ़ते आदिवासी युवा सिर्फ सड़कों पर नहीं चल रहे—वे उस राज्य से जवाब मांग रहे हैं, जिसने आरक्षण का अधिकार तो दिया, लेकिन पहचान की मंजूरी रोक दी। इस पदयात्रा के केंद्र में एक तकनीकी-सा दिखने वाला, लेकिन बेहद राजनीतिक सवाल है—जाति सत्यापन प्रमाणपत्र। वही प्रमाणपत्र, जो आदिवासी युवाओं के लिए सरकारी नौकरी का प्रवेश द्वार होना चाहिए था, आज उनके लिए सबसे बड़ा अवरोध बन गया है।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पिछले तीन से चार वर्षों में जाति सत्यापन की प्रक्रिया एक संवैधानिक सुरक्षा से बदलकर संस्थागत दमन का औजार बन गई है। सैकड़ों पढ़े-लिखे आदिवासी युवाओं ने सरकारी परीक्षाएं पास कीं, चयन सूची में आए, लेकिन नियुक्ति पत्र रोक दिए गए—क्योंकि उनके जाति प्रमाणपत्र या तो “लंबित” कर दिए गए या निरस्त कर दिए गए। आदिवासी नेता ईश्वर भाई डामोर कहते हैं, “हमने मामलतदार, कलेक्टर, मंत्री, मुख्यमंत्री, यहां तक कि राज्यपाल तक को लिखा। फाइलें चलीं, बैठकें हुईं, आश्वासन मिले—लेकिन समाधान नहीं।” उनके शब्दों में यह सिर्फ देरी नहीं, जानबूझकर थकाने की रणनीति है।

डामोर का आरोप है कि सत्यापन समितियां प्रमाणपत्र मामूली कारणों से रद्द कर रही हैं—कहीं वर्तनी की गलती, कहीं व्याकरण, कहीं दस्तावेज़ों की “तकनीकी असंगति”। वे दुखी होकर कहते हैं “यह जांच नहीं, सैबोटाज है,” “यह ऐसे लगता है जैसे सिस्टम सक्रिय रूप से आदिवासी युवाओं को सरकारी सेवा से बाहर रखने पर तुला है।” इसका असर सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है। वर्षों की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, और परिवारों की उम्मीदें- सब कुछ एक प्रशासनिक नोटशीट के नीचे दब गया है।

पदयात्रा में शामिल आदिवासी नेता शंकर भाई का सवाल और भी तीखा है। “दो साल से सरकार के दरवाज़े खटखटा रहे हैं। कोई हल नहीं। हमारे लड़के-लड़कियां बेरोजगार बैठे हैं। अगर सरकार को शक है कि हम आदिवासी हैं या नहीं, तो डीएनए  टेस्ट करा ले—लेकिन हमारे बच्चों का भविष्य मत तबाह करो।”

यह सवाल केवल पहचान का नहीं है, राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त नागरिकता का है।

इस पद यात्रा में कांग्रेस कार्यकर्ता और दांता से विधायक कांती खराड़ी भी शामिल हुए। चलते हुए उन्होंने कहा,“यह आंदोलन रातों-रात पैदा नहीं हुआ। वर्षों तक जिला स्तर पर कोशिश की गई। जब कहीं सुनवाई नहीं हुई, तब यह यात्रा शुरू हुई।” हालांकि प्रदर्शनकारी खुद बार-बार जोर दे रहे हैं कि यह कोई दलगत आंदोलन नहीं है। डामोर के शब्दों में—“यह राजनीति नहीं, सर्वाइवल है।”

यह बयान अपने आप में बताता है कि जब संवैधानिक प्रक्रियाएं फेल हो जाती हैं, तब राजनीति भी जीवन-मरण का सवाल बन जाती है।

दरअसल, जाति सत्यापन का उद्देश्य फर्जी दावों को रोकना था। लेकिन गुजरात के आदिवासी इलाकों में यह प्रक्रिया अब एक चयन फिल्टर में बदलती दिख रही है—जहां वास्तविक आदिवासी भी संदेह के दायरे में रखे जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सत्यापन समितियों में स्पष्ट दिशानिर्देशों की कमी, अत्यधिक विवेकाधिकार और जवाबदेही का अभाव इस संकट की जड़ में है। एक फाइल सालों तक लटकी रह सकती है, लेकिन अधिकारी पर कोई जवाबदेही तय नहीं होती। नतीजा यह कि युवा ओवरएज हो रहे हैं, नियुक्तियां रद्द हो रही हैं और आरक्षण का संवैधानिक वादा कागजों में सिमट रहा है।

131 किलोमीटर की यह यात्रा सिर्फ दूरी नहीं नाप रही, बल्कि राज्य और आदिवासी समाज के बीच बढ़ती खाई को माप रही है। प्रदर्शनकारियों ने साफ कर दिया है कि अगर गांधीनगर में भी कार्रवाई की जगह सिर्फ आश्वासन मिले, तो आंदोलन वहीं रुकने वाला नहीं है।एक आयोजक के शब्दों में, “अगर सत्ता का केंद्र नहीं सुनेगा, तो वही केंद्र विरोध का मैदान बनेगा।” बड़ा सवाल: आदिवासी अधिकार कागज़ पर या ज़मीन पर?

गुजरात विकास, प्रशासनिक दक्षता और ‘गुड गवर्नेंस’ का मॉडल पेश करता रहा है। लेकिन बनासकांठा से निकली यह पदयात्रा उस मॉडल के एक अंधे कोने को उजागर करती है—जहां पहचान साबित करते-करते पीढ़ियां थक रही हैं। यह आंदोलन सरकार के सामने एक सीधा सवाल रखता है: क्या आदिवासी युवाओं को रोजगार से वंचित करना प्रशासनिक भूल है—या एक संरचनात्मक चयन?

131 किलोमीटर चलकर जो सवाल गांधीनगर पहुंच रहा है, उसका जवाब अगर फिर टाल दिया गया, तो यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं रहेगा—यह विश्वास का स्थायी टूटना होगा।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 राज्य को निर्देश देते हैं कि वह अनुसूचित जनजातियों के साथ भेदभाव न करे और उन्हें समान अवसर दे। अनुच्छेद 46 राज्य पर यह नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी डालता है कि वह आदिवासियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की विशेष सुरक्षा करे। लेकिन बनासकांठा के आदिवासी युवाओं का अनुभव इन अनुच्छेदों से बिल्कुल उलट है। सरकारी परीक्षाएं पास करने के बावजूद उनकी नियुक्तियां इसलिए रोक दी गईं, क्योंकि जाति सत्यापन प्रमाणपत्र “लंबित” है या “रद्द” कर दिया गया है। न कोई समय-सीमा, न स्पष्ट कारण, न जवाबदेही। यानी संविधान जहां अधिकार देता है, वहीं प्रशासन उसे नोट शीट में कैद कर देता है।

सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन” का अर्थ केवल सांस लेना नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन और आजीविका है। लेकिन जिन युवाओं की नियुक्तियां सालों से रुकी हैं, उनके लिए यह अधिकार कागज़ी साबित हो रहा है।

एक प्रदर्शनकारी ने कहा,“हम ओवरएज हो रहे हैं। नौकरियां हाथ से निकल रही हैं। हमारे करियर को बिना किसी सजा के रोक दिया गया है।” यह स्थिति संविधान के उस बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है, जिसमें बिना सुनवाई और ठोस कारण के किसी नागरिक के अधिकार छीने नहीं जा सकते।

सबसे बड़ी बात जवाबदेही का शून्य होना है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि सत्यापन समितियों की जवाबदेही किसके प्रति है? अगर फाइल सालों लटकी रहे, तो अधिकारी पर क्या कार्रवाई होती है? अगर प्रमाणपत्र गलत तरीके से रद्द किया जाएं, तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा? इन सवालों का कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। यही जवाबदेही का शून्य इस पूरे संकट की जड़ है।

अब आख़िरी सवाल तो यही है कि यह पदयात्रा गुजरात सरकार के सामने एक सीधा संवैधानिक प्रश्न रखती है-क्या अनुसूचित जनजाति होना एक अधिकार है—या प्रशासन की दया?अगर संविधान द्वारा दी गई पहचान भी फाइलों में उलझ सकती है, तो यह सिर्फ आदिवासी समाज का संकट नहीं रहेगा। यह उस संवैधानिक ढांचे की परीक्षा होगी, जो खुद को समानता और न्याय की नींव पर खड़ा बताता है।131 किलोमीटर पैदल चलकर जो सवाल गांधीनगर पहुंच रहा है, उसका जवाब अगर नहीं मिला, तो यह केवल एक आंदोलन का अंत नहीं होगा—यह संविधान पर भरोसे की सबसे लंबी पदयात्रा बन जाएगा।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

Leave a Reply