अपार्टमेंट के संघी: शाखा में प्रशिक्षत भी, अप्रशिक्षित भी

शिकायत उन्हीं की थी। बोले -”लाते कहां से हैं कुत्ते के मरने या उसकी टांग टूट जाने की ये खबरें? साथ में वीडियो भी?” मैं कुछ बोलता, इससे पहले उन्होंने जोड़ा, ”ऐसे ही सारे समाचार! हर चैनल के कैमरे कितने होंगे? और रिपोर्टर भी कि पूरी दुनिया के समाचार होते हैं उनके पास, वीडियो समेत?”

हम धूप सेंक रहे थे। अपार्टमेंटों में फ्लैट्स में धूप कम ही आती है। आपका फ्लैट पूर्व दिशा में हो और सामने कोई 20-22 मंजिला अपार्टमेंट न हो और फ्लैट पांचवीं-छठी मंजिल से उपर हो तो सुबह-सबेरे घंटे-दो घंटे धूप के घर में आने की उम्मीद आप कर सकते हैं। या कहीं फ्लैट पश्चिम में हो और बाकी सब कुछ पूर्ववत तो धूप दोपहर में या ऐसे ही फ्लैट की दिशा भर बदले और कुछ और न बदले तो शाम में या कभी और..।

सो अपार्टमेंटों में पार्क में होना लगभग नियम हैं। ठंड के मौसम में। सुबह में पार्कों पर पुरुषों का राज होता है, दोपहर में उन्हें लॉबियों में लगी बेंचों पर जगह पाने के लिए स्त्रियों से प्रतिस्पर्धा करनी होती है।

तो सुबह की सैर का समय था। हम सैर कर चुके थे। मतलब डेढ़-दो हजार कदम चल चुके थे। सुबह का सौदा-सुलुफ, दूध और सब्जी-फल खरीदना भी इन्हीं कदमों में शामिल था। हम पार्क में आ बैठे थे। हम मतलब मैं और मेरे ही टावर में 11 वीं मंजिल पर रह रहे खुराना साहब। अजीब हैं, पर किसी दिन न मिलें तो याद रहता है कि आज मिले नहीं।

एक दिन तो उन्होंने आध-घंटे तक ‘ताज स्टोरी’ की वाहवाही की, गो फिल्म उन्होंने देखी नहीं है, बढेरा साहब की तरह अखबार बांचने नियमत: रोजाना क्लब हाउस जाते नहीं और सोशल मीडिया पर कहां, क्या देख लेते हैं, यह न तो कभी बढेरा साहब ने बतायी, न खुराना जी ने। अलबत्ता वह फिल्म तथ्यों पर नहीं, आस्थाओं पर बनी फिल्म है।

वैसे ही, जैसे सुप्रीम कोर्ट तक ने अयोध्या में विवादित स्थल की जमीन पर मालिकाना हक का निर्णय आस्थाओं पर दे दिया। वैसे ही जैसे पिछले दशक में ढेरो फिल्में जन नहीं, बल्कि वोकल—पीपल की आस्थाओं पर बनी हैं। आर्टिकल 370, कश्मीर स्टोरी, केरला स्टोरी, इमरजेंसी जैसी फिल्में। खुराना साहब लंबे समय तक फिल्म ‘ताज स्टोरी’ की वाहवाही करते रहे, बचपन से अब तक पढ़ाये गए इतिहास की मलामत भी की।

वह भी तब, जब ताजमहल के लिए भूमि अधिग्रहण से लेकर उसके निर्माण तक का रिकार्डेड इतिहास उपलब्ध है। वह भी तब, जब अभी कुछ साल पहले ही आर्कियॉलॉजिकल सर्वे ने ऐसी रिपोर्ट दी थी, जो फिल्म की पूरी कहानी के विरुद्ध है। कमाल यह भी कि खुराना साहब अकेले ‘ताज स्टोरी’ की प्रशंसा नहीं कर रहे थे, मेरी पत्नी और बेटी भी मिलजुल कर फिल्म देखने की योजना बनाने लगे थे।

अपार्टमेंटों में ऐसे लोगों की भरमार है, जो इस भरमार में शामिल नहीं हैं, उनकी हालत वही है जो अल्पमत वाले लोगों की होती है, खासकर आक्रामक बहुमतवाद के इस दौर में। कई बार तो इन लोगों को मालूम भी नहीं होता कि वे संघी-भाजपाई हो गए हैं। तर्कहीनता अंतत: वहीं पहुंचाती है। बेंचों पर और लोग भी थे, दो-तीन और भी आ रहे थे। दो-तीन जा रहे थे या जाने वाले थे।

मैं बोल पडा, ”अभी पांच-सात दिन पहले ही मैंने इसी पर लिखा भी है, जिसमें बताया है कि कैसे हमारे गोदी चैनलों पर देश की खबर तो है नहीं, सो पड़ोसी देश, खासकर पाकिस्तान में इमरान खान के समाचार हैं, ऐसे में तो गोदी चैनलों के मजे हो गए हैं।” खुराना साहब चौंके। मतलब दिखा तो नहीं, पर अंदर से चौंके। ‘गोदी मीडिया’ कहने पर भी और इस पर भी कि ‘हमारे चैनलों पर हमारे देश की खबरें तो हैं नहीं’।

पड़ोसी खुराना साहब वैसे ही भाजपाई हैं, जैसे मेरे पापा थे – शास्त्रीय अर्थों में नहीं। संघ की शाखाओं में लाठी-डंडे नहीं चलाए, लेजिम-व्यायाम नहीं किए, बस सरकारी नौकरी हासिल करने की गरज से डिग्रियां जुटानें में ही वह वक्त नहीं मिल सका कि सूचनाओं की भूख पैदा करने, रीजनिंग की, तर्क की तमीज पैदा करने में समय लगा सकें।

उनका समय, सोशल मीडिया का समय नहीं था, सूचनाओं का ऐसा घटाटोप, गोदी चैनलों की ऐसी प्रायोजित बहसबाजियां और अमित मालवीयों की ऐसी भरमार भी नहीं थी। ऐसे में क्लर्की-अफसरी, डाक्टरी, इंजीनियरिंग, इतिहासविद, राजनीति विज्ञानी, वैज्ञानिक-अर्ध वैज्ञानिक, आईपीएस, आईएएस, यानि किसी भी विभाग-प्रभाग-अनुशासन में ऊँचे-से-ऊँचे ओहदे पर तो पहुंचा जा सकता था, लेकिन तर्क की तमीज पैदा नहीं की जा सकती थी। समय ही नहीं था इस सबके लिए।

और रीजनिंग की, तर्क की तमीज पैदा करने का ‘फालतू समय’ नहीं था तो संघ की शाखाओं में प्रशिक्षित और ऐसे स्वयंसेवकों के प्रति समर्पित लोगों के तमाम सवालों—तर्काभासों के सामने हथियार डाल देना लगभग मजबूरी होती थी। शाखा में लाठी—डंडे चलाने, लेजिम—व्यायाम में प्रशिक्षित लोगों के अलावा शेष तो वही थे जो अनेक बार पहले ही हथियार डाल चुके थे।

बीए में मेरे शिक्षक, महेश्वर शरण उपाध्याय यों ही नहीं कहते थे कि ‘आपने जो पढ़ा है, उस पर आपसे सवाल पूछा जाये और आप कम-ज्यादा एक्सेलेंस के साथ छोटा या बड़ा उत्तर दे दें, इस पर आप कम-ज्यादा अंकों के साथ डिग्रियां तो जुटा लेंगे, नौकरी और कोई ओहदा भी आप पा लेंगे, पर पढ़ा-लिखा आपको मैं तब मानूंगा, जब आपने जिस भी विषय पर कुछ नहीं पढ़ा हो, उस पर भी घंटे-दो घंटे कहने के लिए आपके पास कुछ हो।

वह शायद बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के टॉपर थे और मुझसे चारेक साल सीनियर रहे होंगे। पटना के बीएन कॉलेज में मैंने बीए में दाखिला लिया था और वह शायद कुछेक साल पहले पढ़ाने लग गए होंगे। यो ही मैं भी नहीं कहता कि तर्क-बुद्धि आपने पैदा नहीं की हो, कार्य-कारण आप न समझते हों और आप महेश्वर शरण के अर्थों में पढ़े-लिखे नहीं हों तो भाजपाई होना आपकी मजबूरी होगी।

मजबूरी केवल दशक भर पहले वाली भाजपा के अपने होने की नहीं, मजबूरी उसके लिए भी लड़-भिड़ जाने वाले की, जिसे साहेब और उनके चाणक्य ने प्राइवेट लिमिटेड पार्टी में बदल दिया है। क्योकि पिछले एक दशक में अपनी पार्टी में हुए इस बदलाव को समझने के लिए भी तो आंखें बंद होने के साथ शुरू होनेवाली भक्ति के विरुद्ध एक सचेतनता चाहिए, आंखें खुली रखने की एक जिद और एक तर्क-बुद्धि चाहिए।

तो मेरे ‘गोदी मीडिया’ और ‘अपने देश के तो समाचार हैं नहीं वहां’ कहने से खुराना साहब इस कदर उत्तेजित हुए कि यह भी भूल गये कि शिकायत तो स्वयं उनकी थी, मैं तो बस अपने तर्कों से उनका समर्थन भर कर रहा था।

मैंने फिर कहा कि इमरान खान के, पाकिस्तान में सैनिक शासन के अत्याचारों के समाचार नहीं थे, तो लगभग हर चैनल का हर रिपोर्टर देश और दुनिया में हर कहीं फैल गया था और उसके वीडियो कैमरे बरेली हो, बनासकांठा या मोकोचुंग, पहलगाम हो या डिब्रूगढ़, फ्रांस में नैंसी हो, इटली में फ्लोरेंस, चीन में छियांग्शी, स्लोवेनिया में पीरान, या देश-दुनिया की किसी भी छोटी-बड़ी जगह में मनुष्य या किसी भी पशु-पक्षी के साथ हुई कोई अजीबोगरीब घटना या छोटी-बड़ी कोई घातक या अघातक दुर्घटना पर नजर गड़ाए थे, उन्हें रिकार्ड कर रहे थे और यहां भारत में दर्शकों तक पहुंचा रहे थे।

इमरान खान हैं तो लंबा खिंच गए यूक्रेन-रूस युद्ध और उनकी उबा देनेवाली खबरों का सहारा लेने की भी कोई जरुरत नहीं बची थी और विपक्षी दलों और नेताओं को तो हमारे चैनलों को दिखाना नहीं है!’

खुराना साहब बोल पडे, ‘क्यों??? राहुल के वोट-चोर के नारे मैंने चैनलों पर ही देखे हैं, अखिलेश के वक्तव्य, वो कौन है विजयन, उसके भी और भाजपा की, उसकी सरकार के किसी बयान या किसी काम पर प्रतिक्रिया करती नहीं। विपक्षी पार्टियां बंगाल जीत जाएं या तमिलनाडु तब कुछ नहीं, बिहार में नतीजे भाजपा-एनडीए के पक्ष में आ गए तो वोट चोरी हो गयी?’ तब तक बगल की बेंच पर आ बैठे एक दूसरे बुजुर्गवार ने खुराना साहब की बात का समर्थन किया। वह भी धूप सेंक रहे थे।

हिंदी, कुछ-कुछ बंगला में बोल रहे थे, ऐसे कि बोंगाल तो पहले नहीं जीता। अबकी भी नरेंदर मोदी जीत थोड़े पायेगा? और हैदराबाद तो अभी ही हारा है, तब भी बोट चोरी का शोर है। है कि नहीं है? बिहार में ‘सर’ हुआ, वहां बंगलादेशी-बंगलादेशी बोल रहा था, ये मोदी का लोग। तो वहां था कि नहीं बंगलादेशी? आप कहो कि बंगाल में भी नहीं था, असम में भी नहीं, तो यह कैसे चलेगा! ‘सर’ से उनका आशय ‘स्पेशल इंटेसिव रिवीजन’ से था, बस उन्हें पता नहीं था कि बिहार के बाद जिन 10-12 राज्यों में ‘सर’ कराने की घोषणा हुई है, उनमें असम नहीं हैं।

बंगाली मोशाय बोले जा रहे थे और पहली बार खुराना साहब किसी की सुन रहे थे। मोशाय बाबू फुटबॉल के कोच रहे हैं और खुराना साहब की पुरानी वाकफियत है। वरना ऐसे तमाम लोगों की एक खासियत यह भी है कि ऐसे लोग आपकी सुनते ही नहीं। खुराना साहब नहीं सुनते हैं, दोपहर को बोरदोलोई साहब नहीं सुनते, रात में टहलते वक्त श्रीवास्तव साहब और मंडल जी भी नहीं।

कोच बाबू रौ में थे। कोच बाबू कई बातें, कई-कई तरह से बोल रहे थे। मैं सुनूं, न सुनूं, कोच बाबू को इसकी परवाह भी नहीं थी।

इसी रौ में उन्होंने कह दिया कि ‘कांग्रेस चुनाव प्रचार करती है तो कहती है – पंजे पर वोट गिराओ, सपा करती है तो बताती है कि साइकिल पर वोट डालो, दीदी और उनकी तृणमूल का कोई जाता है तो बोलता है – फूल-घास पर मोहर मारो, नीतीश बाबू जाते हैं तो कहते हैं कि तीर-धनुष पर वोट करो, लेकिन भाजपा अपना चुनाव-चिह्न नहीं बताती, कहती है कि तुम कहीं भी मोहर लगाओ, कहीं भी वोट गिराओ, आएगा तो वह भारतीय जनता पार्टी में ही।’

कोच बाबू चुटकुला कहने के मूड में नहीं थे, कहीं सुना था यह सब और वही कह रहे थे, पर खुराना साहब उन्हें भांप चुके थे।

खुराना साहब ने उठते हुए मुझसे पूछा, ”सवा दस तो बज ही चुके होंगे। आज बेगम के पास खाने के कुछ आर्डर भी हैं।” मैं खड़ा हो गया और हम दोनों चल पड़े, लिफ्ट की तरफ। उन्हें तो 11वीं मंजिल तक जाना था और लिफ्ट तो उन्हें लेनी ही थी।

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