इस वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण घटना ऑपरेशन सिंदूर था।पहलगाम आतंकी हमले ने सरकार के बड़बोले दावों की पोल खोल दी। दावा किया गया था कि धारा 370 हटने के बाद कश्मीर में आतंकवाद खत्म हो गया लेकिन आतंकवादियों ने सीमा से सैकड़ों किमी अंदर आकर दो दर्जन से अधिक सैलानियों को मौत के घाट उतार दिया।
उसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच एक छोटा युद्ध हुआ जिसे भारत ने ऑपरेशन सिंदूर का नाम दिया।हालांकि इसमें कुछ विमान मार गिराए गए लेकिन जन धन की कोई विशेष हानि नहीं हुई।सबसे बड़ा तमाशा तो तब हुआ जब ट्रंप ने बारम्बार यह कहना शुरू किया कि उन्होंने व्यापार का दबाव डालकर भारत पाक का युद्ध रुकवाया है। जब कि भारत की घोषित नीति यह रही है कि वह तीसरे किसी पक्ष की दखलंदाजी स्वीकार नहीं करेगा।लेकिन प्रधानमंत्री मोदी एक बार भी यह नहीं कह पाए कि ट्रंप गलतबयानी कर रहे हैं।
इस युद्ध की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि इसमें थल सेना और हवाई सेना की कोई भूमिका ही नहीं थी।यह युद्ध पूरी तरह हवाई सेना, ड्रोन और मिसाइल के माध्यम से लड़ा गया। यह भारतीय कूटनीतिक विफलता का भी साक्षी रहा जहां भारत दुनियां के देशों की बिरादरी में पूरी तरह अलग थलग पड़ गया।
यह भी स्पष्ट नहीं है कि भारत इस कार्रवाई से पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों को कितना रोक पाएगा। दूसरे इस नए तरह की लड़ाई में भारत को अपनी श्रेष्ठता स्थापित करना अभी बाकी है। एक ओर चीन पाकिस्तान की मदद में मजबूती से खड़ा हुआ, दूसरी ओर ट्रंप भी पाकिस्तान के ही पक्ष में बोलते नजर आए। रूस भी पहले की तरह भारत के साथ हर मोर्चे पर खड़ा नहीं हुआ।
इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि भारत के साथ केवल अफगानिस्तान की बदनाम तालिबानी सरकार खड़ी हुई। जिसके मंत्री ने दिल्ली में पत्रकार वार्ता से महिला पत्रकारों को बाहर रखकर अपनी जाहिल कट्टरपंथी सोच का परिचय दे दिया।
मेहनतकश जनता की दृष्टि से दूसरी सबसे महत्वपूर्ण घटना मनरेगा का एक तरह से खात्मा रहा। न सिर्फ उसका नाम बदल कर महात्मा गांधी का नाम हटा दिया गया है और जी राम जी कर दिया गया है बल्कि उसकी मूल अंतर्वस्तु को ही इस तरह बदल दिया गया है कि उसका लागू होना अव्यावहारिक हो गया है। दिखावे के लिए दिनों की संख्या भले बढ़ाकर 100 की जगह 125 कर दी गई है
लेकिन जिस तरह इसे सरकार की मर्जी पर छोड़ दिया गया है कि योजना कहां लागू होगी और कहां नहीं लागू होगी, उससे इसका सार्वभौम चरित्र खत्म हो गया है और सरकार के लिए भेदभाव का दरवाजा खुल गया है।इसके अतिरिक्त देय फंड में जिस तरह राज्यों का हिस्सा बढ़ाकर 40% कर दिया गया है जबकि पहले लगभग 90 फ़ीसदी फंड केंद्र सरकार देती रही है। सच्चाई यह है कि जनता के टैक्स से बने खजाने का बहुत बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार के पास रहता है।राज्य सरकारें आमतौर पर भारी कर्ज में डूबी रहती हैं।
नई योजना का करीब करीब आधा बोझ अब उनके ऊपर डाल देने से, वे इस योजना के क्रियान्वयन के प्रति उदासीन हो जाएंगी।इसलिए इसका बहाना बनाकर केंद्र भी अपना फंड नहीं देगा।नतीजतन योजना का कार्यान्वयन करीब करीब ठप हो जाएगा।
साल का अंत बीतते बीतते जिस तरह की नफरती हिंसा की घटनाएं हुई हैं वह अभूतपूर्व है।मुसलमानों के खिलाफ तो नफरत और हिंसा की घटनाएं लगातार हो ही रही थी, अब उसमें यह नया अध्याय जुड़ गया है। इस साल क्रिसमस के मौके पर जिस तरह के हमले हुए हैं वह बेमिसाल है।ये घटनाएं विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में हुई हैं।
विडंबना है कि जिस समय मोदी जी चर्च में जा रहे थे उसी समय चर्चों पर हमले हो रहे थे।न प्रधानमंत्री मोदी, न गृह मंत्री अमित शाह, न ही भाजपा के किसी बड़े नेता ने इन हमलों की निंदा की। कार्रवाई की बात तो बात बहुत दूर की है।
उधर, 2024 में लोकसभा चुनावों में भाजपा को अपने बूते स्पष्ट बहुमत न मिल पाने के झटके के बाद एक के बाद एक विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत ने लोकसभा हार के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को कम कर दिया। दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा और यहां तक कि बिहार में प्रचंड बहुमत हासिल कर एनडीए भाजपा ने सबको चकित कर दिया और साल का अंत होते-होते एक तरह बाजी पलट दी।
राहुल ने जो कुछ चुनावों का विश्लेषण करके यह साबित कर दिया है कि चुनावों की मतदाता सूची के माध्यम से बड़े पैमाने पर धांधली हुई है, उससे भाजपा की जीतों की चमक फीकी जरूर पड़ी है लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग की तमाम तिकड़मों की मदद से समाज में उसकी पकड़ बनी हुई है। यह साफ है कि इसआईआर के माध्यम से अब कानूनी तौर पर जो काम किया जा रहा है, वह उसके भी पहले से अघोषित रूप से किया जा रहा था।
जाहिर है अगर चुनाव भी ईमानदारी से नहीं होता जो जनता के पास न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार है, तो फिर हमारे लोकतंत्र का भविष्य क्या है इसे समझा जा सकता है।
बेरोजगारी विशेषकर शिक्षित युवा बेरोजगारी ने विस्फोटक आयाम ग्रहण कर लिया है। महंगाई ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है। देश की अर्थव्यवस्था रसातल में जा रही है, मोदी के मित्र ट्रंप ने इसे जबरदस्त झटका दिया है।
दिल्ली एनसीआर में जो भयानक प्रदूषण इस साल रहा उसके लिए जाहिर है भाजपा के त्रिस्तरीय शासन को जिम्मेदारी लेना होगा। आरोप प्रत्यारोप से जाहिर है राजनीतिक लाभ मिल सकता है लेकिन इससे बच्चों और नागरिकों के फेफड़ों में जो जहर भर रहा है उसका समाधान नहीं हो सकता। शुद्ध हवा भी इस सरकार के राज में दुर्लभ हो गई है।
आज एक बार फिर संविधान और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आजादी की लड़ाई जैसे आंदोलन की जरूरत है।क्या विपक्ष इसकी चुनौती स्वीकार करेगा?
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)