जैसा कि 1789 के फ्रांसीसी संविधान में कहा गया कि “कानून आम लोगों की आवाज़ है।” भारत में भी यही सिद्धांत हमारे संविधान की आत्मा है। राज्य की शक्ति लोगों से आती है, और लोगों के पास उस शक्ति की देखरेख और उसे नियंत्रित करने का अंतिम अधिकार है। यह “लोकतांत्रिक नियंत्रण” बहुत महत्वपूर्ण आज़ादी है।
इसका यह भी मतलब है कि सरकारें अंधेरे में काम नहीं कर सकतीं या लोगों द्वारा चुनी गई विधायिका की मंज़ूरी और देखरेख के बिना काम नहीं कर सकतीं। जो समूह हर जगह नागरिक स्वतंत्रता की वकालत करते हैं, उन्होंने हमेशा अपने मिशन और अभियानों में इस बात पर ज़ोर दिया है कि सरकारी शक्ति को किसी न किसी तरह से जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
लेकिन ठीक इसी बिंदु पर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के साथ समस्या शुरू होती है। लोकप्रिय इच्छा की अभिव्यक्ति को मज़बूत करने के बजाय, एसआईआर ऐसी प्रक्रिया के रूप में काम करता है, जो उसे सीमित करती है। लोकतांत्रिक नियंत्रण को सशक्त करने के बजाय, यह उसे प्रशासनिक औपचारिकताओं और दस्तावेज़ी शर्तों के जाल में उलझा देता है।
बड़ी संख्या में लोगों को अपनी स्थिति समझाने का मौका दिए बिना, संसद में बिना किसी वास्तविक चर्चा के और आम तौर पर लोगों की सहमति के बिना आज भारत में बड़े स्तर पर लोगों को वोटर लिस्ट से बाहर किया जा रहा है। जबकि लोकतंत्र का कायदा है कि सरकार अपने लोगों के प्रति जवाबदेह हो, यह सिस्टम चीज़ों को उल्टा कर देता है, जिससे नागरिकों को लगातार यह साबित करना पड़ता है कि वे असली हैं और उन्हें वोट देने की अनुमति है।
दुनिया ने अमेरिका से लेकर अन्य देशों तक कई लोकतंत्रों में मतदाताओं के बहिष्कार को देखा है, लेकिन भारत में जो हो रहा है वह एक अलग पैमाने और प्रकृति का है। यहाँ, मतदान अधिकारों का हनन किसी खुले कानूनी हमले से नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से हो रहा है जिसे नियमित चुनावी “सुधार” के रूप में पेश किया जा रहा है।
विशेष गहन पुनरीक्षण के दूसरे चरण के तहत जारी मसौदा मतदाता सूची से पता चलता है कि भारत अपने लोकतांत्रिक इतिहास में मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के सबसे बड़े मामलों में से एक की ओर बढ़ रहा है।
दूसरे चरण के तहत, 12 राज्यों में मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित की गई है। इन सूचियों से जो सामने आता है, वह मामूली संशोधन नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर बहिष्कार की तस्वीर है, जिसमें करोड़ों नागरिकों को अचानक मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।
सरकारी डेटा के मुताबिक, एसआईआर के दूसरे चरण के दौरान बारह राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 6.59 करोड़ मतदाताओं को ड्राफ्ट रोल से बाहर कर दिया गया है। इसका असर बड़े और चुनावी रूप से निर्णायक राज्यों में सबसे ज़्यादा पड़ा है, जिससे एसआईआर प्रक्रिया के डिज़ाइन और परिणामों के बारे में बुनियादी सवाल उठते हैं।
भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में स्थिति सबसे ज़्यादा चिंताजनक है। एसआईआर से पहले, राज्य में मतदाताओं की संख्या लगभग 15.4 करोड़ थी, लेकिन पहले चरण के बाद, यह संख्या तेज़ी से घटकर 12.5 करोड़ हो गई, लगभग 2.89 करोड़ मतदाताओं को ड्राफ्ट रोल से हटा दिया गया।
इत्तेफाक से उत्तर प्रदेश एक ऐसा उदाहरण पेश करता है, जो इस प्रक्रिया के बारे में बहुत कुछ उजागर करता है। प्रदेश में एक ही समय में, एक ही राज्य में, दो अलग-अलग संवैधानिक संस्थाएँ मतदाता सूचियों का काम कर रही हैं। भारतीय चुनाव आयोग राज्य में एसआईआर कर रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश राज्य चुनाव आयोग पंचायत चुनावों के लिए मतदाता सूची का संशोधन कर रहा है।
हालात एक जैसे हैं—वही प्रदेश, वही लोग। पंचायत स्तर पर हुए संशोधन में न तो नागरिकता साबित करने के कागज़ मांगे गए, न ही मतदाताओं पर किसी तरह का जनगणना जैसा फॉर्म थोपा गया। जबकि एसआईआर में यही शर्तें सबसे बड़ी बाधा बन गईं। नतीजा साफ़ है, दोनों तरीकों के परिणाम बिल्कुल उलटे निकले। जहाँ पंचायत चुनाव की प्रक्रिया ने लोगों को जोड़ा, वहीं एसआईआर ने बड़ी संख्या में मतदाताओं को बाहर कर दिया।
एसआईआर के बाद, चुनाव आयोग की उत्तर प्रदेश के लिए ड्राफ्ट मतदाता सूची में 12.55 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। इसके विपरीत, पंचायत चुनावों के लिए तैयार मतदाता सूची में 12.7 करोड़ मतदाता दर्ज हैं, जो एसआईआर प्रक्रिया के तहत केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त कुल मतदाताओं की संख्या से अधिक हैं।
इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि पंचायत संशोधन में पिछली सूची की तुलना में लगभग 40 लाख मतदाता जोड़े गए, जो 3.27 प्रतिशत की वृद्धि है। इसके विपरीत, एसआईआर प्रक्रिया के परिणामस्वरूप लगभग 18 प्रतिशत मतदाताओं को बाहर कर दिया गया, जो लगभग 2.89 करोड़ नामों के बराबर है।
जब शहरी मतदाताओं (लगभग 3.4 करोड़) को पंचायत मतदाता सूचियों में जोड़ा जाता है, तो उत्तर प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या बढ़कर 16.1 करोड़ हो जाती है, जो राज्य की अनुमानित वयस्क आबादी से काफी मिलती-जुलती है। एक ही आबादी पर लागू की गई दो अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाओं ने इस प्रकार मौलिक रूप से अलग परिणाम दिए।
इन दोनों प्रक्रियाओं में कई ऐसे अंतर हैं, जो मामले की मूल समस्या की ओर इशारा करते हैं। पंचायत चुनावों के लिए मतदाता सूची अपडेट करने में राज्य निर्वाचन आयोग ने पूरे सात महीने का समय दिया, लेकिन केंद्रीय चुनाव आयोग वही काम तीन महीने में ही निपटा देना चाहता है। जबकि गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को सामान्य पुनरीक्षण की तुलना में ज्यादा समय दिया जाना चाहिए। इसे कोई मामूली भूल या कैलेंडर की गड़बड़ी नहीं कहा जा सकता। यह बताता है कि मतदाता सूची सुधार की प्रक्रिया खुद ही गलत ढंग से बनाई गई है।
जो प्रक्रिया बाहर से देखने में सामान्य मतदाता सूची सुधार लगती है, वही ज़मीन पर बड़े पैमाने पर लोगों के वोट का अधिकार छीनने का तरीका बन जाती है।
(प्रत्यक्ष मिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)