माधव गाडगिल-एक अग्रणी संरक्षणवादी

माधव गाडगिल, जो भारत के अग्रणी दूरदर्शी पारिस्थितिकीविद् और प्रकृति संरक्षणवादियों में से एक थे, ने 7 जनवरी 2026 को अन्तिम साँस ली। उनके निधन से देश ने एक ऐसे विलक्षण पारिस्थितिकी वैज्ञानिक को खो दिया है, जो समय के साथ एक समुदाय-केन्द्रित संरक्षणवादी के रूप में उभरे थे। अरावली की पहाड़ियों में धावा बोलते खनन माफ़िया और हिमालय व पश्चिमी घाट की संवेदनशील पारिस्थितिकी प्रणालियों को रौंदते खनन व लकड़ी माफ़िया के आतंक के बीच, भारत के प्रकृति-प्रेमियों के लिए उनका जाना आपूरणीय क्षति है।

प्रकृति संरक्षण के प्रति समर्पित एक जीवन

प्रकृति के संरक्षण को समर्पित अपने इस जीवन में, दुर्बल से दिखने वाले इस वैज्ञानिक ने संरक्षण जीवविज्ञान और मानव पारिस्थितिकी का समन्वय किया। मनुष्य और प्रकृति का सौहार्दपूर्ण व सहजीवी सह-अस्तित्व सदैव उनके हृदय के केन्द्र में रहा। भारत अनेक उत्कृष्ट वैज्ञानिकों का देश है और उनमें से बहुत कम बेहतरीन प्रचारक हैं, जिन्होंने अपने वैज्ञानिक निष्कर्षों को किताबों व लेखों के ज़रिये जनसाधारण तक लोक भाषा में व्यापक रूप से पहुँचाने के काम किया है।

माधव गाडगिल अत्यन्त प्रखर लेखक थे और उनकी सन्दर्भ ग्रंथसूची में पारिस्थितिकी और संरक्षण से जुड़े 250 से अधिक लेख और किताबें शामिल हैं।

माधव गाडगिल पुणे के एक प्रतिष्ठित परिवार से थे। उनके दादा, नाहर विष्णु गाडगिल, आज़ाद भारत में नेहरू सरकार की पहली केन्द्रीय मंत्री परिषद के सदस्य थे। उनके पिता धनंजय रामचन्द्र गाडगिल ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इतिहास और अर्थशास्त्र की शिक्षा हासिल की, परन्तु उन्होंने भारतीय सिविल सेवा में पद लेने से इनकार कर दिया। इसके बजाय उन्होंने अपना जीवन भारत के औद्योगिक विकास का शोध करने पर समर्पित कर दिया।

गाडगिल ने हार्वर्ड से शिक्षा प्राप्त की और उन्होंने भी विदेश में अर्थकर करियर चुनने के बजाय भारत लौटकर सीधा संरक्षणवादी सक्रियतावाद का रास्ता चुना।

जन-पक्षधर पर्यावरणीय सक्रियता के अग्रदूत

पुणे में रहने वाले उदय भट जो भूतपूर्व लाल निशान पार्टी, जिसका अब सीपीआई(एमएल) लिबेरेशन के साथ विलय हो चुका है, के नेता हैं, तहेदिल से याद करते हैं कि पुणे में वामपंथियों ने माधव गाडगिल के जनपक्षधर पर्यावरणीय सक्रियता के कारण हमेशा उनका समर्थन किया था।

उदय भट्ट कहते हैं : “पर्यावरणवाद के प्रति उनके अन्तर्निहित, जन-केन्द्रित दृष्टिकोण का धन्यवाद कि माधव गाडगिल हमेशा वाम के समर्थक बने रहे। उनकी बहन सुलभा ब्रह्मे, एक प्रख्यात अर्थशास्त्री थीं, वामपंथी थीं और हमारी बेहद क़रीबी थीं। अपनी पारिस्थितिक सक्रियता में जनपक्षधर सोच के कारण गाडगिल का काम पर्यावरण-समाजवाद के साथ प्रभावी तौर पर सम्बद्ध था। उनका जाना पुणे की सभी प्रगतिशील धाराओं के लिए एक अपूरणीय क्षति है।”

प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा

माधव गाडगिल ने 1969 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी पीएचडी पूरी की। वे वहाँ अध्यापक के तौर पर चुने गये। वे हार्वर्ड में बतौर शिक्षक एक सफल आजीविका चुन सकते थे। लेकिन उन्होंने इस अवसर को ठुकरा दिया, और वहाँ दो वर्ष पढ़ाने के उपरान्त वे 1971 में भारत लौट आये और सीधा पारिस्थितिकी सक्रियता का रास्ता अख़्तियार किया, जो उस समय एक नवागत क्षेत्र था।

पाँच दशकों की उनकी पर्यावरणीय सक्रियता का सार उनकी 280-पृष्ठीय पुस्तक इकोलोजिकल जर्नीज़ – ‘द सायन्स एण्ड पॉलिटिक्स ऑफ़ कंसर्वेशन इन इण्डिया’ में मिलता है, जिसमें 28 वर्षों के दौरान लिखे गये विविध संरक्षण विषयक लेख संकलित हैं।

बौद्धिक निर्माण के वर्ष

इस पुस्तक की शुरुआत में माधव गाडगिल लिखते हैं: “मेरा जन्म पुणे के बाहरी इलाके में हुआ, और अपने घर की छत से मैं पश्चिमी घाट की पहाड़ियों की एक के बाद एक श्रृंखला क्षितिज तक फैली देख सकता था।”

वे बताते हैं कि वे पक्षी-अवलोकन से आकृष्ट थे, जिससे उनका परिचय उनके पिता ने बेहद कम उम्र में करवाया था। युवा माधव एक प्रखर पाठक बन गए थे—और अपने पिता के 3000 पुस्तकों के संग्रह को उन्होंने बेहद कम समय में पढ़ डाला।

विद्यालय की अन्तिम परीक्षा में प्राप्त हुये अच्छे अंक के बूते उन्हें चिकित्साशास्त्र में प्रवेश मिल सकता था, पर उन्होंने उसे अस्वीकार कर प्राणीशास्त्र (ज़ूलॉजी) में बीएससी करना चुना। चिकित्साशास्त्र न चुनने के कारण उन्हें भारी सामाजिक दबाव झेलना पड़ा, परन्तु उनके पिता ने जीवविज्ञान के प्रति उनकी रुचि का पूरा समर्थन किया।

हार्वर्ड में माधव ने समुद्री जीवविज्ञान की पढ़ाई करना चुना और उनकी मंगेतर सुलोचना—जो गणित की छात्रा थीं—ने भी हार्वर्ड में दाख़िला लिया, और वहाँ से दोनों पीएचडी की पढ़ाई करने कैम्ब्रिज चले गये।

हार्वर्ड में उन्होंने जनसंख्या जीवविज्ञान पर शोध शुरू किया। गणितीय मॉडलिंग पर आधारित पारिस्थितिकी शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत करने वाले वे हार्वर्ड के पहले जीवविज्ञान के छात्र बने। गणित में अपनी सफलता का श्रेय वे अपनी जीवन-संगिनी को देते हैं: “इतने बड़े पैमाने पर उद्यम करने का साहस मुझमें इसलिए था क्योंकि मेरे पास एक अव्वल दर्जे की गणितज्ञ—सुलोचना—थी, जिससे मैं छोटी-से-छोटी कठिनाई पर भी परामर्श कर सकता था।”

वे जीवविज्ञान में कंप्यूटरों के प्रयोग करने वाले पहली पीढ़ी के जीववैज्ञानिकों में थे और इसके लिए उन्होंने आईबीएम फ़ेलोशिप भी जीती।

1960 के दशक के उत्तरार्ध में अपने बौद्धिक निर्माण के बारे में बताते हुए वे लिखते हैं, “1960 के दशक का उत्तरार्ध हार्वर्ड में एक दिलचस्प समय था। वियतनाम युद्ध और हिप्पी आन्दोलन ने जीवन्त बहस का माहौल पैदा किया था। हार्वर्ड के विज्ञान-दर्शन के एक प्रोफ़ेसर – हिलेरी पुट्नम ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का अमेरिकी सरकार के साथ जारी काम के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज करते हुए एक समानान्तर दीक्षान्त समारोह का आयोजन किया।”

“मैंने हार्वर्ड में ज़रूरत की अपेक्षा रूचि के अनुसार कई अध्ययन किये; इनमें से एक था पुट्नम का पाठ्यक्रम – विज्ञान का दर्शन। इसमें दर्शन और इतिहास, दोनों शामिल थे और यह मोटे तौर पर थॉमस कून की पुस्तक ‘स्ट्रक्चर ऑफ़ साइंटिफ़िक रिवोल्यूशन’ पर आधारित था। इसने इतिहास मे मेरी दिलचस्पी को और गहरा करने का काम किया और मैंने डीडी कोसाम्बी की प्राचीन भारत का इतिहास समेत इतिहास की कई किताबों का अध्ययन किया।” इससे उनके बौद्धिक विकास और झुकाव का अंदाज़ा होता है।

शैक्षणिक रूप से वे हार्वर्ड में समाजजीवविज्ञान (सोशियोबायोलॉजी) के क्षेत्र में जानवरों, पक्षियों और कीटों के समाज व्यवहार पर चल रही बहसों से भी प्रभावित थे। पेशेवर जीवन के शुरुआती वर्षों की उनकी जीवन यात्रा के विवरण में प्रकृति संरक्षणवादी के रूप में उनके विकास की अंतर्दृष्टि नज़र आती है। पुणे लौटने पर उनके एक सहकर्मी ने उन्हें वन पारिस्थिकी के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।

वे याद करते हैं : “इस तरह पहली बार मैंने मनगाँव के पवित्र जंगल को देखा था, पश्चिमी घाट की चोटियों से सटे हुए और सिंहगढ़ और रायगढ़ के पहाड़ी किलों के बीचोंबीच। एक जीववैज्ञानिक के तौर पर उसकी पुरानी वनस्पतियाँ मेरे लिए गहन दिलचस्पी का केन्द्र थी; सांस्कृतिक प्रयोग के रूप में पवित्र जंगल की अवधारणा ने मेरी कल्पना को झकझोर दिया। मैंने इन दूरस्थ गाँवों में कई दिनों तक डेरा डाला और किसानों से बातें की, जो हर ऐतिहासिक घटना का समय शिवाजी के समय को आधार बना कर बताया करते थे।”

“इसने मुझे मराठा इतिहास पर सोचने और उसे पारिस्थितिकि दृष्टि से देखने पर मजबूर किया। मुझे कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम्’ में कार्तिकेय के पवित्र वन का एक ज़िक्र मिला और फिर मैंने भारतीय शास्त्रीय और लोक परम्पराओं में प्रकृति संरक्षण की परम्परा में और गहराई से गोता लगाया। पश्चिमी घाट के शिखर के किनारे दो समुदाय रहते थे – कुणबी और गवली, और ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने आपस में प्राकृतिक संसाधनों का बँटवारा बहुत सुव्यवस्थित तरीक़े से कर लिया था। इससे मेरी रूचि भारत के जाति व्यवस्था के पारिस्थितिक निहितार्थ को समझने में जागी।”

संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका को रेखांकित करना

माधव गाडगिल इस बात से प्रभावित थे कि बिश्नोई जैसे कुछ समुदायों में पारिस्थितिक संरक्षण किस प्रकार व्यस्तता का केन्द्र बन जाता है। संयोगवश यहाँ गाडगिल अपने सामाजिक दृष्टिकोण को उजागर करने वाला एक रोचक प्रसंग बयां करते हैं : “मुझे यहाँ ज़रूर बता देना चाहिए कि मेरे पिता जी जातिगत और वर्ग समाज के पूर्वाग्रहों से पूरी तरह मुक्त थे। उन्होंने अपने बेटों का उपनयन संस्कार करने से इंकार कर दिया था, अतः मैं यह गर्व से कह सकता हूँ कि मैं किसी भी जाति से सम्बन्धित नहीं हूँ।”

कैम्ब्रिज से माधव गाडगिल और सुलोचना दोनों भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु आ गये — जिसे वे “भारत में प्रतिबद्ध वैज्ञानिकों के लिए सर्वोत्तम स्थान” कहते हैं। “ मैं अब भी क्षेत्रीय जीवविज्ञान करना चाहता था और मैंने पश्चिमी घाट के जंगल और वन्यजीवों पर ध्यान केन्द्रित करना तय किया: दृढ़ता से वहाँ लौटना जहाँ पारिस्थितिकी के प्रति मैं पहली बार आकृष्ट हुआ था, मैंने नीलगिरी की तलहटी में स्थित बांदीपुर टाइगर रिज़र्व में एक शोध परियोजना की शुरुआत की।”

इसके उपरान्त गाडगिल ने गवली और धंगर जैसे वनस्पतियों और जीवजन्तुओं का संरक्षण करने वाले चरवाहा समुदायों की पारिस्थितिकी का अध्ययन किया। इनके विपरीत, उन्हें लगा, पेपर मिलों में बाँस के भण्डार को बिना पुनर्योजन की चिन्ता के नष्ट किया जा रहा था। 

गाडगिल उभरते हुये संरक्षणवादी आन्दोलन में बेहद दिलचस्पी लेते थे और पक्षी विज्ञानी सलीम आली और उनके चचेरे भाई ज़फ़र उनके मार्गदर्शक बन गये, उन्होंने सलीम आली के साथ कई हफ़्ते फ़ील्डवर्क में बिताये और सहलेखक के तौर पर भारतीय पक्षियों के समूहिक बसेरे पर उनके साथ एक शोध पत्र तैयार किया। सलीम अली और ज़फ़र, दोनों ही संरक्षण के मसलों पर तत्कालीन प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी के सलाहकार थे और उनके ज़रिये उन्हें सरकार को पर्यावरणीय मसलों पर सलाह देने वाली की एक छोटी सी समिति में शामिल कर लिया गया।

सरकार के साथ कार्य

गडगिल याद करते हैं : “मैंने एक गम्भीर फ़ील्ड अध्ययन का प्रस्ताव रखा जो इस समिति के काम के लिए महत्वपूर्ण जानकारी इकट्ठा करती, और कैलाश मल्होत्रा और मुझे भारत के सभी प्रान्तों: जैसलमर के मरुस्थल से लेकर गढ़वाल के हिमालय पर्वतों, गोवा में मछुआरों के गाँव से लेकर होशंगाबाद के किसानी समुदायों तक, में एक महीने तक भ्रमण करने के लिए नियुक्त किया गया।”

“हम अधिकारियों और विशेषज्ञों से अधिक आम लोगों से बातें करते थे, और हम यह जानकार प्रभावित हुए कि आम लोग पर्यावरणीय मसलों के प्रति कितने जागरूक थे, और वे सकारात्मक क़दम उठाने के लिए कितने तत्पर थे, बशर्ते उनकी ज़िन्दगी के फैसले उनके हाथों में होते तो।” इसके बाद गाडगिल ने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील उत्तर कन्नड़ में ईको-डेवलपमेंट एक्शन रिसर्च की ओर रुख़ किया।

वे याद करते हैं, “इस काम ने मुझे जन और संसाधन की अन्तःक्रिया की हमारी समझदारी, जो लगातार महती विषय बनती जा रही है, को बढ़ाने में योगदान देने में मदद की।” गाडगिल ने कई वर्षों तक भारत के अग्रणी जीव-भूगोलवेत्ता वी.एम. मेहर-होमजी के साथ काम किया, जो फ़्रेंच इंस्टीट्यूट, पॉण्डिचेरी के मुखिया थे, जिसने ‘साइलेंट वैली’ पारिस्थिकी पर बेजोड़ काम किया था। उन्होंने डेटा एनालिस्ट निरंजन जोशी के साथ भी काम किया और बड़े परिमाणात्मक आँकड़ों से युक्त बेहतरीन शोध पत्र तैयार किये। इ

सके बाद उन्होंने समाजशास्त्री और पर्यावरण इतिहासकार रामचंद्र गुहा के साथ पाँच दशक लम्बे साझेदारी की शुरुआत की, जिन्होंने गाडगिल के साथ मिलकर कई किताबें लिखीं। माधव गाडगिल ने साढ़े तीन वर्षों तक सीएनआर राव के साथ प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलहकार परिषद में भी काम किया। वे कहते हैं, “इसने मुझे भारत सरकार, उद्योग और वैज्ञानिक संस्थानों के काम करने के तरीक़े को समझने का सुअवसर प्रदान किया, इस अवसर ने जन-प्रकृति के रिश्तों पर मेरे वैज्ञानिक काम को समृद्ध किया।” 

माधव गाडगिल समिति बनाम कस्तूरीरंगन समिति

माधव गाडगिल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान पश्चिमी घाट के परिस्थितिकी का अपनी अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल के तहत संरक्षित करना है। इसका गठन 2010 में यूपीए सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत ‘सेव वेस्टर्न घाट’ आन्दोलन के दबाव में पश्चिमी घाट के संवेदनशील पारिस्थितिकी को विनाश से बचाने के लिए किया गया था।

इस समिति ने सलाह दी कि पूरे पश्चिमी घाट को परिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र घोषित कर दिया जाए व खनन और लकड़ी की कटाई जैसे विध्वंसकारी गतिविधियों के लिए नये पर्यावरणीय निर्बाधन पर अनिश्चितकालीन प्रतिबन्ध लगा दिया जाए।

समिति के इन सिफ़ारिशों को खनन और लकड़ी माफ़िया और परिस्थितिकी के प्रति संकुचित दृष्टि अपनाने वाली केरल की सीपीआई(एम) के विरोधों का सामना करना पड़ा। इन विरोधों के दबाव में केन्द्र सरकार ने कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में एक दूसरी समिति का गठन किया जिसने गाडगिल समिति के कठोर प्रावधानों को लचीला बनाने का काम किया। यही नहीं, उन्होंने परिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र का दायरा भी काफ़ी कम कर दिया।

हालांकि कस्तुरीरंगन समिति के सुझावों ने पर्यावरणीय नीति को बेहद कमजोर बनाने का काम किया, तिस पर भी गाडगिल समिति की 522 पृष्ठ की विस्तृत प्रस्तावों वाली रिपोर्ट आज भी पश्चिमी घाट की परिस्थितिकी को बचाने का संघर्ष लड़ने वाले आन्दोलन के हाथ में एक रामबाण हथियार है ।

इस लेख के लेखक का पिछले कुछ वर्षों में पत्रकार के रूप में माधव गाडगिल से संक्षिप्त परिचय रहा है। माधव गाडगिल से उनका व्यक्तिगत परिचय गोवा से आने वाले, हर तरह के खनन का विरोध करने वाले ठोस-वामपंथी विचारधारा से संबन्धित एक खनन विरोधी कार्यकर्ता ने कराया था।

गाडगिल बेहद धैर्य के साथ कार्यकर्ताओं को यह समझाने का प्रयास कर रहे थे कि बड़े कॉर्पोरेट घरानों के स्थान पर ख़ुद समुदायों द्वारा पारिस्थितिकी सतत खनन की संभावना है और उन कार्यकर्ताओं के सामने, जो पर्यावरणीय जागरूकता फैलाने की दिशा में अच्छा काम कर रहे हैं, इस बात को रेखांतकित करने का प्रयास किया कि उन्हें सरकारी अधिकारियों से बातचीत कर उन्हें पर्यावरणीय मसलों के प्रति सजग करने की ज़रूरत है।

वे इस बात पर बल देते हैं कि “हमें परिस्थितिकी के प्रति असंवेदनशील कार्यपालिका को कतई खुली छूट नहीं देनी चाहिए।” गाडगिल अपनी किताब का समापन इन पंक्तियों के साथ करते हैं : “पिछले तीस वर्षों में मैंने अत्यन्त संतोषजनक वैज्ञानिक जीवन व्यतीत किया है। मेरा विश्वास है कि मैंने सैद्धांतिक जनसंख्या जीवविज्ञान, संरक्षण जीवविज्ञान और संभवतः मानव पारिस्थितिकी व पारिस्थितिक इतिहास में अग्रणी योगदान दिये हैं।”

निस्संदेह, उनके अग्रणी योगदान आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए उनके दूरदर्शी उत्साह को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देते रहेंगे।

(अनुवाद : वृषाली श्रुति)

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