ऋत्विक घटक के सिनेमाई सफ़र का जीवंत दस्तावेज़

”फ़िल्म बनाने का प्राथमिक उद्देश्य मानवजाति के लिए भलाई करना है। यदि आप मानवता के लिए भलाई न करें, तो कोई भी कला सच्ची कला का कार्य नहीं है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि कला को पहले सत्य के प्रति वफ़ादार होना चाहिए और उसके बाद सौन्दर्य के प्रति।” यह उद्गार हैं महान फ़िल्मकार ऋत्विक घटक के।

ऋत्विक घटक का यह जन्मशताब्दी वर्ष है। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ज़ाहिद ख़ान और जयनारायण प्रसाद ने साझा तौर पर-‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ शीर्षक से किताब का सम्पादन किया है। इस किताब में घटक के सम्पूर्ण सिने कर्म और उनके व्यक्तिगत जीवन के हर पहलू को समग्रता में जानने-समझने की गम्भीर कोशिश की गई है। उनके जीवन और सिनेमाई सफ़र के एक-एक ब्यौरे की किताब विस्तार में पड़ताल करते हुए चलती है।

किताब किसी चलचित्र की तरह उनके सिनेमाई सफ़र और उनकी ज़िन्दगी को पृष्ठ-दर-पृष्ठ खोलती चली जाती है और पाठक किताब के अंत तक इसमें डूबता-उतराता हुआ चलता चला जाता है।

किताब पढ़ते हुए पाठक को पता चलता है कि घटक का व्यक्तित्व कितना विराट है। वे कवि हैं, तो कहानीकार भी हैं। वे न केवल नाटक लिखते हैं, बल्कि उसका निर्देशन भी करते हैं और उसमें अभिनय भी करते हैं। वे न केवल सिनेमा बनाते हैं, बल्कि उसे पढ़ाते भी हैं। दिलचस्प यह है कि वे अपनी फ़िल्मों में अभिनय भी करते हैं।

उनके जीवन का एक और पहलू भी है, और वह है एफटीआईआई पुणे में अध्यापन कार्य करते हुए उस दौर की नई पीढ़ी के कई युवाओं को ऐसे सिनेमा के निर्माण के लिए तैयार भी करते हैं, जो आगे चलकर सिनेमा के ज़रिए मानवता की अपने ढंग और तौर-तरीक़ों से सेवा करते हैं। वे क़ुदरत के अद्भुत चितेरे भी हैं। यही नहीं वे वृत्तचित्रों का निर्माण और निर्देशन भी करते हैं।

किताब पढ़ते हुए पाठक को महसूस होने लगता है कि उनका सामना किसी अद्भुत और चमत्कारिक शख़्सियत से होने जा रहा है। दरअसल, ऋत्विक घटक पर दर्जनों किताबें लिखी गई हैं, पर वे सब की सब अंग्रेज़ी में हैं और अंग्रेज़ी के विद्वानों ने लिखी हैं। अभी तक हिन्दी में कोई ऐसी किताब उनपर नहीं आई है, जो हिन्दी पट्टी के पाठकों का इतनी जीवंतता से उनका साक्षात्कार करा सके। इस मायने में यह एक बेहद सराहनीय प्रयास है।

इस किताब के लिए सामग्री जुटाना इतना आसान काम नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार जयनारायण प्रसाद कोलकाता में जन्मे हैं और बांग्ला, अंग्रेज़ी पर उनका समान अधिकार है। इसलिए बांग्ला और अंग्रेज़ी में ऋत्विक घटक पर जितनी भी उम्दा सामग्री है, उसका अनुवाद उन्होंने फ़ौरन किताब के लिए कर डाला।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक ज़ाहिद ख़ान का प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन पर विस्तृत कार्य है और इस विषय पर उनकी कई किताबें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उनका देश भर के लेखकों और पत्रकारों से एक व्यापक और गहन रिश्ता है। इस नाते उन्होंने घटक साहब पर जितनी भी उम्दा सामग्री अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में थी, न सिर्फ़ उसका चयन किया, बल्कि उनका बेहरत अनुवाद भी करा लिया। इससे ऋत्विक घटक पर बेहद उम्दा सामग्री किताब के लिए तैयार हो गई।

किताब को प्रकाशित करने का ज़िम्मा उठाया क्रांतिकारी और वामपंथी साहित्य का प्रकाशन करने वाले ‘गार्गी प्रकाशन’ ने। इस काम में प्रकाशन के संचालक दिगम्बर की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है।

ऋत्विक घटक के व्यक्तित्व की विराटता को समझाने के लिए सम्पादक द्वय ने घटक के परिजनों, उनके समकालीन फ़िल्मकारों सत्यजित राय, मृणाल सेन, फ़िल्म क्रिटिक्स और तमाम फ़िल्म विशेषज्ञों के वृहद आलेखों और टिप्पणियों, उनके तीन लम्बे साक्षात्कारों का संकलन किया है। कुल मिलाकर जो सामग्री किताब में प्रकाशित की गई है, वह ऋत्विक घटक के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को परत-दर-परत खोलती चली जाती है, और पाठक यह देखकर चमत्कृत रह जाता है कि वह इस मुल्क के कितने महान फ़िल्मकार से रूबरू हो रहा है।

ऋत्विक घटक की जड़ें कहीं दूर उस पूर्वी बांग्लादेश में हैं, जो कभी भारत विभाजन से पहले इसी मुल्क का हिस्सा था। भारत विभाजन के बाद ऋत्विक कलकत्ता आ जाते हैं और अपनी जड़ों से पूरी तरह कट जाते हैं। भारत विभाजन और बंग-भंग उनके व्यक्तित्व को कितनी पीड़ा से सालता है, इसी का अक्स उनकी फ़िल्मों-‘मेघे ढाका तारा’, ‘कोमल गांधार’ और ‘सुबर्णरेखा’ में बड़ी मार्मिकता से देखने को मिलता है। किताब उनकी सभी फ़िल्मों के बहाने विस्थापन और विभाजन की पीड़ा को बड़े मार्मिक रूप में प्रस्तुत करती है।

वहीं किताब की भाषा सरल-सहज और प्रवाहपूर्ण है। इसे पढ़ते हुए पाठक को पता चलता है कि सत्यजित राय, मृणाल सेन और ऋत्विक घटक की त्रयी में ऋत्विक ऐसे अकेले राजनीतिक फ़िल्मकार हैं, जिनकी मार्क्सवाद के प्रति प्रतिबद्धता देखने लायक़ है। जिस मार्मिक ढंग से वे अपनी फ़िल्मों में विस्थापन और विभाजन के त्रास को व्यक्त करते हैं, उतने ही तीख़े ढंग से वे उस दौर के हुक्मरानों पर प्रहार भी करते हैं। उनकी फ़िल्मों में प्रतीकों और बिम्बों के सहारे कहानी कहने की शैली भी अद्भुत है।

अपनी जड़ों से कटने का दर्द भी बड़े मार्मिक अंदाज़ में किताब के तमाम लेखों में व्यक्त हुआ है।

किताब में शामिल तमाम लेखकों ने घटक के सिनेमा को बहुत प्रभावपूर्ण ढंग से विश्लेषित करने की कोशिश की है। चाहे वे सिनेमा के गहन अध्येता और विश्लेषक रविभूषण हों या फिर अरुण खोपकर, या विस्थापन का दर्द झेल रहे वरिष्ठ पत्रकार पलाश विश्वास, या वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव या वरिष्ठ फ़िल्म क्रिटिक जवरीमल्ल पारख, फ़िल्मकार अनूप सिंह या विनोद दास या हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता विश्वजीत चटर्जी, बिमल रॉय की सुपुत्री रिंकी रॉय भट्टाचार्य या अन्य तमाम लोग।

किताब इस दृष्टि से भी रोचक बन पड़ी है कि इसमें कई चीज़ें पाठकों को चौंकाती भी हैं। मसलन ऋत्विक घटक की डॉक्यूमेंट्री-‘दुर्वार गति पद्मा’ जिसमें अपने दौर की महान अभिनेत्री नरगिस ने काम किया था। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हिन्दी सिनेमा के मशहूर कॉमेडियन केस्टो मुखर्जी ने ऋत्विक घटक की फ़िल्म-‘नागरिक’ से अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया था। इसी तरह ऋत्विक घटक के शिष्यों में अडूर गोपालकृष्णन, कुमार शाहनी, मणि कौल, सुभाष घई, सईद अख़्तर मिर्ज़ा जैसे तमाम फ़िल्मकार शामिल हैं।

ऋत्विक घटक से बांग्ला में लिए प्रवीर सेन के इंटरव्यू का हिन्दी अनुवाद बेबी शॉ ने बहुत सुंदर ढंग से किया है। इसी तरह बांग्ला भाषा से अनूदित एक और साक्षात्कार रामशंकर द्विवेदी का है। फ़िल्म समीक्षक नेत्रसिंह रावत, विजय सोनी और प्रमोद जोशी ने ऋत्विक घटक का एक इंटरव्यू ‘दिनमान’ के लिए किया था। यह इंटरव्यू भी किताब में शामिल है। सभी इंटरव्यू बेहद रोचक हैं।

सम्पादक द्वय ने ऋत्विक घटक के साथ काम करने वाले जीवित कलाकारों का ब्यौरा भी किताब में प्रस्तुत किया है। यही नहीं किताब में ऋत्विक घटक के निबन्ध और आलेख भी प्रस्तुत किए गए हैं। साथ ही उनके समकालीन सत्यजित राय, मृणाल सेन, उत्पल दत्त, महाश्वेता देवी, सलिल चौधरी और फ़िल्मकार—गीतकार गुलज़ार के आलेख भी शामिल हैं।

ऋत्विक घटक के जन्म शताब्दी वर्ष में यह किताब आम पाठकों, उनके सिनेमा में रुचि रखने वालों और उन पर शोध कर रहे शोधार्थियों के लिए किसी यादगार किताब की तरह है। 370 पृष्ठों की इस किताब में महान फ़िल्मकार ऋत्विक घटक का पूरा जीवन दर्शन समाया हुआ है। किताब की भूमिका बांग्ला के बड़े फ़िल्मकार गौतम घोष ने लिखी है।

-दीप भट्ट

किताब : ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक

सम्पादक : ज़ाहिद ख़ान और जयनारायण प्रसाद

प्रकाशक : गार्गी प्रकाशन दिल्ली

पृष्ठ : 370

मूल्य : 400 रुपये

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