नब्बे वर्ष पार आलोचक डॉ. राजेश्वर सक्सेना

डॉ. राजेश्वर सक्सेना का नब्बे वर्ष पार करना मात्र दीर्घायु का सूचक नहीं है, बल्कि यह हिन्दी आलोचना की एक सुदीर्घ, सतत और सघन बौद्धिक यात्रा का पड़ाव है। वे उन विरल आलोचकों में हैं जिनकी उपस्थिति किसी एक पीढ़ी, प्रवृत्ति या फैशन तक सीमित नहीं रही, बल्कि जिन्होंने बदलते सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों, साहित्यिक धाराओं और वैचारिक संघर्षों के बीच निरन्तर संवाद बनाए रखा।

डॉ. सक्सेना का आलोचक व्यक्तित्व न तो किसी एक वाद की जड़ अनुकरणशीलता में फँसा रहा और न ही तटस्थता के नाम पर मूल्यहीन उदासीनता में। उनकी आलोचना का मूल स्वभाव वस्तुनिष्ठ विवेक, मानवीय प्रतिबद्धता और द्वन्दात्मकता के सौन्दर्य से निर्मित हुआ है।

हिन्दी आलोचना के इतिहास में यदि हम प्रस्थान बिन्दुओं को देखें तो आचार्य शुक्ल के लोकमंगलवादी विवेक से लेकर रामविलास शर्मा की समाजशास्त्रीय दृष्टि, नामवर सिंह की बहसपरक आधुनिकता और मुक्तिबोध की आलोचनात्मक चेतना तक एक लम्बी परम्परा विकसित हुई है। डॉ. राजेश्वर सक्सेना इसी परम्परा के भीतर रहकर भी अपनी स्वतंत्र आलोचनात्मक पहचान निर्मित करते हैं।

वे आलोचना को न तो शुष्क अकादमिक अनुशासन मानते हैं और न ही वैचारिक प्रचार का साधन; बल्कि उनके लिए आलोचना एक ऐसी बौद्धिक प्रक्रिया है जो साहित्य, समाज और मनुष्य—तीनों के बीच जीवंत सम्बन्ध स्थापित करती है।

डॉ. सक्सेना की आलोचना का पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष वस्तुनिष्ठ विवेक है। वस्तुनिष्ठता यहाँ मूल्य-निरपेक्षता नहीं, बल्कि तथ्यों, सन्दर्भों और पाठ के प्रति ईमानदार निष्ठा का नाम है। वे रचनाओं को किसी पूर्वग्रह, निजी समीकरण या वैचारिक आग्रह के आधार पर नहीं परखते, बल्कि रचना की आन्तरिक संरचना, भाषा, शिल्प और उसके सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ को समग्रता में देखने का प्रयास करते हैं।

इस दृष्टि से उनकी आलोचना अकसर धैर्यपूर्ण और संतुलित प्रतीत होती है। वे अतिरंजना से बचते हैं और प्रशंसा-निन्दा दोनों में संयम रखते हैं। यह संयम दरअसल आलोचक के नैतिक अनुशासन का परिचायक है, जो आज के त्वरित प्रतिक्रियाओं और सतही निर्णयों के दौर में और भी प्रासंगिक हो उठता है।

उनकी आलोचना का दूसरा केन्द्रीय आयाम मानवीय प्रतिबद्धता है। डॉ. सक्सेना साहित्य को केवल सौन्दर्यबोध या कलात्मक प्रयोग का क्षेत्र नहीं मानते, बल्कि उसे मानवीय संघर्षों, पीड़ाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं। इसीलिए वे साहित्य की सामाजिक भूमिका पर लगातार जोर देते हैं। उनके यहाँ मानवीय प्रतिबद्धता किसी संकीर्ण राजनीतिक नारेबाजी में नहीं बदलती, बल्कि मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की एक नैतिक चेतना के रूप में सामने आती है।

वे दलित, स्त्री, श्रमिक, वंचित और हाशिये पर पड़े समुदायों की आवाज़ को साहित्यिक विमर्श का अभिन्न अंग मानते हैं, पर साथ ही साहित्य की कलात्मक स्वायत्तता को भी सुरक्षित रखते हैं। यही संतुलन उनकी आलोचना को विश्वसनीय बनाता है।

डॉ. राजेश्वर सक्सेना की आलोचना का तीसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष द्वन्दात्मकता का सौन्दर्य है। वे साहित्य को स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि सतत प्रक्रिया मानते हैं, जिसमें परम्परा और परिवर्तन, रूप और अन्तर्वस्तु, व्यक्ति और समाज, सौन्दर्य और संघर्ष—सभी के बीच द्वन्द्व चलता रहता है। उनकी आलोचनात्मक पद्धति इस द्वन्द्व को नकारती नहीं, बल्कि उसे समझने और उद्घाटित करने का प्रयास करती है। वे मानते हैं कि साहित्य की जीवंतता इसी द्वन्द्व में निहित है।

इसीलिए वे किसी भी रचना या प्रवृत्ति का मूल्यांकन करते समय उसके अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं और उन्हें रचनात्मक सम्भावनाओं के रूप में देखते हैं, न कि दोष के रूप में।

एक आलोचक के रूप में डॉ. सक्सेना की दृष्टि व्यापक है। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना—सभी विधाओं पर समान अधिकार के साथ विचार किया है। विशेषतः कविता पर उनकी टिप्पणियाँ गहन संवेदनशीलता और सूक्ष्म पाठ-विश्लेषण का उदाहरण हैं। वे कविता को केवल भावात्मक अभिव्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि भाषा के भीतर घटित होने वाली जटिल संरचना के रूप में पढ़ते हैं।

आधुनिक और समकालीन कविता के संदर्भ में उनकी आलोचना यह स्पष्ट करती है कि नवीनता केवल शिल्पगत प्रयोगों में नहीं, बल्कि अनुभव की ईमानदारी और दृष्टि की ताजगी में निहित होती है।

उपन्यास और कथा-साहित्य के क्षेत्र में भी डॉ. सक्सेना की आलोचना सामाजिक यथार्थ और मनोवैज्ञानिक गहराई—दोनों को समान महत्व देती है। वे कथानक के साथ-साथ चरित्र-निर्माण, कथाभाषा और संरचना पर भी ध्यान देते हैं। उनके अनुसार एक सशक्त कथा वही है जो अपने समय की जटिलताओं को व्यक्त करते हुए मनुष्य के भीतर चल रहे द्वन्द्वों को भी उजागर कर सके।

इस दृष्टि से उनकी आलोचना किसी एक प्रवृत्ति या स्कूल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि विभिन्न लेखकों और रचनात्मक प्रवाहों के बीच संवाद स्थापित करती है।

डॉ. राजेश्वर सक्सेना का शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में योगदान भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने विश्वविद्यालयी जीवन में आलोचना को जीवंत बहस के रूप में प्रस्तुत किया। उनके लिए कक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की जगह नहीं, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान और प्रश्नाकुलता की भूमि थी। उनके शिष्यों में स्वतंत्र सोच, तर्कशीलता और साहित्यिक नैतिकता के प्रति सजगता विकसित हुई।

यह गुण आज उनके शैक्षिक योगदान को दीर्घकालिक बनाता है, क्योंकि आलोचक केवल अपनी पुस्तकों से नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक विरासत से भी पहचाना जाता है।

नब्बे वर्ष की आयु में भी डॉ. सक्सेना की बौद्धिक सक्रियता यह सिद्ध करती है कि आलोचना उनके लिए पेशा नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है। वे अपने समय से कटकर नहीं, बल्कि उसके भीतर खड़े होकर सोचते हैं। समकालीन साहित्यिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में जब आलोचना अक्सर गुटबन्दी, प्रचार या आत्म-प्रचार का माध्यम बनती जा रही है, तब डॉ. सक्सेना की आलोचना एक नैतिक हस्तक्षेप की तरह सामने आती है।

वे आलोचना को संवाद का सेतु मानते हैं—लेखक और पाठक के बीच, रचना और समाज के बीच, परम्परा और वर्तमान के बीच।

आज जब हम उनके नब्बे वर्ष पूर्ण होने पर विचार करते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति के जीवन की उपलब्धि नहीं, बल्कि हिन्दी आलोचना की एक सुदृढ़ परम्परा का उत्सव है। डॉ. राजेश्वर सक्सेना ने यह सिद्ध किया है कि आलोचना यदि ईमानदार, संवेदनशील और विवेकपूर्ण हो, तो वह न केवल साहित्य को समृद्ध करती है, बल्कि समाज की वैचारिक चेतना को भी गहराई प्रदान करती है।

उनकी आलोचना हमें यह सिखाती है कि प्रश्न पूछना, असहमति दर्ज करना और संवाद बनाए रखना ही साहित्यिक संस्कृति की वास्तविक पूँजी है।

अतः डॉ. राजेश्वर सक्सेना का नब्बे वर्ष पार करना हिन्दी साहित्य के लिए एक अवसर है—अपने आलोचनात्मक मूल्यों पर पुनर्विचार करने का, वस्तुनिष्ठ विवेक को पुनः प्रतिष्ठित करने का और मानवीय प्रतिबद्धता को आलोचना के केन्द्र में लाने का। उनकी दीर्घ, सुसंगत और गरिमामयी आलोचनात्मक यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी, क्योंकि उसमें न केवल विचारों की गहराई है, बल्कि मनुष्य के प्रति अटूट आस्था भी।

(शैलेंद्र चौहान लेखक-कवि हैं और अनियतकालिक पत्रिका धरती के संपादक हैं।)

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