एप्सटीन फाइल्स : पूंजीवाद का साइड इफ़ेक्ट नहीं, इसका अनिवार्य लक्षण

पूंजीवाद इंसान का सिर्फ शोषण नहीं करता, यह इंसानी शरीर को वस्तु बना देता, उसे माल में बदल देता है। जब भी यौन शोषण, बलात्कार, उत्पीड़न से सम्बंधित कोई स्कैण्डल सामने आता है, लिबरल तबके में शॉक, गुस्से और निंदा की लहर दौड़ जाती है या फिर ज्यादा भावुक लोग मध्ययुगीन क़ानून लागू करने की बात करने लगते हैं। कुछ को लगता है कि यह महज राजनीतिक कांड है। हालांकि इस तरह के किसी भी कांड के सार्वजनिक होने पर गुस्सा आना किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिये लाज़मी है और इसका राजनीतिक अर्थ भी अक्सर होता ही है। 

लेकिन इस सबके बावजूद इस तरह के तमाम कांड अपने अंदर एक गहरा और घृणित सच लिये होते हैं। भले ही यह श्रम शक्ति हो, प्रजनन क्षमता हो, यौन उपलब्धता हो या फिर जीवन ही क्यों न हो, पूंजीवाद में मानव शरीर एक विनिमय की वस्तु होता है। वर्ग समाजों के साथ उत्पन्न हुई पितृसत्ता ने स्त्री का शरीर तो बहुत पहले से भोग की वस्तु बना दिया था, लेकिन पितृसत्ता के पूंजीवाद से गठजोड़ ने उसे भोग के साथ उपभोग की वस्तु भी बना दिया है। 

हाल ही में उजागर हुई “एप्सटीन फाइल्स” ने पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। मुख्यधारा के नैरेटिव में इस पूरे कांड को नैतिक और राजनीतिक पतन के तौर पर देखा जा रहा है। बड़े बड़े लोगों, धनी और राजनेताओं, के नाम इसमें आ रहे हैं।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि किन व्यक्तियों के नाम इसमें आ रहे हैं, सवाल ये है कि यह किस व्यवस्था की देन है? क्योंकि जिस व्यवस्था में यह सब हो रहा है या बहुत पहले से होता रहा है, उसमें उन नामों से ज्यादा वह वर्ग और वर्गीय शोषण महत्वपूर्ण है जिसकी यह अनिवार्य परिणीति है। वह कौन सी व्यवस्था है जो इस तरह के कांड और व्यक्ति सृजित करती है, उनका बचाव करती है और उनके अपराधों को दशकों तक छिपा कर रखती है? 

लिबरल नैरेटिव यह है कि इस तरह के कांड इलीट वर्ग का नैतिक पतन है। लेकिन यह पतन जिन परिस्थितियों में पैदा होता है, उनके बारे में कोई बात नहीं करता।

शोषण का आधार नैतिक पतन नहीं बल्कि वर्ग सम्बन्ध होते हैं। पूंजीवादी समाज में आर्थिक शक्ति सामाजिक वर्चस्व में बदलती है, उसे राजनीतिक संरक्षण मिलता है और क़ानून की इम्युनिटी मिलती है। इस तरह के यौन शोषण महज निजी पतन या कानूनी जुर्म नहीं हैं, बल्कि यह प्रभुत्व सम्पन्न वर्ग द्वारा अपनी शक्ति की आज़माइश का घिनौना खेल है। 

जेफ्री एप्सटीन महज एक दलाल या मानव तस्कर नहीं था। वह प्रभु वर्ग का वह घिनौना चेहरा है जो अब दुनिया के सामने उजागर हो रहा है। वह उस केंद्र बिन्दू की तरह था जहाँ वित्तीय पूंजी, राजनीतिक इलीट, अकादमिक प्रतिष्ठा और राज्य सत्ता का संगम हो रहा था।

मानव तस्करी पूंजीवाद में किसी “क्रोनी अर्थव्यवस्था” का अपवाद नहीं है। बल्कि यह तो वैश्विक पूंजी संचय की एक समानांतर शाखा है। यह “उद्योग” गरीबी, बेरोज़गारी, विस्थापन, युद्ध और प्रवासन जैसे हालातों में फलता फूलता है। मेहनतकश वर्ग की स्त्रियाँ और बच्चे यहाँ श्रम शक्ति से भी आगे सीधे उपभोग हेतु विनिमय की वस्तु में बदल दिए जाते हैं। गरीब देशों की स्त्रियाँ और बच्चे, पूंजीपति उपभोक्ताओं के लिए “सस्ते यौन श्रमिक” हैं और इन्हीं हालातों में “यौन पर्यटन” जैसे “बिजनेस” पैदा होते हैं।

एप्सटीन फाइल्स जैसे दूसरे छोटे बड़े मामलों में पीड़ित अक्सर कामगार या आश्रित स्थिति में होते हैं। अपराधी “प्रतिष्ठा”, “नेटवर्क” और “ब्रांड वैल्यू” के कवच में सुरक्षित रहते हैं। ये सभी अलग अलग मामले दिख सकते हैं लेकिन असल में ये मानव शरीर के वस्तुकरण की अलग अलग अभिव्यक्तियाँ हैं।

यही वह बिन्दू है जहाँ आकर उन तथ्यों का “रहस्योद्घाटन” होता है जो अभी तक छिपे हुए लग रहे थे।

इतने साल तक उसे पकड़ा क्यों नहीं गया?

क़ानून की नाक के नीचे ये घिनौने अपराध कैसे होते रहे?

एप्सटीन की मौत के बाद भी उसका नेटवर्क जिन्दा कैसे रहा?

इन सवालों का जवाब किसी षड्यंत्र सिद्धांत में नहीं है। यह तो पूंजीवाद की साफ सुथरी और सामान्य कार्यप्रणाली है। 

राज्य सत्ता, उसके क़ानून, उस क़ानून के रखवाले दिखने में तटस्थ लग सकते हैं। हम सुनते हैं कि क़ानून की नजर में सब बराबर हैं। कम से कम पश्चिमी देशों के लिये तो यह बात लिबरल तबके के लोग पूरे विश्वास के साथ मानते हैं। लेकिन यह भ्रम इस तरह के कांड आते ही भरभरा कर बिखर जाता है। राज्य सत्ता पूंजीपति वर्ग की संगठन शक्ति या सही सही कहें तो उसकी प्रबंधन समिति होती है।

कहते हैं कि Justice delayed is justice denied (न्याय में देरी न्याय का नकार है)। न्याय तो दशकों से नकारा ही जा रहा था, अभी फ़ाइल खुलने के बाद भी या तो महज राजनीतिक चटकारे लग रहे हैं या फिर नैतिक उपदेश।

कुछ लोगों का कहना है कि यह राज्य और क़ानून की असफलता है। लेकिन असल में यह राज्य और क़ानून की सफलता है कि वह इतने वर्ष तक अपने प्रभु वर्ग की और उसके वर्ग हितों की रक्षा करने में सफल रहा है।

अब चूंकि पब्लिक डोमेन में सभी अपराधियों के नाम आ रहे हैं लेकिन यह भी कोई न्याय नहीं है। नाम आना न्याय मिलना नहीं है। बात यह है कि क्या हम यह समझ पा रहे हैं कि इस तरह के कांड पूंजीवाद में आम हैं, भले ही वे उजागर हों या फिर परदे के पीछे रहें।

मार्क्स ने बताया था कि पूंजीवाद सिर्फ वस्तुओं को माल नहीं बनाता, वह तमाम संबंधों और यहाँ तक कि मानव के सार तत्व को भी माल बना देता है। एप्सटीन फाइल्स के उजागर होने से यही बात साबित होती है कि पूंजीवाद में मानव शरीर, मुख्यतः मेहनतकश वर्ग की स्त्रियों और यहाँ तक की मासूम बच्चियों का शरीर, महज श्रम शक्ति के लिये ही शोषित नहीं होता, बल्कि “लक्ज़री कोमोडिटीज” के तौर पर भी उसका उपभोग किया जाता है। यह पूंजीवाद का वह घिनौना सच जिसे महज एक साइड इफ़ेक्ट नहीं कहा जा सकता। बल्कि यह तो इसका एक अनिवार्य लक्षण है।

एप्सटीन 2019 में खुद ही फांसी लेकर मर चुका है, लेकिन उसकी मौत से भी कुछ नहीं बदला। पूंजीवाद वही है, पूंजी का संचय वही है, शोषण वही है, सत्ता का चरित्र भी वही है, क़ानून के “लम्बे” हाथ भी वही हैं। अपराधियों को सजा जरूर मिलनी चाहिये, लेकिन जब तक पूंजीवाद का निर्णायक तौर पर खात्मा नहीं होता तब तक स्थिति में कोई सुधार नहीं आने वाला। 

पूंजीवादी व्यवस्था इंसानी शरीर को माल में बदलती है और फिर उसके उपभोग को नैतिक पतन बताकर पल्ला झाड़ लेती है। एप्सटीन फ़ाइल्स किसी एक व्यक्ति या कुछ विकृत प्रवृत्तियों की कहानी नहीं हैं, ये पूँजीवादी व्यवस्था का घृणित चेहरा हैं, जिसमें शोषण, हिंसा और मासूम बच्चियों की देह का उपभोग महज दुर्घटना नहीं हैं, बल्कि ये सामान्य सामाजिक प्रक्रिया बन चुके हैं।

यदि इन कांडों को हम सिर्फ भ्रष्ट व्यक्तियों, गिरे हुए नैतिक मूल्यों या सत्ता के दुरुपयोग तक सीमित कर देंगे, तो हम उसी वैचारिक भ्रम को मज़बूत करेंगे जिसके सहारे यह व्यवस्था स्वयं को पुनरुत्पादित करती है। असली लड़ाई उन वर्ग संबंधों के विरुद्ध है जो ऐसे व्यक्तियों को जन्म देते हैं, उन्हें संरक्षण देते हैं और उनके अपराधों को दशकों तक इम्युनिटी प्रदान करते हैं।

यौन शोषण, हिंसा और स्त्री देह के बाज़ारीकरण को नैतिक विचलन नहीं, बल्कि पूँजीवादी उत्पादन संबंधों की अनिवार्य परिणति के रूप में समझने की जरूरत है। जब तक पूँजीवाद मौजूद है, तब तक एप्सटीन जैसे नाम बदल बदल कर आते रहेंगे। सवाल नामों का है ही नहीं, बल्कि व्यवस्था का है। और जवाब उस इंकलाब में निहित है जब मेहनतकश मजदूर वर्ग के नेतृत्व में पूंजीवाद का खात्मा कर दिया जायेगा।

(नवमीत नाव की टिप्पणी उनकी फेसबुक पोस्ट से साभार)

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