Friday, October 22, 2021

Add News

capitalism

चीन का एवरग्रैंड संकट देख कर बल्लियों उछलने लगा पश्चिमी मीडिया

चीन में रियल एस्टेट कंपनी एवरग्रैंड के कर्ज संकट पर शुक्रवार को वेबसाइट asiatimes.com ने अपनी खबर की हेडिंग दी- Evergrande bubble popped in time: no Lehman moment (एवरग्रैंड bubble सही समय पर दिख गयाः इसलिए लीमैन जैसा क्षण...

निजीकरण: मिथ और हकीकत

निजीकरण का राजनैतिक अर्थशास्स्त्र समझने के लिए किसी राजनैतिक अर्थशास्त्र में विद्वता की जरूरत नहीं है। सहजबोध (कॉमनसेंस) की बात है कि कोई भी व्यापारी कभी घाटे का सौदा नहीं करता, न ही उसका काम जनकल्याण या देश की...

वे लालू-मुलायम से चिढ़ते हैं या समाजवाद से!

दिल्ली प्रवास कर रहे लालू प्रसाद दो दिन पहले मुलायम सिंह यादव से मिलने क्या गए कि ट्रॉल करने वालों की मौज आ गई। लालू प्रसाद का दोष इतना था कि उन्होंने कह दिया कि देश पूंजीवाद और सांप्रदायिकता...

भारत में जन इतिहास लेखन

इतिहास को लेकर, वतर्मान में हो रहे बदलाव इतिहासकारों के नजरिए को किस तरह बदल देते हैं यह जानना आवश्यक है। भारत के इतिहास के बारे में जब यह विचार पैदा हुआ कि भारत का जन इतिहास लिखा जाना...

महिलाओं और दलितों की दुर्दशा प्रशासनिक विफलता नहीं, सत्ता की राजनीतिक सफलता है: शैलेन्द्र शैली व्याख्यान में संध्या शैली

शैलेन्द्र शैली स्मृति व्याख्यान 2021 में बोलते हुए अखिल भारतीय जनवादी की केंद्रीय कार्यकारिणी सदस्य सुश्री संध्या शैली ने अनेक संवैधानिक प्रावधानों और संरक्षणों के बावजूद महिलाओं और दलितों पर बढ़ते अत्याचारों की वजहें गिनाई। मध्यप्रदेश में दलितों और महिलाओं...

कहां फंसी सोवियत संघ की समाजवादी गाड़ी और चीन ने कैसे मारी बाजी

चीन की कम्युनिस्ट (सीपीसी) पार्टी ने बीते एक जुलाई को जब अपनी सौवीं सालगिरह मनाई, तो दुनिया में ये सवाल एक बार फिर उभरा कि जब समाजवाद के अपने सात दशकों के प्रयोग के बाद अगर सीपीसी प्रासंगिक बनी...

समाजवादियों के पास है सुचारू व्यवस्था

अर्थव्यवस्था के सभी अनुमान ढलान की ओर हैं। वर्तमान सत्ता-पार्टी अफवाहों की विशेषज्ञ है। व्यवस्था संभालना इनको नहीं आता। पशुपालन, खेती, उद्योग, चिकित्सा तथा भूख की समस्या से अनभिज्ञ है। यही कारण है कि जीडीपी गिर रही है। जिस जीएसटी को ये...

आज वक्त मजदूरों को आवाज़ दे रहा है!

सदियों दासता, सामंतवाद से संघर्ष करने के बाद दुनिया में मज़दूरों ने 1 मई 1886 को अपने अस्तित्व का परचम फ़हराया। महज 105 साल में ही पूंजीवाद ने अपने पसीने की महक से विश्व का निर्माण करने वाले मेहनतकश...

कोविड-19 भी पूंजीवाद से पैदा होने वाला एक संकट

जितने लोग दूसरे विश्वयुद्ध में मारे गये थे, उससे कहीं ज़्यादा लोग ‘तीसरे विश्वयुद्ध’ में मारे गये। यह तीसरा विश्वयुद्ध नज़र नहीं आया, लेकिन यह चार दशकों तक चलता रहा। पूंजीवाद की यही सबसे बड़ी ख़ासियत है कि वह...

पूंजीवाद जनसंहार का हथियार बन चुका हैः अरुंधति रॉय

(अरुंधति रॉय के कई परिचय हैं। वे बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका हैं; एक निबंधकार हैं, जिनकी नवीनतम रचना ‘आजादी’ पिछले साल ही प्रकाशित हुई है; और वे एक राजनीतिक कार्यकर्ता भी हैं। भारत में रहने वाली वह ऐसी लेखिका...
- Advertisement -spot_img

Latest News

यूपी में ‘आप’ के बाद अब अपना दल की यात्रा पर भी पाबंदी

दो दिन पहले आम आदमी पार्टी की तिरंगा संकल्प यात्रा पर रोक के बाद आज शुक्रवार को वाराणसी में...
- Advertisement -spot_img