मार्क्सवादी चिंतक, प्रतिभाशाली अधिवक्ता तथा शोषित-वंचित वर्गों के सच्चे हितैषी दिवंगत सत्यनारायण भट्टाचार्य उर्फ सत्तो बाबू का स्मृति दिवस 7 फरवरी को मनाया गया।
इस अवसर पर उनके समाधि स्थल पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में स्थानीय लोगों सहित झारखंड के अन्य क्षेत्रों से भी लोग भी शामिल हुए और हर साल की तरह इस साल भी सत्तो दा याद किए गए।
कहना ना होगा कि सत्यनारायण भट्टाचार्य एक वकील ही नहीं अन्याय और जुल्म के खिलाफ एक फाइटर थे, जिनका विचार चरमराती व्यवस्था में लोगों को आशा की किरण दिखाता था। असंगठित मजदूर जिनकी प्रेरणा से अंधेरे में रौशन होते थे। यही कारण है कि उनके स्मृति दिवस पर कानूनविदों से लेकर मीडिया, मजदूर से लेकर किसान, सभी जुटे। सभी ने एक स्वर में कहा सड़ी गली व्यवस्था में आज सत्तो बाबू होते तो अधिक प्रासंगिक होते।
देश की किसान मजदूर और युवा विरोधी व्यवस्था और आवाज को दबाने की कोशिश की सभी ने चर्चा की तथा गोलबंदी की आवश्यकता पर बल दिया। विष्णु कुमार, नासिर खान, राजा चक्रवर्ती की टीम ने संगीत के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी।
सत्यनारायण भट्टाचार्य के बारे में
उल्लेखनीय है कि सत्तो दा उर्फ सत्यनारायण भट्टाचार्य का जन्म 1 जनवरी, 1944 को पश्चिम बंगाल के वर्धमान में डॉ देव नारायण भट्टाचार्य एवं मां मालिना देवी के घर में हुआ था। इनके पिता डा. देवनारायण भट्टाचार्य 1967 में वर्धमान से कतरास (धनबाद) पूरे परिवार के साथ आ गये थे। सत्तो दा अपने चार भाइयों में से मंझले थे।
इन्होंने प्रारंभ की पढ़ाई कलकत्ता में की, वहीं कतरास आने बाद बीडीएम हाई स्कूल मलकेरा (कतरास) में पूरी की तथा ग्रेजुएशन की पढ़ाई संत कोलंबस कॉलेज, हजारीबाग से इतिहास में ऑनर्स किया और छोटांगपुर लॉ कॉलेज से एल एल बी यानी कि वकालत की डिग्री हासिल की।
उन्होंने 7 जुलाई 1970 को वकालत शुरू की।
वो शुरू से ही भगत सिंह, कॉल मार्क्स, लेनिन एवं अन्य प्रगतिवादी विचारों से प्रेरित थे और उन्होंने कॉलेज की जिंदगी से लेकर वकालत के पेशे में भी इन विचारों पर अमल किया।
उन्होंने कई मजदूर आंदोलन को मार्क्सवादी चिंतकों के साथ मिलकर न्यायालय से जल, जंगल, जमीन को लेकर लड़ा। उस समय कोयलांचल के रूप में जाने जाने वाले धनबाद क्षेत्र में मजदूरों व आदिवासियों के शोषण ने उन्हें काफी व्यथित किया और वे मजदूरों के हक-अधिकार की लड़ाई के लिए एक क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन के गठन के बारे में सोचने को मजबूर हुए। क्योंकि उस समय वहां मौजूद सारे ट्रेड यूनियनों पर बड़े-बड़े माफियाओं का नियंत्रण था। सभी ट्रेड यूनियन सरकार व मालिकों के पुछल्ले थे।
उन्होंने मजदूरों के हक-अधिकार की लड़ाई सहित मुकदमों में भी अपनी ज्ञान, बुद्धि, कौशल से लोहा मनवाया। मजदूरों, शोषितों, खट कमाऊ, जनता के बीच में एक सशक्त आवाज बने। 1989 में रजिस्ट्रेशन नम्बर 3113 के माध्यम से एक मजदूर संगठन “मजदूर संगठन समिति” को तत्कालीन बिहार में रजिस्ट्रेशन करवा कर इनकी शाखाएं धनबाद, बोकारो थर्मल, गिरिडीह, मधुबन, हजारीबाग, गोमिया, तथा बिहार, बंगाल,के हर कोने पर स्थापित कीं।
एक तरफ वे ‘मजदूर संगठन समिति’ के काम-काज में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे, तो दूसरी तरफ वकालत के क्षेत्र में भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाते थे। जब बोकारो जिला का निर्माण हुआ, तो 1983 में बने बोकारो बार एसोसिएशन के प्रथम अध्यक्ष भी वही बने। 1983 से 1985 तक वे बोकारो बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे। 1997 से लेकर लगातार 10 वर्षों तक यानी 2007 तक वे धनबाद बार एसोसिएशन के महासचिव रहे।
सत्यनारायण भट्टाचार्य उर्फ सत्तो दा के कुशल नेतृत्व में ‘मजदूर संगठन समिति’ ने तत्कालीन बिहार व पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में कई सफल व ऐतिहासिक मजदूर आंदोलन का नेतृत्व किया, इसी का परिणाम था कि जल्द ही ‘मजदूर संगठन समिति’ को तत्कालीन एमसीसी का मुखौटा संगठन बताकर सरकार ने दमन करना चाहा। लेकिन सरकार के तमाम दमनात्मक कार्रवाइयों का काॅमरेड सत्तो दा ने डटकर मुकाबला किया।
‘मजदूर संगठन समिति’ की बढ़ती लोकप्रियता व जनपक्षधरता से घबराकर 22 दिसम्बर, 2017 को झारखंड की तत्कालीन भाजपाई रघुवर दास की सरकार ने सत्तो दा के द्वारा पंजीकृत कराये गये ट्रेड यूनियन ‘मजदूर संगठन समिति’ को भाकपा (माओवादी) का मुखौटा संगठन बताकर प्रतिबंधित कर दिया गया था और झारखंड उच्च न्यायालय ने उक्त प्रतिबंध को चुनौती देने वाली एक याचिका पर 9 फरवरी 2022 प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया।
उसके बाद पुनः ‘मजदूर संगठन समिति’ को 24 नवंबर 2023 को हेमंत सोरेन सरकार ने पुनः प्रतिबंधित दिया।
बता दें कि इनका देहांत 7 फरवरी 2012 को हुआ।
कहा जाता है कि इनके देहांत से पूरे झारखंड में कानून, समाज, खेल, शिक्षा एवं गरीबों, पिछड़ों, शोषितों, मेहनतकशों की आवाज को अपूरणीय क्षति हुई।
बता दें कि शहीद भगत सिंह स्मारक समिति एवं श्रमजीवी विकास ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में कतरास भंडारीडीह में वरीय अधिवक्ता सह मजदूर नेता कामरेड सत्यनारायण भट्टाचार्य के स्मृति दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया।
श्रद्धांजलि सभा में लेखक, कवि, व शिक्षक महादेव चटर्जी की अध्यक्षता में कार्यक्रम संपन्न हुआ।
भाकपा माले के पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य हलधर महतो एवं त्रिवेणी रवानी ने असंगठित मजदूर मोर्चा एवं श्रम विकास ट्रस्ट का झंडोत्तोलन कर कार्यक्रम की शुरुआत की। इप्टा के कलाकार विष्णु कुमार, नासिर खान एवं राजा चक्रवर्ती ने क्रांतिकारी गीत प्रस्तुत किया। अवसर पर वक्ताओं ने मजदूर विरोधी नीतियों की निंदा की और कहा कि केंद्र की मोदी सरकार एक-एक सरकारी संपत्ति को बेच रही है।
इस अवसर पर वरिष्ठ वकील व बियाडा के पूर्व अध्यक्ष विजय कुमार झा ने कहा कि सत्तो दा एक अच्छे वकील से ज़्यादा एक अच्छे इंशान थे, एक अच्छे ट्रेड यूनियनिस्ट थे, जो मजदूरों के हित के लिए हमेशा मैनेजमेंट से लड़ते थे। 1974 के छात्र आंदोलन में छात्र जब हम धरना-सत्याग्रह-अनशन में शामिल होते थे तो कोई नेता हमलोगों से सटता भी नहीं था। ऐसे समय में सत्तो दा बेहिचक हमलोगों के पास आकर अनशन – धरना को समाप्त करवाते थे, जूस पिलाते थे और मंच से भाषण भी देते थे।
सत्तो दा का सम्पूर्ण जीवन मजदूरों, किसानों तथा गरीबों के न्याय के लिए समर्पित रहा। उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया तथा कोर्ट में निः शुल्क वकालत करके असहाय लोगों को अन्याय के विरुद्ध लड़ने का साहस प्रदान किया। कोयलांचल क्षेत्र में मजदूर हितों की रक्षा के लिए उनकी आवाज सदैव मुखर रही तथा उन्होंने कभी अन्यायी व्यवस्था के समक्ष समर्पण नहीं किया।
मार्क्सवादी समन्वय समिति के नेता मुजफ्फर हुसैन अंसारी ने कहा कि सत्तो बाबू का जीवन एक आदर्श है। उन्होंने धन-दौलत, पद या किसी भी लालच के आगे अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। उनके स्मृति दिवस पर हमें उनके अधूरे सपनों को साकार करने तथा मजदूर-किसान आंदोलनों की विरासत को और सशक्त बनाने का संकल्प लेना चाहिए।
चंदाहा के मुखिया प्रतिनिधि जीतुन अंसारी, कॉमरेड गया राम शर्मा तथा दर्जनों अन्य साथियों ने भी इस अपील का समर्थन करते हुए कहा कि यह सभा मात्र श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि गरीबों के संघर्ष को नई दिशा प्रदान करने का माध्यम बनेगी। उन्होंने सभी से आग्रह किया कि सत्तो बाबू की स्मृति में आज हमें उनके आदर्शों को अपनाकर समाज में न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाना है। भाकपा माले, श्रमजीवी विकास ट्रस्ट तथा अन्य संगठनों द्वारा आयोजित इस श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित होकर सत्तो बाबू की स्मृति को अमर रखने तथा उनके बलिदान से प्रेरणा लेकर सामाजिक न्याय की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया गया।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)