भाषा सिंह की कविता का साथ और उसके अर्थात् की तलाश

जितना सुख मिल रहा है
क्यों नहीं सुखी रह सकती उसमें
क्यों चाहिए,
पूरी रोटी
पूरा रिश्ता
भरपूर प्रेम
पूरा हक
और इस तरह से सनातनी एकतारा पर जपने वाला वाला तान
कानों में पिघलते सीसे की तरह उड़ेला जाता …
…जिस विधि राखे राम उसी विधि रहिए …।

भाषा सिंह के काव्य संग्रह ‘योनि-सत्ता संवाद, पलकों से चुनना वासना के मोती’ के पुस्तक के शीर्षक वाली कविता का पहला बंद है। इस शीर्षक से लंबी कविता का अंत इस प्रकार होता है:
ब्राम्हणवाद को शास्तार्थ/में चित कर/थामे हुए सावित्री बाई फुले और फातिमा शेख का हाथ/दिखातीं रास्ता सिखातीं/सत्ता से संवाद…/वासना के मोतियों को पलकों से चुनने का हुनर।

यह कविता एक प्रतिपक्ष के निर्माण की चेतना की चेतना तक ले जाती है। यह प्रतिपक्ष सत्ता के साथ टकराती नारी चेतना के साथ निर्मित होती है। यह उनकी कविता संग्रह का सबसे मजबूत पक्ष है जो मां को अपने पिता के साथ बराबरी पर खड़ा न होने पर सवाल बनकर सामने आता है।

इस संग्रह की कविताएं अपनी नारी चेतना से जितना ही देह की अस्मिता, उसकी भाषा में ठोस अभिव्यक्तियों में उतरती जाती हैं, मांसल रूपाकार में बदलती जाती हैं और पूरी जीजीविषा के साथ सामने आती हैंः
अब सफेद बालों की मालकिन/मैं/गुजार आई बिखेरती आई/वासना के मोती इसी हसरत में/गढ़ ही लूंगी प्रेमी/वरना मर्द तो मर्द ही रहते हैं/देह और मन की सिलबट्टे पर पीस कर ही/गढ़ना पड़ता है हर औरत को/अपना प्रेमी।

कविता का यह स्वर पूरे संग्रह में बना रहता है। कभी यह सत्ता के प्रति नफरत, फासीवादी रूझानवाले नेता को चुनौती, लड़ने वाली स्त्रियों की तलाश, अपमान से लथपथ श्रमिक महिलाओं का स्वर बनकर यह सामने आती है और कभी खुद को तलाशने में ये सामने आती हैं:
रूखे हो चले बालों को/छोड़ दिया है खुला/चाहती हूं बौराई सी/गरम हवा/बालों को बिखरा दे/उलझा दे/और मैं जियूं एहसास/तेरी उंगलियों का।

इस संग्रह की कविताएं देह की भाषा और उसकी अस्मिता को लेकर जितना मुखर हैं, उतना ही मुखर यह सत्ता के प्रति विरोध पक्ष बनकर खड़ी होती हैं। ‘अमन की बेटियां’ और ‘राजा नंगा है तो नंगा ही कहना’ जैसी कविताएं इसी पक्ष को लेकर सामने आती हैं। वह नफरत को प्रतिरोध के एक पक्ष की तरह पेश करती है और वह एक नई भाषा में कविता कहने का प्रयास करती हैं। जो वर्तमान परिवेश में असफल होती हुई दिखती है।

इस संग्रह में एक लंबी कविता है ‘अपने लहू में डुबोई कलम की निब’। यह भाषा सिंह की पत्रकारिता से कविता की ओर उतरता हुआ भाव हैः तुम्हारे जुल्म के खिलाफ/खड़ी हूं मैं गाजा में/तुम्हारे बमों के गुबार के नीचे/ढूंढ़ रही हूं अपनी गुम औलादों को/ मैं खड़ी हूं/दिल्ली-मेवात-भोपाल-गोरखपुर….में/तुम्हारे हत्यारे बुल्डोजर के सामने/ढूंढ़ रही हूं गुम हो रहे अपने संविधान को।

भाषा सिंह की यह कविता जुल्म के उन क्षणों से रूबरू कराती है जिसका प्रतिरोध जरूरी है। भावावेष को व्यक्त करने में वह अंग्रेजी शब्दों का सीधा प्रयोग करती हैं और प्रतिबद्धता के लिए वह सीधे वाक्यों का भी प्रयोग करती हैं। लेकिन, उनकी संविधान की चिंता एक सीमा रेखा खींच देती है जहां से उनकी कविता उलझती हुई दिखती है। यहां सवाल यही है कि संविधान को कविता के किस बिम्ब में रखकर देखा जाए और उसके निहातार्थ को किस तरह से समझा जाए!

किसी कवि को किसी खांचे में रखकर चलना उपयुक्त नहीं होता और उससे भी ज्यादा किसी कविता को पढ़ते हुए तो और भी ज्यादा सतर्क रहना चाहिए और कविता की स्वायत्तता को ध्यान में रखना चाहिए। मुक्तिबोध के शब्दों में, ‘रचना प्रक्रिया, वस्तुतः एक खोज और एक ग्रहण का नाम है। अभिव्यक्ति के कार्य के दौरान में कवि नयी खोज भी कर लेता है।(काव्य की रचना प्रक्रिया)।’ बिम्ब-विधान भी इसी का हिस्सा है जो कविता को उसकी संरचना में नया अर्थ प्रदान करता है। ‘

संविधान’ का बिम्बविधान उनकी कविता के एक स्वर में बदलता हुआ दिखता है जो उन्हें नक्सलबाड़ी की काव्य परम्परा से अलग करने की ओर ले जाता है।

संवेदनात्मक उद्देश्य अपने साथ कल्पना, भावना की उड़ान में अपने साथ बुद्धितत्व को बनाये हुए आगे बढ़ता है और अभिव्यक्ति के क्षणों में यह या तो बिम्बों का सहारा लेता है या सपाट वाक्य संरचना में शब्दों का सघन प्रयोग करता है जो कविता की इस संरचना में अर्थ को एक विस्फोट की तरह सामने लेकर आते हैं।

मुक्तिबोध और बाद में धूमिल जैसे कवियों ने बिम्बों को गढ़ने और सपाट वाक्यों में शब्दों को जो रवानगी दी उसे नक्सलबाड़ी के कवियों ने, भारत की सभी भाषा के कवियों ने काफी ऊंचाई तक पहुंचाया। आलोक धन्वा और गोरख पांडे जैसे कवियों ने न सिर्फ नये बिम्ब विधान गढ़े, उनके शब्द कविता की नई तमीज को भी गढ़ रहे थे।

भाषा सिंह की कविता में जब बंजारन एक बिम्ब बनकर आती है तब उसका कठोर यथार्थ उससे कटकर एक रोमांस की रचना करता है। एक ऐसा ही बिम्ब राष्ट्रपति भवन का है जो कथ्य के भावों से उलझता हुआ दिखता है।

भाषा सिंह की कविताएं एक पत्रकार, एक सामाजिक कार्यकर्ता से मुलाकात कराती हैं जो इन सबके बीच अपनी अस्मिता को सामने रखती है। वह अपने इस संग्रह में बहुत सी परम्पराओं को तोड़ती जाती हैं और बेहद मुखर होकर देहभाषा को अपने शब्दों से गढ़ते हुए उसे कविता में ढालती जाती हैं। वह इस ढालने की प्रक्रिया को भी शब्दों की गढ़न में पेश करती हैं।

किसी साहित्य और खासकर काव्य संग्रह को पढ़ते समय सबसे बड़ी बाधा उस कवि से परिचय, उसे जानना होता है। कई बार यह अच्छी भूमिका भी निभा देता है। लेकिन, भाषा सिंह की कविता को पढ़ते हुए अलग ही अनुभव रहा। मैंने उन्हें कभी भी नक्सलबाड़ी की धारा से बाहर रखकर नहीं देखा। उन्हें जनसंस्कृति मंच और उसकी पत्रिका के मोर्चे पर सक्रिय साथी की तरह देखता रहा हूं। उनकी कविताएं इस परम्परा के स्वर का कुछ हद तक हिस्सा हैं लेकिन मुख्यतः इससे ये बाहर जाती हुई एक नई दुनिया बनाते हुए दिखती हैं।

अस्मिता खुद का एक बयान होती है जो सिर्फ स्वतंत्रता की मांग नहीं करती, वह अपनी सत्ता की मांग भी करती है। सत्ता तो कभी भी बिना लड़े नहीं मिलती। इस मोर्चे पर यह कविता खुलकर अपनी बात करती है।

पुस्तक: योनि-सत्ता संवाद, पलकों से चुनना वासना के मोती

लेखक: भाषा सिंह

प्रकाशक: गुलमोहर किताब

मूल्य: 250 रूपये

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