Wednesday, October 27, 2021

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किताब समीक्षा: कविता की जनपक्षधरता पर शैलेंद्र चौहान की नज़र

शैलेंद्र चौहान बुनियादी तौर पर कवि हैं उन्होंने कुछ कहानियां और एक उपन्यास भी लिखा है। लघु पत्रिका ‘धरती’ का एक लंबे अंतराल तक संपादन भी किया है। आलोचनात्मक आलेख और किताबों की समीक्षा गाहे-बगाहे लिखते रहे हैं। आठवें दशक से...

पूंजी की सभ्यता-समीक्षा के कवि मुक्तिबोध

मुक्तिबोध गहन संवेदनात्मक वैचारिकी के कवि हैं। उनके सृजन-कर्म का केंद्रीय कथ्य है-सभ्यता-समीक्षा। न केवल कवितायें बल्कि उनकी कहानियां, डायरियां, समीक्षायें तथा टिप्पणियां सार रूप में सभ्यता समीक्षा की ही विविध विधायें हैं, वह जो उपन्यास लिखना चाहते थे,...

आलोचना पत्रिका के बहानेः बाजार और जंगल के नियम में कोई फर्क नहीं होता!

पांच दिन पहले ‘आलोचना’ पत्रिका का 62वां (अक्तूबर-दिसंबर 2019) अंक मिला। कोई विशेषांक नहीं, एक सामान्य अंक। आज के काल में जब पत्रिकाओं के विशेषांकों का अर्थ होता है कोरा पिष्टपेषण, एक अधकचरी संपादित किताब, तब किसी भी साहित्यिक...

पुस्तक समीक्षा: झूठ की ज़ुबान पर बैठे दमनकारी तंत्र की अंतर्कथा

“मैं यहां महज़ कहानी पढ़ने नहीं आया था। इस शहर ने एक बेहतरीन कलाकार और प्रतिभाशाली रचनाकार को निगल लिया था। उसकी डायरी एक उत्कृष्ट नमूना थी। इस बात की गवाही थी कि वो नायक था। लेकिन उसके होने...

प्रशांत ने स्वीकार की सजा, भरेंगे 1 रुपये का जुर्माना

नई दिल्ली। वरिष्ठ वकील और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करते हैं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक रुपये के लगाए गए जुर्माने को अदा...

सुप्रीम कोर्ट की आरक्षण की समीक्षा की बात लोकतंत्र और सामाजिक न्याय विरोधी

कोरोना महामारी और लॉकडाउन के बीच केन्द्र सरकार मेहनतकशों के प्रति चरम क्रूरता दिखा रही है तो दूसरी तरफ संकट के इस दौर को संविधान, सामाजिक न्याय व लोकतंत्र पर हमले के अवसर के बतौर भी इस्तेमाल कर रही...

पंकज बिष्ट के योगदान का मूल्यांकन

पंकज बिष्ट पर यह विशेषांक क्यों?... इस सवाल का जवाब देने से पहले संक्षेप में 'बया’ के पंद्रहवें वर्ष में प्रवेश तक के सफ़र में विशेषांक निकालने को लेकर जो हमारी संपादकीय सोच रही है, उसके बाबत बताना ज़रूरी...
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हाय रे, देश तुम कब सुधरोगे!

आज़ादी के 74 साल बाद भी अंग्रेजों द्वारा डाली गई फूट की राजनीति का बीज हमारे भीतर अंखुआता -अंकुरित...
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