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Monday, September 27, 2021

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उर्मिलेश

उत्तराखंड डायरी-2: उत्तराखंडी राजनीति का ‘बाम्हन-ठाकुर फ्रेम’और पचपन फीसदी सबाल्टर्न आबादी

तीन-चार दिनों के उत्तराखंड-प्रवास में राजनीतिक दलों के नेताओं से मिलने की बजाय मैंने समाज के कुछ जागरूक और सक्रिय लोगों से मुलाकात पर ज्यादा जोर दिया। एक पत्रकार के लिए यह कोई अच्छा फैसला नहीं था। वह भी...

उत्तराखंड डायरी-1: दो शताब्दियों की यादें, गिर्दा की कोठरी और पहाड़ के नये-पुराने दोस्त

फरवरी, 2020 के बाद यह पहला मौका था, जब मेरे जैसा घुमक्कड़ अपने घर-शहर से बाहर निकला। कोविड-19 के प्रकोप और आतंक ने मनुष्यता को जितना सताया और डराया है, वह अभूतपूर्व है। साढ़े छह दशक के अब तक...

स्व-श्रेष्ठता के दंभ में हर किसी को खारिज करने के खतरे

अभी हाल की बात है, एक दिन मैंने अपने फेसबुक पेज पर दक्षिणपंथी खेमे के एक वरिष्ठ संपादक की असमय मौत पर दुख प्रकट करते हुए संक्षिप्त श्रद्धांजलि-लेख लिखा। इस पर कुछ ‘वामपंथी’ और ‘समाजवादी’ किस्म के बुद्धिजीवी खासे...

अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता-वापसीः अमेरिका की मजबूरी, समर्पण या किसी नये षड्यंत्र का प्रकल्प?

अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी को लेकर कुछ भारतीय मीडिया प्लेटफार्म्स और कथित सामरिक विशेषज्ञ बेवजह भ्रम फैला रहे हैं। उन्हें यह तालिबान के समक्ष अमेरिका के समर्पण जैसा कुछ लग रहा है। कुछ को इसमें वियतनाम...

मीडिया संस्थानों पर छापेमारी के भारी विरोध के बीच संकीर्णता की कुछ आवाजें

गुरुवार की सुबह, दैनिक भास्कर समूह के दफ्तरों और उसके मालिकों के घरों पर सरकारी एजेंसियों की छापेमारी की खबर सुनकर मेरी सुबह की चाय का मजा ही बिगड़ गया। कुछ ही समय बाद पता चला कि लखनऊ (यूपी)...

क्या बसपा अब राजनीतिक रूप से संदिग्ध हो गई है?

कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती जी ने दो बड़ी घोषणाएं कीं। पहली ये कि उनकी पार्टी यूपी का चुनाव अपने बल पर लड़ेगी। दूसरी कि जिला पंचायत प्रमुखों के चुनाव में वह...

कुछ चुनाव-रणनीतिकार अगर सीएम-पीएम बनाने लगें तो बचे-खुचे लोकतंत्र का क्या होगा?

नेताओं और दलों को 'चुनाव रणनीति' बताने और बनाने वालों के 'बाजार' के किसी 'कामयाब कारोबारी' को अगर ये भ्रम हो जाय कि नेता क्या, वह किसी को मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री भी बना सकता है तो इसे आप क्या...

योगी का फैसला दिल्ली को नहीं, नागपुर को करना है!

संघ-भाजपा और योगी की तमाम तिकड़मी राजनीति के बावजूद उनके सामने यहीं एक बड़ा अवरोधक आ खड़ा होता है। वह है-कोरोना संक्रमण से बेहाल और तबाह हुए लोगों के प्रति शासन का रवैया। शिक्षक हों या आम लोग, अवर्ण...

उपन्यास, आलोचना और वीरेंद्र यादव का समाज-बोध

मार्क्सवादी साहित्यालोचक वीरेंद्र यादव के कुछ लेख और टिप्पणियां मैंने पढ़ी थीं। पर उनकी आलोचनात्मक पुस्तक पढ़ने का पहला मौका हाल के दिनों में मिला। यह पुस्तक है-उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता।* 2017 में पुस्तक का दूसरा संस्करण प्रकाशित...

कोराना से निपटने की सरकारी नाकामी हो या वैकल्पिक राजनीति की दरिद्रता, दोनों का असल कारण है-हिन्दुत्व !

दुनिया में  हम सचमुच अनोखे देश हैं! इसलिए कई बार विश्वास नहीं होता कि आजादी के सात दशक बाद भी हम सही मायने में एक राष्ट्र बन पाये हैं! आजादी से पहले और उसके बाद देश के कई बड़े...

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किसानों के ‘भारत बंद’ का जबर्दस्त असर; जगह-जगह रेल की पटरियां जाम, सड़क यातायात बुरी तरीके से प्रभावित

नई दिल्ली। कृषि कानूनों के खिलाफ बुलाए गए किसानों के 'भारत बंद' का पूरे देश में असर दिख रहा...
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