कुछ चुनिंदा एंकरों के बहिष्कार मात्र से मीडिया का मिज़ाज क्यों नहीं बदलेगा?

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इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव एलायंस (INDIA) ने देश के कुछ प्रमुख टीवी चैनलों के 14 एंकरों के कार्यक्रमों में अपना प्रवक्ता न भेजने का फ़ैसला किया है। निश्चित रूप से विपक्षी दलों के एलायंस का यह बहुत बड़ा फ़ैसला है। पर यह फ़ैसला क्या कारगर भी होगा? क्या इससे सत्ताधारियों के भोंपू या प्रचार का उपकरण बने इन टीवी चैनलों के स्वरूप, सोच और प्रस्तुति में फ़र्क़ आयेगा? जिन कारणों और कारकों से इन कथित चैनलों को समाज के एक हिस्से में ‘टीवीपुरम’ या ‘गोदी मीडिया’ कहा जाता है, क्या उन कारणों और कारकों का कोई निराकरण होगा?

मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान और सत्ताधारी दल की नीतियों से असहमत लोगों के बड़े हिस्से में इस फ़ैसले का स्वागत होता दिख रहा है। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर इस फ़ैसले का समर्थन करती टिप्पणियों की बाढ़ सी आयी हुई है। पर मुझे लगता है, टीवीपुरम् के 14 एंकरों के बहिष्कार का फ़ैसला जल्दबाज़ी में किया गया एक गैर-गंभीर फ़ैसला है। इसके पीछे न तो कोई सुचिंतित राजनीति है और न ही हमारे मीडिया, ख़ासतौर पर टीवीपुरम् के बारे में कोई गंभीर समझदारी है।

कुछेक टीवी चैनलों को छोड़कर टीवीपुरम् का बड़ा हिस्सा सन 2014 से पहले भी सूचना, समाचार और विचार की प्रस्तुति और प्रसारण का विश्वसनीय और सुसंगत मंच कभी नहीं था। दूरदर्शन को सदैव सरकारी और निजी टीवी चैनलों के बड़े हिस्से को निहित स्वार्थों का प्रचारक कहा जाता था। यह सिलसिला लगातार जारी रहा और आज न्यूज़ चैनलों को सत्ताधारियों का उपकरण ही नहीं, सत्ता संरचना का हिस्सा तक माना जाने लगा है।

बड़ा सवाल है, कुछ टीवी एंकरों के बहिष्कार मात्र से देश के इन बड़े न्यूज़ चैनलों के सत्ता संरचना में पूरी तरह समा जाने जैसी अभूतपूर्व और भयानक सच्चाई को क्या बदला जा सकता है? बदलने की बात तो बहुत दूर की रही, क्या इन न्यूज़ चैनलों के ‘टीवीपुरम’ बनने की समस्या को कारगर ढंग से संबोधित भी किया जा सकता है?

जिन एंकरों के बहिष्कार का ऐलान किया गया है, उनमें ज़्यादातर को मैं जानता हूं। ऐसा नहीं कि इन एंकरों को मैं ‘अच्छा पत्रकार’ या ‘अच्छा एंकर’ मानता हूं पर यह भी सही है कि इनमें ज़्यादातर हमेशा से ऐसे नहीं थे। पिछले कुछ सालों में इनका बड़े पैमाने पर ‘व्यक्तित्वांतरण’ हुआ है। केवल इनका ही नहीं, इनकी तरह अनेक मीडियाकर्मियों का हुआ है। इसके बग़ैर वे इन चैनलों में क्या टिक सकते थे? अनेक बेहतर पत्रकारों या एंकरों को बाहर होना पड़ा या बाहर कर दिये गये। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ज़्यादातर टीवी चैनलों में आज पत्रकारिता और प्रोफेशनलिज्म के लिए जगह नहीं है।

विभिन्न जन संचार संस्थानों से निकले युवा पत्रकार जब ऐसे संस्थानों में नियुक्ति पाते रहे हैं तो उनमें सबका नहीं तो एक बड़े हिस्से का सपना अच्छी पत्रकारिता करते हुए अच्छा वेतन पाना और अच्छा जीवन जीने का होता है। लेकिन वहां काम करते हुए वे तेज़ी से बदलते हैं और अंततः सत्ता संरचना और निहित स्वार्थों के पुर्ज़े में तब्दील हो जाते हैं। जो नहीं बदलते, उनका हस्र बुरा होता है। दरअसल, यह बात हर कोई जानता है कि इन चैनलों में होने और मोटी पगार पाने के लिए एंकरों का सत्ताधारियों का प्रचारक या अघोषित प्रवक्ता होना पड़ता है या कम से कम वस्तुगत और तथ्यपरक पत्रकारिता से दूर होना पड़ता है।

इसलिए इस परिदृश्य की जटिलता को समझे बग़ैर महज़ कुछ चुनिंदा एंकरों के बहिष्कार का फ़ैसला अपने मक़सद में नाकाम होने के लिए अभिशप्त है। फ़ैसला करने वालों ने यह भी नहीं बताया कि उन्होंने इन 14 का चयन कैसे किया, 14 के बदले 24 या 34 का क्यों नहीं किया? हर स्तर और दृष्टि से इंडिया एलायंस का यह फ़ैसला बचकाना है, इसमें प्रौढ़ता का अभाव हैं। इसमें त्वरित आवेश भर है। यह ऐसी प्रतिक्रिया है, जिससे टीवीपुरम् की मौजूदा समस्या- उसके पूरी तरह सत्ता-संरचना का हिस्सा हो जाने और उनके मीडिया की भूमिका को पूरी तरह त्यागने जैसे मसलों का तनिक भी समाधान नहीं होता।

बड़ी दिलचस्प बात है, ये 14 एंकर अलग-अलग चैनलों के हैं। इनमें कुछ बड़े चैनल कहलाते हैं तो कुछ बड़े मीडिया घराने माने जाते हैं। लेकिन एक चैनल अपवाद है, जिसके एक भी एंकर का नाम 14 की सूची में शामिल नहीं है। क्यों? क्योंकि उस चैनल को आधुनिक जीवन बोध और अपेक्षाकृत बेहतर सोच वाले दो प्रोफेशनल्स ने स्थापित किया था। वह NDTV है। प्रणय रॉय और राधिका रॉय के भी आलोचक हो सकते हैं और कुछ मुद्दों पर मैं भी रहा हूं।

पर इस बात से शायद ही किसी को असहमति हो कि इन दोनों ने अपने चैनल को सिर्फ़ बड़े बिज़नेस और निजी फ़ायदे या मुनाफ़े के लिए नहीं खड़ा किया था। उनके पास मीडिया का एक परिप्रेक्ष्य था। पत्रकारिता के सरोकारों के प्रति उनमें निश्चय ही एक हद तक सजगता थी। उस चैनल का स्वामित्व अब बदल चुका है। देश के एक बड़े कॉरपोरेट घराने के पास आ चुका है। पर तमाम फेरबदल और विवादों के बावजूद उस चैनल में कुछ तो बचा हुआ है कि बहिष्कार की सूची में डालने के लिए इंडिया एलायंस वालों को उसका एक भी एंकर नहीं मिला।

क्या एलायंस वाले यह बात समझ पा रहे हैं कि टीवीपुरम के एंकरों-संपादकों का रवैया बीते दसेक सालों में इस कदर क्यों बदला है? ये गणमान्य नेता इस सवाल को मेरी धृष्टता न समझें। चूंकि लंबे समय तक मैं देश के सभी प्रमुख चैनलों की सायंकालीन चर्चा के कार्यक्रमों का (अगस्त, 2019 तक) एक हिस्सेदार रहा हूं इसलिए मैंने इन चैनलों के संपादकों-पत्रकारों के सोच और रूख में हो रहे बदलाव को बहुत नज़दीक से देखा-समझा है। इंडिया एलायंस के शीर्ष नेतृत्व को समझने की ज़रूरत है कि मीडिया, ख़ासतौर पर टीवीपुरम के पत्रकारों-एंकरों में बदलाव किस तरह और क्यों आया है? पत्रकारिता के मूल्यों से उनके संपूर्ण विच्छेद की जड़ें कहां हैं?

इंडिया एलायंस की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है जो आज़ादी के बाद लगातार कई दशक सत्ता में रही। आज भी सबसे अधिक समय तक सत्ता में रहने का रिकॉर्ड उसी के खाते में है। इसलिए यह कोई नहीं कह सकता कि वह भारत के मीडिया की संरचना, स्वामित्व, निवेश के स्वरूप और पत्रकारों-संपादकों की भर्ती के तौर तरीक़ों से अनजान है। छोटी-मझोली या क्षेत्रीय स्तर की पार्टियां जो राज्यों की सत्ता में रही हैं, उन्हें भी इस बारे में काफ़ी कुछ मालूम है। फिर कांग्रेस और उसके एलायंस पार्टनर किसी नौसिखिए जैसा आचरण क्यों कर रहे हैं?

प्रेस फ़्रीडम के वैश्विक सूचकांक में भारत आज 180 देशों के बीच 161 वें स्थान पर क्यों है? भूटान, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका की स्थिति भी हमसे बेहतर क्यों है? क्या यह जानना भी रॉकेट साइंस है? आज भी टीवीपुरम् सहित हमारे देश के मेनस्ट्रीम मीडिया में 90 फ़ीसदी से भी ज़्यादा ‘अपर कास्ट हिन्दू’ ही क्यों हैं? संसद की स्थायी समिति (आईटी मंत्रालय से सम्बद्ध) की मई, 2013 की ऐतिहासिक रिपोर्ट के बावजूद अगर तत्कालीन सत्ताधारी और आज के विपक्षी इन मामलों पर अनभिज्ञता ज़ाहिर करते हैं तो यह उनकी धूर्तता के अलावा और कुछ नहीं है?

मीडिया से सम्बन्धित अनेक समस्याओं और तथ्यों को उद्धृत करते हुए राव इंद्रजीत सिंह की अध्यक्षता वाली उक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट ने क्रॉस मीडिया ओनरशिप की जटिल समस्या को तत्काल संबोधित करने की सिफ़ारिश की थी। लेकिन सरकार ने कुछ भी नहीं किया। दूरदर्शन को बीबीसी की तर्ज़ पर प्रोफेशनल और एक हद तक स्वायत्त बनाने के लिए ठोस कदम उठाने से कांग्रेस सरकारों को किसने रोका था?

इसके लिए कुछ बेहतर कदम राष्ट्रीय मोर्चा या बाद में संयुक्त मोर्चा की सरकारों के दौरान उठाये गये थे। क्या यह सच नहीं कि कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, हर पार्टी की सरकार ने मीडिया संस्थानों में वेतन आयोग के तहत काम करने वाले मीडिया कर्मियों को ठेके पर काम करने वाले कर्मचारियों में तब्दील करने के मीडिया-मालिकों के अवैध और ग़ैरक़ानूनी कदमों को भरपूर संरक्षण दिया। संसदीय समिति ने इसे भी आपत्ति जनक कहा था। क्या हुआ?

बाद के दिनों में मीडिया के अंदर के माहौल और इसमें विभिन्न समुदाय के पत्रकारों की हिस्सेदारी को लेकर एक गंभीर अध्ययन हुआ था। सन 2006 में प्रो योगेन्द्र यादव, अनिल चमड़िया और जितेंद्र कुमार के नेतृत्व वाले सर्वेक्षण समूह की रिपोर्ट आई। इसमें बताया गया था कि मीडिया में कुछ ही जाति-वर्ण समूहों से आये पत्रकारों का लगभग संपूर्ण वर्चस्व है। दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक नाम मात्र के हैं। इस बारे में तत्कालीन सरकार ने क्या किया?

हमें यह भी याद है कि आज के अनेक ‘नफ़रती एंकरों और सत्ता के प्रवक्ता की तरह बोलने-लिखने वाले पत्रकारों-संपादकों की नियुक्तियां उस दौर के कुछ ताकतवर कांग्रेसी और भाजपा नेताओं की सिफ़ारिश पर ही हुई थीं। कई ऐसे स्वनामधन्य एंकर-पत्रकार थे, जिनके लिए कांग्रेसी के साथ भाजपाई नेता की भी सिफ़ारिश नत्थी रहती थी। एनडीए के वाजपेयी दौर का एक वाक़या तो बहुत दिलचस्प है। उन दिनों के एक हिंदी पत्रकार के एनडीए सत्ता प्रतिष्ठान में बहुत कारगर संपर्क थे। उनकी नियुक्ति बहुत जल्दी ही देश के एक बड़े अख़बार में बड़े संपादक के तौर पर हो गयी। कांग्रेस विपक्ष में थी।

उस अख़बार के एक वरिष्ठ पत्रकार ने कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी का एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू किया। संपादक ने उक्त इंटरव्यू को पत्रकार की बाइलाइन के बग़ैर बहुत साधारण जगह छापा। अगले दिन जब पत्रकार ने इसकी शिकायत की तो संपादक ने मुस्कुराते हुए उस पत्रकार से कहा: ‘सोनिया गांधी मूर्ख है, उसे राजनीति का कुछ अता-पता नहीं। इसलिए उसका इंटरव्यू कितना छपता’।

जानते हैं, 2004 में जब कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए की सरकार आई तो उस संपादक की कांग्रेस और प्रधानमंत्री दफ़्तर में एनडीए दौर जैसी हैसियत तत्काल बन गयी। लंबे समय तक वह संपादक रहे। मोदी-शाह के दौर की एनडीए सत्ता संरचना में उनकी कुछ नहीं चली। फिर वह कांग्रेस के नज़दीक हो गये और बताते हैं कि आजकल ‘लिबरल-प्रोग्रेसिव’ छवि के साथ वह कांग्रेस की बौद्धिक मंडली में बहुत अहम् भूमिका में हैं। निश्चय ही इसमें उनकी व्यक्तिगत और पारिवारिक हैसियत के अलावा वर्ण-वर्ग की पृष्ठभूमि की भी कुछ न कुछ भूमिका ज़रूर होगी।

इसीलिए मैं नहीं मानता कि मीडिया के ‘अतःपुर’ और इसकी बहुस्तरीय समस्याओं से कांग्रेस पार्टी अनभिज्ञ है। दरअसल वह भी एक समय इसका लाभार्थी रही है। हां, ये बात सही है कि आज की सत्ता संरचना कई कारणों से तब की कांग्रेसी सत्ता संरचना या दिवंगत रजनी कोठारी के शब्दों में ‘कांग्रेस सिस्टम’ से काफ़ी अलग क़िस्म है। इसमें तनिक भी लिबरल, सहिष्णु या ढीले-ढाले सिस्टम के लिए जगह नहीं है। इसका लक्ष्य भारत को संपूर्ण तौर पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाना है। इसलिए इसके काम के तरीक़े अलग हैं।

मीडिया का स्वरूप, चरित्र और चेहरा इसीलिए आज वह नहीं है जो ‘कांग्रेस सिस्टम’ के दौरान था। यह पूरी तरह ‘संघ-भाजपा का सिस्टम’ है। इसकी बुनियाद में है- एकाधिकारवादी कॉरपोरेट और ‘सनातनी सांप्रदायिकता’। सच पूछिए तो लोकतांत्रिक मुल्कों की दुनिया में ऐसा मीडिया, ख़ासतौर पर टीवीपुरम् कहीं नहीं है। पूर्व में हिन्दू राजशाही वाले नेपाल में भी नहीं।

इन 14 एंकरों में एकाध को छोड़कर कोई भी उस ‘राजनीतिक संस्थान या वैचारिक घराने’ से नहीं आया है, जिससे मौजूदा सत्ताधारी आए हैं। इनमें ज़्यादातर एंकर टीवीपुरम् के उन प्रतिष्ठानों की पैदाइश हैं, जिनके मालिकों की प्रेस की आज़ादी, जनता और लोकतंत्र में ख़ास प्रतिबद्धता नहीं है। उनके लिए ‘किसी भी क़ीमत पर फ़ायदा-मुनाफ़ा’ ही सबसे बड़ा सरोकार और लक्ष्य है।

हां, ये बात सही है कि इनमें कुछ प्रतिष्ठान 2016-17 से पहले ऐसे नहीं थे। लेकिन तब भी वहां 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग अपर कास्ट हिन्दू सामाजिक पृष्ठभूमि के ही हुआ करते थे। लेकिन वे आज की तरह सत्ता के पुर्ज़े नहीं बने थे। आज अगर वे पुर्ज़े बने हैं तो क्या सिर्फ़ अपने फ़ैसले से बने हैं? ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण होगा। सच ये है कि वे अपने-अपने प्रतिष्ठान और उसे चलाने वालों के कारण सत्ता के उपकरण या पुर्ज़ा बने हैं। यह महज़ संयोग नहीं कि वे जिस सामाजिक पृष्ठभूमि से आये हैं, उसका भी बड़ा हिस्सा आज मौजूदा सत्ताधारियों का समर्थक हो चुका है।

टीवीपुरम् के मन-मिज़ाज को इस मुक़ाम पर पहुंचाने में अनेक कारकों की भूमिका है। लेकिन सबसे बड़ी भूमिका है- सत्तातंत्र और मीडिया मालिकों की। क्या विपक्ष के बड़े नेताओं को मालूम नहीं कि टीवीपुरम् की सांध्यकालीन बहसों या चर्चाओं के विषय कैसे और कहां से तय होते हैं? कौन-कौन या कैसे-कैसे वार्ताकार या गेस्ट बुलाने हैं; ये कैसे और कहां से तय होता है? किस एंकर में ज़्यादा ‘प्रतिभा’ है और किसके वेतन में इज़ाफ़ा ज़्यादा होना चाहिए; हाल के कुछ वर्षों में यह सब किस आधार पर तय होने लगा? क्या यह बात दिल्ली में रहने वाले विपक्षी दिग्गजों, उनके सलाहकारों या वरिष्ठ संपादकों को नहीं मालूम?

टीवीपुरम् ही नहीं समूचे मीडिया से जुड़े कुछ ज्वलंत प्रश्नों पर हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई। कुछ मसलों पर कोर्ट के फ़ैसले या आब्जर्वेशन संभावित हैं। पर भारतीय मीडिया, ख़ासकर टीवीपुरम् की समस्याओं के समाधान का कोई सुसंगत रास्ता फ़िलहाल कहीं नहीं दिखाई देता। इंडिया एलायंस का यह रास्ता तो हरगिज़ समाधान की तरफ़ नहीं जाता। इससे सोशल मीडिया पर कुछ हर्षध्वनि ज़रूर हुई है, कुछ शोर ज़रूर उठा है। पर इसमें न गंभीरता है और न समझदारी है।

मीडिया नामधारी संस्थानों, ख़ासतौर से टीवीपुरम् और हिंदी अख़बारों के ज़रिये हमारे समाज के माहौल को जितना विषैला बनाया गया है, जिस कदर समुदायों में नफ़रत फैलायी गई है और जिस तरह अज्ञान-अंधविश्वास और झूठ को स्थापित किया गया है, उसका मुख्य स्रोत आज का सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य, ये कथित मीडिया संस्थान और उनके संचालक हैं। सत्ता तंत्र में हुई तब्दीली और सत्ता के संचालकों की राजनीति और वैचारिकी ने आज मीडिया की बची-खुची स्वतंत्रता को भी पोंछ डाला है।

इसलिए एक बड़े और जटिल संस्थागत मसले को कुछ व्यक्तियों (एंकरों) के बहिष्कार मात्र से हल नहीं किया जा सकता। यह सिर्फ़ मीडिया का नहीं, लोकतंत्र और समावेशी समाज निर्माण का भी प्रश्न है। समाज में लोकतंत्र और समता के लिए बची-खुची भूख को बचाये रखने और बढ़ाते जाने की ज़रूरत है। जिस तरह आज के टीवीपुरम् का निर्माण हुआ है, वह बहुत बड़े ख़तरे का संकेत है। सुधी पाठक और विपक्ष के बड़े नेता ‘रेडियो रवांडा’ के इतिहास से तो वाक़िफ़ होंगे ही। रेडियो रवांडा की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए बयानों और कुछ कॉस्मेटिक कदमों की नहीं, जनता के बीच जनजागरण और कारगर प्रतिरोध की ज़रूरत है।

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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मनोज मोहन
मनोज मोहन
Guest
9 months ago

यह बहुत ही बढिया लेख है, विपक्ष की इस तरह की आलोचना से जो अस्वस्थ्य वातावरण बनने लगा है, उसे स्वस्थ्य होने में यह लेख कारगर दवा की तरह है….कांग्रेस का सनातन विरोध आस्था को मजबूत करेगा, पत्रकारिता का भाईचारा भी निभेगा…

Praveen Malhotra
Praveen Malhotra
Guest
9 months ago

वरिष्ठ लेखक उर्मिलेशजी का लेख बहुत बढ़िया तथ्यात्मक और सटीक है। धन्यवाद उर्मिलेशजी।

आयुष पवन
आयुष पवन
Guest
9 months ago

बहुत ही सुन्दर और स्पष्ट आलेख