अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी 2026 को 6-3 के बहुमत से अवैध ठहरा दिया। यह फैसला सिर्फ एक कानूनी झटका नहीं, बल्कि राष्ट्रपतीय शक्ति, संस्थागत संतुलन और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर गहरी टिप्पणी है। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत की राय में स्पष्ट लिखा कि टैक्स और टैरिफ लगाने का अधिकार कांग्रेस का है, न कि राष्ट्रपति का।
शीर्ष अदालत ने माना कि ट्रंप ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट (आईईईपीए, 1977) का दुरुपयोग किया, जो राष्ट्रपति को विदेशी खतरों के समय कुछ नियमन की शक्ति देता है, लेकिन टैरिफ लगाने की नहीं। इस फैसले ने ट्रंप के उस मॉडल को चुनौती दी, जिसमें उन्होंने वैश्विक व्यापार को एकतरफा टकराव और ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ की दिशा में धकेला था।
अमेरिकी राजनीति अक्सर दुनिया के लिए एक थियेटर की तरह काम करती है—जहाँ हर फैसला घरेलू से ज्यादा वैश्विक प्रभाव पैदा करता है। लेकिन इस घटनाक्रम में जो सिलसिला दिख रहा है, वह महज नीतिगत नहीं, बल्कि सत्ता, छवि और संकट-प्रबंधन की जटिल राजनीति का संकेत है। भारत को इस बदलते अमेरिकी परिदृश्य को दूर की खबर की तरह नहीं, बल्कि अपने आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक हितों से जुड़ी वास्तविकता की तरह देखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ घंटों बाद ही ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर पेंटागन और अन्य एजेंसियों को यूएफओ, यूएपी (अनआइडेंटिफाइड एरियल फेनोमेना), एलियंस और एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल लाइफ से जुड़ी फाइल्स रिलीज करने का निर्देश दिया। उन्होंने इसे “ट्रेमेंडस इंटरेस्ट” का हवाला दिया, लेकिन खुद कहा कि “मुझे नहीं पता कि एलियंस रीयल हैं या नहीं।”
यह ऐलान टैरिफ रूलिंग के ठीक बाद आया, जब सुर्खियां ट्रंप की आर्थिक नीति पर रोक से भरी थीं। इसे महज पारदर्शिता का कदम मानना राजनीतिक भोलापन होगा। अमेरिकी सत्ता की राजनीति में ध्यान भटकाना कोई नई रणनीति नहीं है—ट्रंप की शैली हमेशा ‘नैरेटिव-ड्रिवन’ रही है, जहाँ संकट के बीच एक नया, बड़ा और भावनात्मक शिगूफा खड़ा कर विमर्श की दिशा रहस्य, सुरक्षा और राष्ट्रवाद की ओर मोड़ दी जाती है।
इस पूरे परिदृश्य को और गंभीर बनाता है जेफ्री एपस्टीन फाइलों का साया। एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट के तहत जनवरी 2026 में डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने 3.5 मिलियन से ज्यादा पेज रिलीज किए, जिसमें 2,000 से अधिक वीडियो और 1.8 लाख इमेज शामिल हैं। ट्रंप का नाम इनमें 1,000 से ज्यादा बार आया है— लेकिन कोई क्रेडिबल सबूत नहीं मिला कि आगे कार्रवाई की जरूरत हो।
फिर भी, अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के कई बड़े नामों का संदर्भ आने से समाज में बेचैनी बनी हुई है। ऐसे में यूएफओ फाइलों का अचानक खुलासा जनता का ध्यान हटाने का प्रयास लगता है।
टैरिफ पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक है क्योंकि इसने अमेरिकी लोकतंत्र के भीतर शक्ति-संतुलन को फिर से रेखांकित किया। संकेत साफ है कि राष्ट्रपति चाहे कितना भी आक्रामक आर्थिक राष्ट्रवाद अपनाए, सर्वोच्च संस्थाएँ अंततः संवैधानिक सीमा तय कर देती हैं। यह ट्रंप के उस राजनीतिक दर्शन पर चोट है, जिसमें कार्यपालिका को व्यापक आर्थिक हथियार दिए गए थे।
फैसले से $160-200 बिलियन से ज्यादा कलेक्टेड टैरिफ पर रिफंड की मांग बढ़ सकती है, और ट्रंप ने इसे “शर्मनाक” बताते हुए नए तरीकों (जैसे सेक्शन 122 या अन्य ट्रेड लॉज) से टैरिफ दोबारा लगाने की योजना जाहिर की है। यह संदेश सिर्फ अमेरिका के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए है कि अमेरिकी नीति अब उतनी ‘व्यक्तिगत’ नहीं रह सकती जितनी ट्रंप के दौर में दिखाई दी।
भारत के लिए इस घटनाक्रम का असर कई स्तरों पर पड़ सकता है। व्यापारिक स्तर पर, अगर ट्रंप की टैरिफ नीति अदालत के कारण सीमित होती है, तो भारत सहित कई देशों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रवेश की शर्तें आसान हो सकती हैं। ट्रंप के दौर में भारत पर 5-10% टैरिफ थे, और संरक्षणवाद कमजोर पड़ने से भारतीय निर्यातकों (टेक्सटाइल, फार्मा, आईटी) को राहत मिल सकती है।
लेकिन साथ ही अमेरिकी राजनीति में अस्थिरता का जोखिम बढ़ेगा, जिससे व्यापारिक निर्णयों में अनिश्चितता बनी रहेगी—इंडो-यूएस ट्रेड 2025 में $200 बिलियन से ऊपर पहुंच चुका है, और नए टैरिफ प्लान से यह प्रभावित हो सकता है। भू- राजनीतिक स्तर पर, अगर ट्रंप घरेलू संकटों से ध्यान हटाने के लिए वैश्विक मुद्दों को उभारते हैं, तो इसका असर एशिया-प्रशांत क्षेत्र और भारत की रणनीतिक स्थिति पर पड़ेगा।
भारत को अमेरिका के साथ संबंधों में अधिक सतर्क संतुलन बनाना होगा, क्योंकि अमेरिकी नीति में अप्रत्याशित बदलाव की संभावना बनी रहती है—चाहे क्वाड हो या चाइना पॉलिसी।
सबसे महत्वपूर्ण आयाम राजनीतिक संस्कृति का है। अमेरिका में नैरेटिव-शिफ्ट अगर रणनीतिक हथियार बनता है, तो यह मॉडल वैश्विक राजनीति में दोहराया जा सकता है। भारत जैसे लोकतंत्र के लिए संस्थागत मजबूती और सार्वजनिक विमर्श की परिपक्वता और ज्यादा जरूरी है। मोदी काल में भी राजनीतिक संकटों से बचने के लिए नीति और जवाबदेही को पीछे छोड़ने के आरोप लगते रहे हैं।
ट्रंप का यह दौर एक दिलचस्प विरोधाभास पेश करता है—एक तरफ वैश्विक व्यापार को अपनी शर्तों पर मोड़ने की कोशिश, दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट द्वारा संवैधानिक सीमा याद दिलाना। वैसे भी अमेरिकी राजनीति सिर्फ नीति से नहीं, बल्कि धारणा से भी चलती है। टैरिफ पर हार, एपस्टीन विवाद का दबाव, और यूएफओ का अचानक विमर्श—ये तीनों अलग-अलग घटनाएँ नहीं, बल्कि एक ही राजनीतिक समय के संकेत हैं।
यह वह समय है जब सत्ता अपनी वैधता बचाने के लिए कहानियाँ गढ़ती है, और संस्थाएँ उस कहानी का अंत तय करती हैं। क्या भारत में ऐसा कठोर संपादन संभव है? क्या हमारी शीर्ष संस्थाएँ भी ऐसी चुनौतियों में संवैधानिक सीमाओं को इतनी मजबूती से लागू कर पाएंगी?
(पत्रकारिता समेत अभिव्यक्ति के कई आयामों को स्पर्श करने वाले विजयशंकर चतुर्वेदी इन दिनों वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं और सोशल मीडिया और रचनात्मक लेखन में सक्रिय हैं।)