साहिबे आलम की इज़राइल यात्राएं बनाम देश की विदेश नीति का ख़ात्मा

आजकल इज़राइल की यात्रा करने वाले साहेब का यशगान ज़ोर-शोर से जारी है। आज से नौ साल पूर्व साहेब जी इसी इज़राइल में एपस्टीन साहब के इशारे पर तेल अवीव में नेतान्याहू के साथ अमरीका को खुश करने के लिए नाचे थे। इससे पूर्व भारत की विदेश नीति के तहत देश का कोई प्रधानमंत्री इस देश में कदम नहीं रखा। कुछ तो बात है कि साहेब जी को दोबारा यहां जाने की ज़रूरत महसूस हुई। अमूमन आम जन भी यह समझ गया है कि एपस्टीन फाइल, डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति और गौतम अडानी के बचाव का रास्ता इज़राइल से होकर ही जाता है प्यारे मित्र के पास। जिसे पिछले दफ़े नाच गाकर खुश किया गया अब पता नहीं वहां क्या करके अमरीका को खुश करने की तलब लिए वे तेलअवीव पहुंचे हैं।

सवाल ये है कि पिछले किसी प्रधानमंत्री ने यहां दस्तक क्यों नहीं दी जो श्रेय साहेब जी को मिल रहा है आइए इसे समझने का प्रयास करते हैं। इस बाबत भारत-इसराइली संबंधों के जानकार और जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आफ़ताब कमाल पाशा क्या कहते हैं।  उनके मुताबिक इसराइल जाने से भारतीय प्रधानमंत्री अब तक बचते रहे हैं।

इसकी वजह बताते हुए पाशा कहते हैं, “उसकी सबसे बड़ी वजह भारत की अपनी घरेलू स्थिति रही है। इसराइल से संबंध जब शुरू हुए उसके बाद देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो गया था और कोई भी दल देश के मुसलमानों को नाराज़ नहीं करना चाहता था।”

दरअसल इसराइल और फ़िलीस्तीनी क्षेत्र का विवाद भारत की आज़ादी से भी पुराना है और भारत हमेशा से अरब देशों का हिमायती रहा है। महात्मा गांधी इसराइल और फ़िलीस्तीन के झगड़े पर कई बार ये कह चुके थे उनकी सहानुभूति यहूदियों के साथ है लेकिन फ़लीस्तीनी क्षेत्र तो अरब के लोगों का ही है और इस विवाद का कोई सैन्य हल नहीं होना चाहिए। 1947 में भारत की आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरू ने इसराइल के प्रति महात्मा गांधी के रुख़ को कायम रखा। यही वजह रही कि अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुरोध के बावजूद भारत ने इसराइल के गठन के प्रस्ताव का विरोध किया था।

29 मई, 1947 को भारत ने संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की बैठक में फ़िलीस्तीन के विभाजन का विरोध किया था। भारत के विरोध के बाद भी 14 मई, 1948 को इसराइल का गठन हुआ।दरअसल विश्लेषकों की राय के मुताबिक ये संयोग था कि जब धार्मिक आधार पर इसराइल और फ़िलीस्तीनी क्षेत्र का विभाजन हो रहा था, उसी दौर में धर्म के आधार पर भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था।पाकिस्तान के साथ सीमा पर तनाव बना हुआ था, आज़ादी के तुरंत बाद युद्ध भी हो गया था, लिहाजा नेहरू को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अरब देशों के सहयोग की ज़रूरत भी थी।

हालांकि भारत ने सितंबर, 1950 में इसराइल को मान्यता दे दी लेकिन भारत की विदेश नीति फ़िलीस्तीनी लोगों के पक्ष में रही। प्रोफेसर ख़ुर्शीद इमाम के मुताबिक, “दरअसल उस दौर में हमारी प्राकृतिक तेल और ऊर्जा के मामले में ज़रूरत के हिसाब से भी हमें अरब देशों पर निर्भर रहना पड़ रहा था।” भारतीय प्रधानमंत्रियों ने सन् 1962 और 1971 के युद्ध के दौरान इज़राइल से हथियारों की डिमांड की थी। सहयोग भी मिला किंतु हमारी विदेश नीति फिलीस्तीन के प्रति ही वफ़ादार रही तथा अरब देशों से विशेष जुड़ाव बरकरार रहा।

1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तब सुब्रमण्यम स्वामी ने इसराइल के साथ संबंधों को बेहतर बनाने की बात कही थी, तब प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तैयार थे, लेकिन विदेश मंत्री के तौर पर अटल जी ने कहा था कि 25 अरब देश नाराज़ हो जाएंगे। बहरहाल, भारत और इसराइल के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत 29 जनवरी, 1992 में जाकर हुई। 1971 में इंदिरा के विदेश मंत्री रहे पीवी नरसिम्हाराव जब प्रधानमंत्री बने तब 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान भारत और इसराइल का सैन्य सहयोग बढ़ा। 2000 में भारत के गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और विदेश मंत्री जसवंत सिंह इसराइल के दौरे पर गए थे।

2014 में भाजपा की सरकार बनने के बाद बनी सरकार के दिल में मुस्लिम लोगों के प्रति जो दुर्भाव देखने को मिले उससे लगता तो यही था कि शायद यह सरकार हमारी संतुलित विदेश नीति को ख़त्म कर देगी पर यह संभव नहीं हुआ किंतु साहेब जी को अमरीकी यारी के कारण मज़बूरन इज़राइल के पक्ष में खड़ा होना पड़ा। उन्होंने इज़राइल द्वारा गाज़ा पर हुए हमलों पर उसे कभी दोषी करार नहीं दिया। फिलीस्तीन के पक्ष में भी कोई सुस्पष्ट बयान कभी नहीं दिया। ईरान ने जब इज़राइल के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तब भी साहिब मौन रहे। अमेरिका के कहने पर चाबहार बंदरगाह से जो रेल सड़क निर्माण कर भारत के आयात निर्यात को बढ़ाता बंद कर दिया। 

इधर हाल ही में ईरान में रह रहे भारतीयों को वापस बुलाने का मतलब ही है कि साहिब जी इज़राइल के हमले का खुला संकेत दे रहे हैं।जिससे मध्य एशिया पर युद्ध की आंच आएगी।

कुल मिलाकर, भारत सरकार दो नावों पर सवारी कर रही है जो घातक होगी। हाल की इज़राइल यात्रा के दौरान अभूतपूर्व स्वागत सत्कार साहेब जी का हो रहा है। लाल कारपेट बिछा हुआ है। संसद में भाषण हुआ है जिसे लेकर विपक्ष के साथ सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष का विरोध चल रहा है किंतु ये सब होगा सदन खाली ना रहे इसलिए पूर्ववर्ती नेताओं को आमंत्रित किया गया था। कई समझौते ज़ीरो टैरिफ पर होने की ख़बरें भी आ रही हैं।

हम सभी जानते हैं कि यह अमेरिका के दबाव में इज़राइल के साथ जो करार किए जा रहे हैं उससे संपूर्ण दक्षिण पूर्वी एशिया में भारत की स्थिति कमज़ोर होगी तथा भारत के पुराने अरब मित्रों और रुस चीन जैसे बड़े देशों से हमारे ताल्लुकात खराब होंगे। जिसका खामियाजा देश को वहन करना पड़ेगा। कई लोग इसे साहेब जी की बचाव यात्रा को समर्पण के रुप में भी देख रहे हैं। इसके  लिए देश की सक्षम विदेश नीति का होम किया जा रहा है।

(सुसंस्कृति परिहार लेखिका और एक्टिविस्ट हैं।)

Leave a Reply